चीन ऐसे कर रहा है मुसलमानों का ब्रेनवॉश

पुनः संशोधित गुरुवार, 17 मई 2018 (16:28 IST)
में बहुत से मुसलमानों का करके उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार बनाने की कोशिश हो रही है। क्या अपने धार्मिक विचारों को छोड़कर कम्युनिस्ट रास्ते पर चलेंगे, पढ़िए।
चीन के पश्चिमी इलाके में खास शिविर चल रहे हैं जिनमें रखे गए लोगों को अपने धार्मिक विचार त्यागकर चीनी नीति और तौर तरीकों का पाठ पढाया जा रहा है। यहां लोगों को न सिर्फ खुद की और अपने परिजनों की आलोचना करनी होती है बल्कि चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी का शुक्रिया भी अदा करना होता है।

ऐसे ही एक शिविर में जब एक कजाख मुसलमान ओमिर बेकाली ने यह सब करने से इनकार कर दिया तो उन्हें लगातार एक दीवार पर पांच घंटे खड़े रहने की सजा दी गई। इसके एक हफ्ते बाद उन्हें एक कालकोठरी में भेज दिया गया और 24 घंटे तक खाना नहीं दिया गया। 20 दिन बाद बेकाली आत्महत्या करना चाहते थे।
अब कजाखस्तान के अल्माटी में रहने वाले 42 वर्षीय बेकाली अपना अनुभव बताते हुए रो पड़ते हैं। वह कहते हैं, "बहुत ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव डाला जाता है जहां आपको अपनी खुद की आलोचना करनी है, अपने विचारों को त्यागना है, अपने समुदाय को छोड़ना है।" वह कहते हैं कि अब भी हर रात वह शिविर के अनुभव के बारे में सोचते रहते हैं।

सोच बदलने की मुहिम
2017 के मध्य से चीन के शिनचियांग प्रांत में अधिकारी हजारों और संभवतः लाखों मुस्लिम चीनियों का ब्रेनवॉश करने की कोशिश में लगे हैं। कई बार इनमें विदेशी नागरिक भी शामिल होते हैं। एक अमेरिकी आयोग ने इसे आज की दुनिया में "अल्पसंख्यक लोगों का सबसे बड़ा कैदखाना" बताया।
इन शिविरों का मकसद वहां रखे गए लोगों की राजनीतिक सोच को तब्दील करना, उनके धार्मिक विचारों को मिटाना और उनकी पहचान को नए सिरे से आकार देना है। चीनी अधिकारी इस बारे में आम तौर पर कोई भी टिप्पणी करने से बचते हैं लेकिन कुछ अधिकारियों ने सरकारी मीडिया में कहा है कि अलगाववाद और इस्लामी चरमपंथ से निपटने के लिए "वैचारिक परिवर्तन बहुत जरूरी" है। चीन में हाल के सालों में उइगुर मुसलमानों के हमलों में सैकड़ों लोग मारे गए हैं।
अलग अलग जगहों पर चीनी शिविरों में रहने वाले तीन कैदियों और एक पूर्व इंस्ट्रक्टर ने भी बेकाली की कही बातों की पुष्टि की है। इन सभी की बातों से पता चलता है कि कथित तौर पर "फिर से शिक्षित करने" के इन शिविरों में क्या हो रहा है।

यह कार्यक्रम धुर राष्ट्रवादी और सख्त स्वभाव वाले राष्ट्रपति के शासन में चीन के ताकतवर सुरक्षा तंत्र की अहम निशानी है। हालांकि इसका मूल शिक्षा के जरिए इंसान को तब्दील करने की प्राचीन चीनी सोच में छिपा है। माओ त्सेतुंग ने भी इसे आजमाया था, जब उन्होंने अपनी "सांस्कृतिक क्रांति" को बर्बर तरीके से लोगों पर थोपा था। अब शी जिनपिंग भी कहीं ना कहीं उसी को आगे बढ़ा रहे हैं।
लोगों को नजरबंद रख कर उनकी सोच बदलने का यह कार्यक्रम बेहद गोपनीय तरीके से चलाया जा रहा है। इस बारे में कोई सार्वजनिक आंकड़े मौजूद नहीं हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय का अनुमान है कि कम से कम "दसियों हजार लोगों को बंदी बनाकर" रखा गया है। वहीं तुर्की में रहने वाले शिनचियांग के निर्वासित लोगों के एक टीवी स्टेशन ने लीक सरकारी चीनी दस्तावेजों के आधार पर दावा किया है कि चीनी शिविरों में लगभग नौ लाख लोगों को रखा गया है। दूसरी तरफ, यूरोपियन स्कूल ऑफ कल्चर एंड थियोलॉजी के रिसर्चर आड्रियान सेंस का कहना है कि यह आंकड़ा दस लाख से भी ज्यादा हो सकता है।
जब चीनी विदेश मंत्रालय से इस बारे में टिप्पणी मांगी गई तो जवाब मिला कि उन्होंने कभी ऐसी किसी स्थिति के बारे में "कुछ नहीं सुना है"। शिनचियांग में चीनी अधिकारियों ने पूछने पर भी इस बारे में कुछ नहीं कहा। लेकिन चीन के सर्वोच्च अभियोजक चांग चुन ने शिनचियांग में अधिकारियों से कहा कि "इस कार्यक्रम का विस्तार किया जाए ताकि चरमपंथ से लड़ा जा सके"।

