मां ने सुनाई बेटे के आतंकवादी बनने की कहानी

पुनः संशोधित बुधवार, 31 अक्टूबर 2018 (12:37 IST)
क्रिस्टियान लापे का नाम आज हर जर्मन एक ऐसे आतंकवादी के रूप में जानता है, जो अपना देश छोड़ से जा जुड़ा। उसकी मां को लोग "टेररिस्ट की मां" कहते हैं। इसी मां ने हमें अपने बेटे के आतंकवादी बनने की कहानी सुनाई।

2015 की बात है। शनिवार की सुबह थी। करीब पौने छह बजे फोन की घंटी बजती है। सबीने खीज कर फोन की तरफ बढ़ती हैं। छुट्टी के दिन इतनी सुबह सुबह कौन फोन करता है भला। फोन उठाया तो पता चला क्रिस्टियान था। उनका बेटा। उस वक्त उसकी उम्र 27 साल थी। "मां, हम तुर्की में हैं। सीरिया जाने के लिए गाड़ी का इंतजार कर रहे हैं।"


क्रिस्टियान ने अपनी पत्नी यासमीना के साथ मिलकर चुपचाप ही इस्लामिक स्टेट से जुड़ने का मन बना लिया था। सबीने उसे वापस बुलाने की लिए बहुत गिड़गिड़ाई लेकिन मां की बातों को उसने अनसुना कर दिया। बस इतना ही जवाब दिया, "नहीं हम वापस नहीं लौटेंगे। हम वहां जा रहे हैं जहां अल्लाह का कहा पत्थर की लकीर है।"

दर्द भरी यादें
सबीने लापे की उम्र 50 से ऊपर है। जर्मनी के डॉर्टमुंड शहर में दो कमरे के मकान में अकेली रहती हैं। घर की दीवारों पर रंग तो दिखते हैं लेकिन बेटे की कोई तस्वीर नहीं। बस घर के दरवाजे पर उसका काफ्तान टंगा दिखता है।


मां कहती है, "यह हमेशा से यहीं था।" यह मकान ही सबीने की दुनिया है। बाहर जाने से वह कतराती हैं, आतंकवादी की मां जो हैं, लेकिन वह एक ऐसी मां भी है, जिसने अपना बच्चा खो दिया है। फिर भले ही कोई उसका दुख ना बांटे, अपने बेटे को याद करते हुए कहती हैं, "मैं उसे बहुत चाहती हूं, लेकिन अंत तक आते आते वो क्रिस्टियान बचा ही नहीं था, जो कभी मेरा बच्चा हुआ करता था।"

सबीने जल्दी जल्दी कुछ बड़बड़ाती हैं, कांपने भी लगती हैं। हमसे बात करते हुए वह काफी घबराई हुई हैं। क्रिस्टियान की कहानी आखिर उनके खुद के जीवन की कहानी जो है। घंटों तक वह हमें सुनाती हैं कि कैसे उन्होंने अपने बेटे को कट्टरपंथी बनते देखा।


सबीने कहती हैं कि क्रिस्टियान एक होनहार बच्चा था, उसमें नई चीजें सीखने की जिज्ञासा थी। लेकिन उसका बचपन बिना दिक्कतों के भी नहीं गुजरा। सबीने ने अकेले ही उसे पाला था। बड़ा हो कर जब ड्रग्स लेने लगा, तब भी सबीने उसके साथ खड़ी रही थी।

एक वक्त था जब क्रिस्टियान बहुत बीमार हो गया था। सबीने बताती है कि किसी को समझ नहीं आ रहा था कि उसे हुआ क्या है, "वो सिकुड़ता जा रहा था। खाता था पर फिर भी वजन घट रहा था। डॉक्टर कहते थे कि शायद कोई दिमागी परेशानी है।" तब वह कुछ बीस साल का था। एक रात अचानक ही पेट में इतना दर्द उठा कि मां को एंबुलेंस बुलानी पड़ी। उसी रात इमरजेंसी में उसका ऑपरेशन किया गया। डॉक्टरों को उसकी आंतों में सूजन मिली थी।

