इजाडोरा डंकन

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इजाडोरा डंकन (जन्म : 1878, मृत्य : 1927) बीसवीं सदी की महान प्रतिभा थी, उन्होंने आधुनिक योरपीय नृत्य की संरचना की। उन्होंने नृत्य-कला को साहित्य और जीवन से जोड़कर अप्रतिम ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया था। वे ग्रीक साहित्य और नाटक की गंभीर अध्येता थीं। उनकी खूबसूरती अपने समय से ही एक दंतकथा बन गई थी। उन्होंने जहां कलाकार के गहरे संघर्षों को जिया, वहीं एक स्त्री के मुक्त जीवन की चाह को भी अपने जीवन में उतारा। उन्होंने जीवन और प्रेम को अपने उसूलों से जिया। एक दुर्घटना में मृत्यु होने के कुछ ही पहले उन्होंने अपनी आत्मकथा लिख कर पूरी की थी, जो उनकी मृत्यु के बाद छपी। यह दुनिया की बेहतरीन आत्मकथाओं में से एक है। सत्य, सौंदर्य, प्रेम और कला इस आत्मकथा के हर अक्षर में जैसे स्वरूपित हो उठे हैं। इजाडोरा डंकन की इस बहुचर्चित और विवादास्पद आत्मकथा 'माय लाइफ' के सर्वप्रथम हिन्दी अनुवाद के अंश यहां प्रस्तुत हैं।

शोक और दुख और आंसू। लंबी प्रतीक्षा और पीड़ा आनंद के उस महान क्षण की भूमिका थे। बेशक अगर कोई ईश्वर है तो वह महान नाट्य-निर्देशक है।

बेलेव्यू में जिंदगी हर सुबह खुशियों के विस्फोट से शुरू होती। कॉरीडोर में एक स्वर में गाते बच्चों की आवाजें और दौड़ते-भागते कदमों का शोर गूंजता। जब मैं उतर कर नीचे आती तो वे नृत्य-कक्ष में पहुंच चुके होते। मुझे देखते ही वे चिल्लाते, 'गुडमॉर्निग इजाडोरा!' इस माहौल में भला कौन विषादग्रस्त रह सकता था? फिर भी मैं अकसर जब उनकी ओर देखती तो दो खोए हुए नन्हे चेहरे ढूंढती, फिर अपने कमरे में जाकर अकेले में रोती। पर हर दिन उन्हें सिखाने का साहस फिर से जुटा लेती। उनके नृत्य का प्यार भरा सौंदर्य मुझे जीनेकी हिम्मत देता।
पहली सदी में रोम की पहाड़ियों पर एक स्कूल था, जिसे लोग 'सेमिनरी ऑफ डांसिंग प्रीस्ट्स ऑफ रोम' के नाम से जानते थे। इस स्कूल के विद्यार्थी अतिकुलीन परिवारों से चुने जाते थे। सिर्फ इतना ही नहीं, उनकी सदियों पुरानी वंशावली देखकर यह पक्का किया जाता था कि उनकी वंश-परंपरा बेदाग है। हालांकि उन्हें समस्त कलाओं और दर्शनों की शिक्षा दी जाती थी, पर नृत्य उनकी प्रधान अभिव्यक्ति था। वे साल के चार मौसमों- वसंत, ग्रीष्म, पतझड़ और सर्दियों में नाट्यशाला में नृत्य प्रदर्शित करते। इन अवसरों पर वे पहाड़ियों से उतरकर रोम चलेआते, जहां वे विभिन्ना समारोहों में भाग लेते और चुनिंदा दर्शकों के सामने नृत्य प्रस्तुत करते। ये बच्चे इतने आनंद और आत्मीयता के साथ नृत्य करते कि उनका नृत्य बीमार आत्माओं के लिए औषधि का काम करता। जब मैंने स्कूल की स्थापना की तो मैंने ऐसी ही अभिव्यक्ति का सपना देखा था। मुझे विश्वास था कि पेरिस के पास स्थित बेलेव्यू अपने शहर और वहांं के कलाकारों के लिए भी वैसा ही महत्व रखेगा जैसा रोम के लिए 'डांसिंग प्रीस्ट्स' का यह स्कूल था।
कलाकारों का एक दल हर सप्ताह अपने चित्रकारी के सामान के साथ बेलेव्यू आता। स्कूल उनकी प्रेरणा का एक केंद्र बन गया था। सैकड़ों रेखाचित्रों और नृत्य आकृतियों को यहां से प्रेरणा मिली। मेरा सपना था कि इस स्कूल के जरिए कलाकारों और उनके मॉडलों केबीच संबंधों का एक नया आदर्श सामने आए। बीथोवेन और सीजर फ्रेंक के संगीत पर थिरकते या शेक्सपियर का काव्य-वाचन करते मेरे शिष्यों की चलती-फिरती आकृतियां किसी चित्रकार के स्टूडियो में बैठे मूक और लाचार मॉडल की छवि से कितनी अलग और जीवंत थीं!
इन आशाओं की अगली कड़ी थी- एल का बेलेव्यू की पहाड़ी पर थिएटर निर्माण का सपना। संभावनाओं की कल्पना, जो इतने दुखद ढंग से एक बार पहले स्थगित हो गई थी। इसकी कल्पना एक उत्सव थिएटर के रूप में की गई थी, जहां खास उत्सवों पर पेरिसवासियों का जमघट हो। वहां सिंफोनिक वाद्यवृंदों की व्यवस्था की भी योजना थी।

