भारत के पहले स्मार्ट शहर का भयावह सच

पुनः संशोधित मंगलवार, 4 सितम्बर 2018 (12:10 IST)
लवासा, देश का पहला स्मार्ट शहर। जब बसाया गया तो लगा कि बस यही वह आदर्श शहर है जहां सपनों का घर बनाया जा सकता है। लेकिन योजना में हुई चूक ने आज इसे वीरान छोड़ दिया है। नए स्मार्ट शहरों को इससे कई सबक सीखने की जरूरत है।

रिटायरमेंट के बाद डेविड कूपर और उनकी पत्नी ने तय किया कि वे की भीड़भाड़ से दूर किसी नदी के किनारे अपना नया घर खरीदेंगे और सुकून से रहेंगे। कूपर दंपति ने मुंबई से 3-4 घंटे की दूरी पर स्थित लवासा हिल स्टेशन पर टू-बेडरूम फ्लैट खरीद लिया।


इस प्राइवेट शहर को देश का सबसे पहला स्मार्ट सिटी कहा जाता है। रिटायरमेंट के बाद यहां पर आकर बसना उन्हें बढ़िया विकल्प लगा। लेकिन बहुत जल्द ही इस दंपति के सपने चकनाचूर हो गए जब लवासा के डेवलपर को शहर के लिए मंजूरी नहीं मिली। एक साल की बंदी और भागदौड़ के बाद नकदी की कमी हो गई जिसका नतीजा खरीदारों को भुगतना पड़ रहा है।

कूपर बताते हैं, ''जब हम यहां आए थे तो यहां सब कुछ ठीक था। सड़कें मानों रेस ट्रैक जैसी थी, नल का पानी पिया जा सकता था और बिजली की कोई समस्या नहीं थी। हम यहां पूरी तरह सुरक्षित थे।'' अब इस शहर के हालात बदल गए हैं।


कूपर के मुताबिक, ''अब यहां हर तरफ कचरा फैला हुआ है। इमारतें आधी-अधूरी बनकर खड़ी हैं, सड़कों पर गड्ढे हैं और सुरक्षा कर्मचारी काम छोड़कर जा चुके हैं। हमारा सपना अब टूट चुका है।''

बढ़ रहे शहरीकरण के कारण दुनिया भर की सरकारें शहरों को 'स्मार्ट' बनाने में लगी हुई हैं। इसके लिए वे सुरक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पानी, कचरे के प्रबंधन आदि के आंकड़े जुटा रही हैं। के लिए शहरों को स्मार्ट बनाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, भारत 2022 तक चीन की जनसंख्या को पार कर दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा।


लेकिन आज की तारीख में लवासा में खाली छोड़ी गईं इमारतें और टूटी हुईं सड़कें स्मार्ट सिटी की योजनाओं से कोसों दूर हैं। इतावली शहर पोर्टोफीनो की तर्ज पर बनाए गए इस शहर में कभी ढाई लाख लोगों को बसाने की योजना थी।



सिर्फ तकनीक बनाएगी स्मार्ट?
विश्लेषकों का मानना है कि लवासा शहर का पतन भारत के अन्य स्मार्ट शहरों के लिए एक सबक है। भारत में 2020 तक 100 शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना है, जिसके लिए 7।5 अरब डॉलर निवेश किया जाना है। हालांकि योजनाकारों की मानें तो केंद्र सरकार के स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में खराब डिजाइन जैसे संरचनात्मक मुद्दों या कम आय वालों को लेकर कुछ कहा नहीं गया है।


अहमदाबाद की सीईपीटी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर सास्वत बंद्योपाध्याय का कहना है, ''बिना कोई लक्ष्य तय किए या साफ-सुथरी योजना के यह कहना बड़ा उलझन भरा काम है कि वे क्या चीजें हैं जो एक शहर को स्मार्ट बनाती हैं।'' उनके मुताबिक, ''एक शहर में एक हजार सीसीटीवी कैमरे या एक सौ सौर ऊर्जा वाली स्ट्रीट लाइटें लग सकती हैं, लेकिन इससे वह नहीं होता जाता है।''


एक खास वर्ग बन रहा स्मार्ट
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर के शहरों की आबादी 70 फीसदी तक बढ़ जाएगी, जो फिलहाल 55 फीसदी है। ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म मैकिंजी के मुताबिक, "भारत में अगले 20 वर्षों में करीब 30 करोड़ नए लोग शहरों में आ जाएंगे। इसके लिए 1200 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत पड़ेगी।"


भारत में फर्म के पार्टनर श्रीश सांखे कहते हैं, ''योजनाबद्ध तरीके से शहरीकरण करने की जरूरत है, न की अस्थायी या बिना किसी प्लानिंग का विकास, जैसा हम अब तक देखते आए हैं।'' वह कहते हैं कि स्मार्ट शहरों का मिशन अच्छा और जरूरी है, लेकिन हमें शहरों को विकसित करने के लिए कई और काम करने होंगे। उनके मुताबिक, ''हर शहर में एक हिस्सा विकसित हो रहा है जिसे चारों ओर फैलाने की जरूरत है, जिससे हर किसी को फायदा मिल सके।''