अल्लाह का शुक्र
सबीने याद करती है कि उस दिन जब क्रिस्टियान एनेस्थीसिया का असर खत्म होने के बाद होश में आया था, तब उसने एक वादा किया था। वह भगवान को शुक्रिया अदा करना चाहता था कि उसने उसे जीने का एक और मौका दिया और उसकी जान बचा ली। तब तक क्रिस्टियान का से कोई लेना देना नहीं था, सलाफी बनने के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात थी। उसका परिवार कैथोलिक ईसाई था। भले ही घर में बहुत ज्यादा धार्मिक माहौल नहीं था।

शुरू में ऐसा लगा जैसे सब कुछ बदल रहा था। कई ऑपरेशन करा लेने के बाद क्रिस्टियान की सेहत सुधरने लगी थी। वह फिर से पढ़ाई में रुचि दिखा रहा था। स्कूल की पढ़ाई खत्म होने के बाद यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की पढ़ाई करना चाहता था। स्कूल में उसकी मुलाकात मोरक्को और तुर्की के मुस्लिम लड़कों से हुई। वे इस्लाम की खूब तारीफें किया करते थे और धीरे धीरे क्रिस्टियान पर उनका खुमार चढ़ने लगा।

सबीने बताती हैं, "फिर एक दिन वो घर आया और मुझसे कहने लगा कि सोच रहा है कि धर्म बदल ले।" यह 2012 की बात है। उस वक्त सबीने खुद भी बुरे दौर से गुजर रही थीं। उनके लिव-इन पार्टनर की अचानक ही मौत हो गई थी। वह खुद भी अपने जीवन के नए मायने खोजने की कोशिश कर रही थीं। उन्हें लगा कि बेटे ने कुछ ऐसा खोज लिया है, जो उसे खुश रख सकता है। इसलिए वह खुद भी इस्लाम के करीब जाने लगी।


क्रिस्टियान के धर्म परिवर्तन करने के लगभग आधे साल बाद ही सबीने ने भी इस्लाम अपना लिया। उनके शब्दों में कहें तो वह "अल्लाह के पास लौट आईं"। सबीने कहती हैं कि धर्म बदलने से वह एक "संतुलित इंसान" बन गई थीं। वह खुद को एक उदारवादी मुस्लिम कहती हैं।

आपसी मतभेद की शुरुआत
सबीने घर से बाहर जाती हैं, तो सर ढंक लेती हैं। कहती हैं, "लेकिन चेहरा खुला ही रहता है। मैं नकाब नहीं पहनती। मुझे वो ठीक नहीं लगता। आखिरकार हम हैं तो अभी भी यहां जर्मनी में ही।" सबीने याद करती हैं कि इसी बात से क्रिस्टियान के साथ उनके मतभेद की शुरुआत हुई थी, "उसके ख्यालात बहुत जल्द ही कट्टर हो गए थे।"



उसे यह भी बुरा लगने लगा था कि उसकी मां जर्मन बाजारों में जाती, दुकानदार से बातें करती और उनसे हाथ भी मिलाती थी। एक बार उसने मां पर भड़कते हुए कहा था, "तुम ये सब नहीं कर सकती, ये हराम है।"

सबीने ने अपना रवैया नहीं बदला। वह कहती हैं, "जहां मुझे सही लगता है, वहां मैं हाथ मिलाऊंगी। जाहिर है, किसी मुस्लिम से नहीं मिलाऊंगी लेकिन जिस मिस्टर मुलर से मैं पिछले 15 सालों से टमाटर खरीद रही हूं, उन्हें मैं अचानक से यह तो नहीं कह सकती कि माफ कीजिए, अब यह नहीं चलेगा, अब मैं मुसलमान हो गई हूं।"


