मोदी और ओली को रिश्तों की फिक्र या सियासत की?

पुनः संशोधित मंगलवार, 15 मई 2018 (10:29 IST)
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपनी यात्रा में घरेलू सियासी हितों को साधने के आरोप लगे। बातें दोतरफा रिश्तों को बेहतर बनाने पर हुई, लेकिन कुलदीप कुमार सवाल करते हैं इनमें पूरी कितनी होगीं?
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो-दिवसीय नेपाल यात्रा को स्वाभाविक रूप से अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का विचार है कि इस बात की परवाह किये बगैर कि नेपाल में इस समय कम्युनिस्ट सत्ता में हैं, नरेंद्र मोदी ने अपनी यात्रा का फोकस अपने हिन्दू होने को रेखांकित करने और नेपाली जनता के बजाय भारतवासियों और शायद कर्नाटक के चुनावों के मद्देनजर उस राज्य के वोटरों को संबोधित करने पर ही केंद्रित रखा।
इसके विपरीत कुछ का मानना यह भी है कि इस यात्रा से भारत-नेपाल संबंधों में सुधरने की गति तेज होगी और दोनों देशों के बीच कई अनसुलझी और जटिल समस्याओं के सुलझने का रास्ता खुलेगा। स्वयं मोदी ने यह जुमला बोला है कि इस समय भारत-नेपाल संबंध सबसे नीचे के आधार शिविर पर हैं। शेरपा की भूमिका निभाकर पर्वतारोहियों को आधार शिविर से सीधे माउंट एवरेस्ट तक ले जाने के लिए तैयार है। लेकिन भारत में बोले गए अनेक जुमलों की जो गति बनी, उसे देखकर अनेक लोगों के मन में संशय है कि क्या मोदी इस बार वास्तव में गंभीर हैं?
मोदी ने अपनी यात्रा सीता की मायके जनकपुर से शुरू की और वहां आने वालों के लिए रखी गई पुस्तिका में "सीया राम" लिख कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लोगों ने इस पर भी कटाक्ष किया क्योंकि अयोध्या आंदोलन के समय से ही पिछले तीस वर्षों में संघ परिवार ने केवल "जय श्री राम" का नारा लगाया है और "जय सिया राम" के पारंपरिक अभिवादन और उद्घोष को नकारा है।

वहां से वे हवाई जहाज से सीधे काठमांडू गए और जोमसोम में मुक्तिनाथ मंदिर में दर्शन के लिए गए। वहां के स्थानीय लोग इस यात्रा से नाराज बताए जाते हैं क्योंकि परंपरा तोड़ कर उन्हें मंदिर के गर्भगृह में ले जाया गया और इस सबको टीवी पर प्रसारित भी किया गया। इससे लगा कि नेपाल में होते हुए भी मोदी कर्नाटक के हिन्दू मतदाता को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।

मोदी की नेपाल यात्रा में केवल एक ही ठोस काम हुआ है और वह है 6000 करोड़ रुपये की लागत से बन रही 900 मेगावॉट बिजली की उत्पादन क्षमता वाली परियोजना अरुण-3 का शिलान्यास जो मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री के पी ओली ने किया। इसके अलावा मोदी ने वे सभी वादे दुहराए हैं जो भारत पिछले वर्षों में करता आया है लेकिन जिन पर समयबद्ध तरीके से अमल नहीं किया गया।

मसलन भारत नेपाली विमानों को अधिक वायुमार्ग उपलब्ध कराएगा, तराई में सड़कों के निर्माण का काम पूरा किया जाएगा और महाकाली परियोजना की विस्तृत रिपोर्टों पर काम शुरू करने में तेजी लाई जाएगी। यहां यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि दोनों देशों ने महाकाली परियोजना पर 1996 में यानी 22 वर्ष पहले हस्ताक्षर किए थे। फिलहाल जिस योजना पर काम होता नजर आ रहा है वह रक्सौल और काठमांडू को रेल लाइन से जोड़ने की है।

नेपाल अभी तक 2015-16 में भारत द्वारा थोपी गई आर्थिक नाकेबंदी को भूला नहीं है। ओली खुद भी चीन-परस्त माने जाते हैं। यदि इस यात्रा के परिणामस्वरूप वे और भारत के साथ एक-सी दूरी बनाकर चलने पर भी राजी हो जाते हैं, तो इसे यात्रा की सफलता ही माना जाएगा। अवसर के अनुरूप ओली ने भी बहुत-सी बातें कही हैं, मसलन लोग आते-जाते रहते हैं लेकिन भारत-नेपाल तो हमेशा बने रहेंगे, लेकिन कितनी बातों पर वे टिकते हैं, इसे अभी देखा जाना है।
मोदी की नेपाल यात्रा समाप्त होने के एक दिन बाद ही ओली को अपने देश में हो रही आलोचना के मद्देनजर यह मानना पड़ा कि यात्रा के दौरान कुछ बातें ऐसी हुईं जो "राष्ट्रीय हितों" के दायरे में नहीं आतीं। शायद उनका इशारा अतिवामपंथी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किए जाने की ओर था। इन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया था ताकि मोदी की यात्रा निर्विघ्न समाप्त हो जाए। दोनों देशों के अधिकारियों ने यात्रा को बेहद सफल बताया है। देखना है कि आने वाले वर्षों में ये आशाएं किस हद तक पूरी होती हैं।

रिपोर्ट कुलदीप कुमार

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