सैटलाइट शहर बन सकते हैं विकल्प
श्रीश सांखे कहते हैं, ''एक समाधान यह हो सकता है कि हम 25 नए सैटलाइट शहर बनाएं और हरेक में 10 लाख लोगों के रहने की व्यवस्था की जाए। इसे देश के सबसे बड़े शहरों के करीब ही बनाया जाए।


इससे उन्हें शहर के करीब होने के फायदे मिलेंगे और योजनाबद्ध तरीके से विकसित किए गए क्षेत्र का लाभ भी मिलेगा।'' गुजरात के 24 शहरों को स्मार्ट बनाने की योजना 2015 में लॉन्च हुए 'स्मार्ट सिटी' प्रोजेक्ट के पहले ही शुरू हो गई थी। अमरावती को देश का सबसे पहला ग्रीनफील्ड राजधानी बनाने पर काम चल रहा है।

वहीं, इन सभी विकास योजनाओं के बीच, किसानों के विस्थापन और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध होता रहा है। चेन्नई स्मार्ट सिटी के सीईओ राज चेरुबल कहते हैं, ''योजनाबद्ध तरीके से विकसिक किए गए शहर एक खास समुदाय को फायदा पहुंचाते हैं। शहरों को ऐसा विकसित होना चाहिए जिसमें हर तरीके के लोग रह सके।'' वह कहते हैं, ''स्मार्ट शहरों का मतलब सिर्फ तकनीक से नहीं
है बल्कि बेहतर जिंदगी से है और यह सिर्फ एक खास तबके को नहीं मिलना चाहिए।''


खास इलाकों पर केंद्रित
भारत में स्मार्ट सिटी मिशन का फोकस शहर के एक खास इलाके को विकसित करने पर है। नई दिल्ली के हाउसिंग एंड लैंड राइट्स (एचएलआरएन) नेटवर्क के मुताबिक शहर के औसतन 5 फीसदी हिस्से को ही विकसित किया जा रहा है। एचएलआरएन के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर शिवानी चौधरी कहती हैं, ''इससे भारत के शहरों की करीब 40 करोड़ आबादी में से एक चौथाई से कम लोगों पर असर पड़ेगा।''


वह कहती हैं, ''शहरों को विकसित करने की यह प्रतिबंधित सोच है जिसमें महिलाओं व अल्पसंख्यकों पर फोकस कम है। उनके मुताबिक, तकनीक पर फोकस करने से बराबर न होने की खाई और गहरी होगी और कुछ लोगों के निष्कासन का जोखिम बढ़ेगा। स्मार्ट सिटीज से झुग्गी बस्तियों को हटाए जाने को देखा जा चुका है।''


हालांकि स्मार्ट सिटीज मिशन के डायरेक्टर राहुल कपूर कहते हैं कि कार्यक्रम में सभी तबकों को फायदा मिलेगा चाहे वह किसी भी आर्थिक स्थिति, समुदाय, लिंग या उम्र का क्यों न हो। लवासा शहर को लेकर उन्होंने कहा कि लोगों के आबादी के मुताबिक वहां घर नहीं हैं। क्लबहाउस और कन्वेंशन सेंटर पुराने थे और तकनीक व मूल संरचना में भी गिरावट देखी गई थी।


लवासा पड़ा अकेला
लवासा में होटल चलाने वाले जिमी शॉ कहते हैं, ''पुराने इलाके में इमारतें खड़ी करना मुश्किल काम है। इसे विकसित होने में वक्त लगता है।" वह कहते हैं, ''हमारे जैसे लोग जिनका यहां घर है, वे आज भी इसे पसंद करते हैं। हालांकि अपने सपनों के शहर का पतन होते देखना दुखद है। जिन किसानों ने अपनी जमीनें शहर को विकसित करने पर दी, उनकी रोजीरोटी का संकट खड़ा हो गया है।"

शॉ बताते हैं कि जिन किसानों ने जमीनें बेची थी, वे पक्के घरों में चले गए और नए बने घरों में काम ढूंढ लिया। उनके बच्चों ने अंग्रेजी सीखने के लिए स्कूलों में दाखिला ले लिया, जो यहां के डेवलपर ही चलाते थे। लेकिन अब फंड कम होने से स्कूलों का भविष्य भी खतरे में हैं। उनके मुताबिक, ''


सतीश पसालकर जैसे किसान, जिन्होंने बतौर सुरक्षाकर्मी शहर में काम करना शुरू किया था, उन्हें महीनों से तनख्वाह नहीं मिली है।'' वह कहते हैं, ''जब लवासा बना तो हमारी जिंदगियां बेहतर हो गईं। हमें नए मौके मिले और भविष्य के लिए नए रास्ते खुले। लेकिन अब हम तभी कुछ अच्छा कर सकते हैं जब यह शहर जिंदा रहे।''
वीसी/एमजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)


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