2013 में क्रिस्टियान ने स्कूल की पढ़ाई खत्म की। उस वक्त वह डॉर्टमुंड की तकवा मस्जिद में नियमित रूप से जाया करता था। कभी कभी सबीने भी साथ चली जाया जरती थीं। वह जानना चाहती थीं कि उनका बेटा कहां आता जाता है और किन लोगों के साथ उठता बैठता है, "शुरू में तो मैं काफी प्रभावित हुई। बतौर जर्मन तो आपको वहां बिलकुल स्टार जैसा महसूस होता है। हर कोई जानना चाहता है कि आपने इस्लाम क्यों अपनाया और हर कोई आपको चाहता है।"

पर साथ ही कुछ ऐसी भी चीजें थीं जो सबीने को बिलकुल पसंद नहीं आईं, "मैंने देखा कि बहुत सी औरतें बस वही दोहराती थीं, जो उनके पतियों ने उनसे कहा है। मैंने इस पर सवाल उठाया। मैंने उनसे कहा कि खुद कुरान पढ़ो, यूं ही आदमियों का कहा सब दोहराओ मत।"


सबीने के ये शब्द बहुतों को पसंद नहीं आए। क्रिस्टियान को भी इसका अहसास हुआ। "उन लोगों ने उसे मेरे खिलाफ भड़काना शुरू किया। वो उससे कहते कि अपनी मां को सीधा कर, वो हमारी मस्जिद के मामलों में टांग अड़ा रही है। और फिर वो मेरे पीछे पड़ जाता कि मैं ऐसा ना करूं।" सबीने कहती हैं कि इस वक्त तक भी उन्हें अपने बेटे को लेकर चिंता होनी शुरू नहीं हुई थी, "मुझे लगता था कि शायद जर्मन मुस्लिम होने के नाते उसे खुद को साबित करना पड़ रहा है।"
उस मुलाकात का अंजाम
जर्मनी में यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए एक इम्तिहान पास करना होता है। 2014 में जब क्रिस्टियान इस इम्तिहान की तैयारी कर रहा था, तब उसकी मुलाकात यासमीना से हुई। मरोक्को मूल की जर्मन यासमीना के परिवार में भी काफी दिक्कतें थीं। सबीने बताती हैं, "मैंने ही दोनों को एक दूसरे से मिलवाया था।" वह याद करती हैं कि जुम्मे की नमाज पर 17 साल की यासमीना खुद ही सबीने के पास क्रिस्टियान के बारे में बात करने आई थी। वह एक धार्मिक मुस्लिम से शादी करना चाहती थी।

सबीने कहती है कि उन्हें उस वक्त यह समझ में नहीं आया था कि यासमीना को दरअसल एक ऐसा आदमी ढूंढने का काम सौंपा गया था जिसे वह अपने साथ सीरिया ले जा सके। आज सबीने को यकीन है कि उनके बेटे के और कट्टर होने में यासमीना का बड़ा हाथ रहा है, "क्रिस्टियान उस लड़की के लिए पागल था क्योंकि वह उसे वैसे ही स्वीकार रही थी जैसा वह था। उसके मुहांसों के दाग हों, उसकी बीमारी या लगातार लगने वाले अस्पताल के चक्कर।"

करीब छह महीने बाद दोनों ने फ्रैंकफर्ट की एक मस्जिद में शादी कर ली। 2015 अभी बस शुरू ही हुआ था। तब पहली बार यासमीना ने सबीने से कहा कि वह क्रिस्टियान के साथ सीरिया जाकर इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ना चाहती है। सबीने कहती है, "मैंने उसकी बातों को संजीदगी से लिया ही नहीं क्योंकि थी तो वो बच्ची ही।" लेकिन इस वक्त तक यासमीना और क्रिस्टियान पक्की तैयारी शुरू कर चुके थे। इंटरनेट कैफे में जाकर वे अपने सफर की योजनाएं बनाते, "कोई भी इतना बेवकूफ तो नहीं होगा कि घर के आईपी अड्रेस से ही ये सब करे।"