एल ने एक बार फिर वास्तुशिल्पी लुई स्यू को बुलाया। थिएटर से हटा दिए गए मॉडलों को पुस्तकालय में स्थापित कर दिया गया। इस थिएटर के जरिए संगीत, नाट्य और नृत्य की कलाओं को उनके शुद्धतम रूप में एक साथ लाने के मेरे स्वप्न के पूरा होने की उम्मीद जगी। यहां मॉनेत सली, इलीनोरा ड्यूस या सूजान देस्त्रे इडिपस या एंटीगनी या इलेक्ट्रा मंचित करते और मेरी नृत्यशाला के शिष्य कोरस-नृत्य करते। मैंने बीथोवेन की जन्म सदी के अवसर पर उसकी नौवीं सिंफनी पर अपने एक हजार शिष्यों का नृत्य करवाने का विचार किया।
मैंने उस दिन की कल्पना की जब बच्चे पैन एथेन की तरह पहाड़ी से उतरेंगे और नदी पार करके एक पवित्र नर्तक-दल के रूप में पैंथान पहुंचकर किसी महापुरुष की स्मृति में एक शानदार पर्व मनाएंगे। मैं रोजाना इन शिष्यों को घंटों सिखाती। जब थकान से मेरे लिए खड़े रहना भी मुश्किल होने लगता तो मैं गद्दे पर बैठ जाती और अपने हाथों और बांहों की मुद्राओं से उन्हें सिखाती रहती। सिखाने की मेरी शक्ति सचमुच अलौकिक प्रतीत होती। मैं सिर्फ अपने हाथ का एक संकेत करती और वे नृत्य करने लगते। यह ऐसा था जैसे मैंने उन्हें नृत्य करना न सिखाया हो, बल्कि वह पथ खोल दिया हो जिसके जरिए नृत्य की आत्मा खुद-ब-खुद उनके भीतर प्रवेश कर जाती हो।
हमने यूरिपिड के 'बके' के प्रदर्शन की योजना बनाई। मेरे भाई को इसमें डायोनिसस की भूमिका करनी थी और उसे वह समूची याद थी। वह हर रात इसे हमें पढ़कर सुनाता या शेक्सपियर के नाटकों या बॉयरन के मैनफ्रेड का पाठ करता। द' अनंजियो भी स्कूल को लेकरबहुत उत्साहित था और अकसर दोपहर या रात के खाने के वक्त हमारे साथ होता।

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