कैसे फंसे शिकंजे में
चीन में जन्मे बेकाली 2006 में कजाखस्तान चले गए और तीन साल बाद उन्हें वहां की नागरिकता भी मिल गई। लेकिन 25 मार्च 2017 को वह अपने माता पिता से मिलने शिनचियांग गए थे। अगले दिन पुलिस पकड़ कर उन्हें अपने साथ ले गई। उन्होंने बेकाली को एक "टाइगर चेयर" पर बिठाया और उनके पैर और हाथों को बांध दिया गया। फिर बेकाली को कलाइयों के जरिए एक दीवार से लटकाया गया। बेकाली से उनके काम के बारे में पूछताछ की गई जो चीनी लोगों को कजाख टूरिस्ट वीजा के लिए आमंत्रित करने से जुड़ा था।
बेकाली कहते हैं, "मैंने कोई अपराध नहीं किया था।" सात महीने बाद बेकाली को उनकी कोठरी से बाहर निकाला गया और उनके हाथ में रिहाई का पेपर थमा दिया गया। लेकिन वह अब भी आजाद नहीं थे। बेकाली को कारामे नाम की दूसरी जगह पर ले जाया गया जहां तीन इमारतों में एक हजार लोगों को रखा गया था।

ये लोग सूरज उगने से पहले ही जग जाया करते थे, चीनी राष्ट्रगान गाते थे और सुबह साढ़े सात बजे चीनी ध्वज फहराते थे। वे ऐसे गीते गाते थे जिनमें कम्युनिस्ट पार्टी की तारीफ की गई हो। इसके अलावा उन्हें चीनी भाषा और इतिहास पढ़ाया जाता था। उन्हें बताया जाता था कि भेड़ चराने वाले शिनचियांग के मध्य एशियाई लोग पिछड़े हुए थे। फिर उन्हें 1950 के दशक में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने "मुक्त" कराया।
जब इन लोगों को सब्जियों का सूप और डबल रोटी खाने को दी जाती थी तो उससे पहले उन्हें "धन्यवाद पार्टी! धन्यवाद मातृभूमि! धन्यवाद राष्ट्रपति शी!" कहना पड़ता था। बेकाली को लगभग 24 घंटे ही आठ अन्य लोगों के साथ ताला लगे एक कमरे में रखा जाता था। उनके बिस्तर और बदबूदार टॉयलेट साझा ही थे। रूम ही नहीं बल्कि टॉयलेट में भी कैमरे लगे हुए थे। नहाना ही नहीं बल्कि हाथ पैर भी कम ही धोने दिए जाते थे।
के 'खतरे'
चार घंटे के सत्रों में इंस्ट्रक्टर उन्हें इस्लाम के 'खतरों' के बारे में बताते थे। कैदियों के लिए क्विज रखी गई थीं, जिनका सभी जवाब न देने वाले व्यक्ति को घंटों तक दीवार के पास खड़ा रहना पड़ता था। इंस्ट्रक्टर पूछते थे, "आप चीनी कानून को मानते हो या फिर शरिया को? क्या आप इस बात को समझते हैं कि धर्म क्यों खतरनाक है?" क्लास में मौजूद 60 लोगों को बारी बारी से सबके सामने अपनी और अपने धर्म की आलोचना करनी पड़ी थी।
बेकाली ने एक व्यक्ति को कहते हुए सुना, "मुझे मेरे पिता ने पवित्र कुरानी पढ़ाई और मैंने इसे पढ़ा क्योंकि मुझे बेहतर पता नहीं था।" बेकाली के मुताबिक एक अन्य व्यक्ति ने कहा, "मैं चीन से बाहर गया, यह जाने बिना कि विदेश में मुझ पर चरमपंथी विचारों का असर हो सकता है। अब मुझे पता है।"

एक हफ्ते बाद बेकाली को इस सेंटर में पहली बार एकांत कोठरी में रखा गया। जब एक अधिकारी उनसे मिलने आया तो वह उस पर चिल्लाए, "मुझे पीछे ले जाओ और गोली मार दो या फिर मुझे वापस जेल में भेज दो।" अधिकारी भी चिल्लाया, "मैं अब यहां और नहीं रह सकता।"
फिर 24 नवंबर को अचानक बेकाली को रिहा कर दिया गया। पहले बेकाली नहीं चाहते थे कि समाचार एजेंसी एपी उनकी इस कहानी को छापे क्योंकि इससे चीन में रहने वाले उनके परिवार को कैद किया जा सकता है। लेकिन 10 मार्च को पुलिस उनकी बहन अदीला बेकाली को ले गई। इसके एक हफ्ते बाद उनकी मां अमीना सादिक को भी वे ले गए और 24 अप्रैल को उनके पिता एब्रायम को भी। इसके बाद बेकाली ने अपना विचार बदला और दुनिया को अपनी कहानी बताने का फैसला किया। वह कहते हैं, "चीजें पहले ही बहुत आगे बढ़ चुकी हैं और अब मेरे पास खोने को कुछ भी नहीं बचा है।"
एके/एमजे (एपी)

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