इस बीच क्रिस्टियान की जान पहचान जर्मनी के जाने माने सलाफियों से हो चुकी थी। इनमें से एक था इब्राहिम अबु नागी। यह वही आदमी है जिसने जर्मनी में "लाइज" नाम के अभियान के तहत कुरान की अनुवादित प्रतियां मुफ्त में बाजारों में बांटना शुरू किया था। इसके अलावा क्रिस्टियान के संपर्क अबु वाला से भी थे, जिसे जर्मनी में इस्लामिक स्टेट का सबसे करीबी माना जाता है। 2016 में अबु वाला को गिरफ्तार किया गया था और फिलहाल उस पर मुकदमा चल रहा है।

सबीने बताती हैं कि अनीस आमरी से भी क्रिस्टियान के अच्छे तालुक थे। अनीस आमरी ने 19 दिसंबर 2016 को बर्लिन के एक क्रिसमस बाजार पर हमला किया था। आमरी जुलाई 2015 में झूठी पहचान के साथ शरणार्थी बन कर जर्मनी में दाखिल हुआ था। इसके कुछ ही हफ्तों बाद क्रिस्टियान जर्मनी छोड़ कर चला गया था।


सबीने बताती हैं कि जर्मनी छोड़ने से पहले भी क्रिस्टियान डॉर्टमुंड पुलिस के रडार पर था और आज तक पुलिस सबीने पर नजर रखती है। कई बार उन्हें अपना फोन पुलिस को देना पड़ता है। पुलिस के अनुसार वह इंटरनेट में काफी सक्रिय हैं। फेसबुक के जरिए वह ऐसे लोगों से संपर्क करती हैं, जिनके तार सलाफियों से जुड़े हैं। अपनी सफाई में सबीने का कहना है वह ऐसा सिर्फ अपने बेटे के बारे में ज्यादा से ज्यादा मुमकिन जानकारी जुटाने के लिए करती हैं।

से जुड़ा नाता
सितंबर 2015 में क्रिस्टियान और यासमीना आईएस के पास जाने के लिए रवाना हुए। सबीने याद करती हैं कि पूरा दिन उन्हें फोन आते रहे और व्हाट्सऐप पर लगातार मेसेज भी। फिर हफ्ता भर कोई संपर्क नहीं हुआ। क्रिस्टियान हमेशा नंबर बदल बदल कर फोन करता रहता। सबीने किसी भी तरह उससे संपर्क नहीं कर सकती थी, "एक बार वह रक्का में था, फिर इदलिब में और अबु कमाल में, और एक बार तो इराक में भी था।"

नजरें झुका कर सबीने कहती हैं कि उन्होंने अपने बेटे को वापस बुलाने की बहुत कोशिशें की, "लेकिन आपको यह सुनने में जितना भी अजीब लगे पर वो दिलो-जान से वहीं था। और फिर एक दिन वो वीडियो आया। वह पल था जब वो मेरे लिए बिलकुल अनजान हो गया था।"



यह सितंबर 2016 की बात है। क्रिस्टियान के देश छोड़ने के ठीक एक साल बाद की। इस्लामिक स्टेट से नाता रखने वाली एक वेबसाइट "फुरत मीडिया" ने एक वीडियो जारी किया। इसमें क्रिस्टियान अपनी कहानी सुना रहा था। जंग के लिए उसने अपना नाम अबु इसा अल अलमानी रखा था। उसने अपनी बीमारी के बारे में बताया, जिंदगी से जुड़े अपने सवालों और उन जवाबों के बारे में भी जो उसे इस्लाम में आ कर उसे मिले। इस वीडियो में वह खुल कर यूरोप पर हमले की बात भी कर रहा था।

क्रिस्टियान के सीधे कैमरे में देख कर बात करने वाले दृश्यों के अलावा वीडियो में कुछ ऐसे विचलित करने वाले दृश्य भी थे जिनमें एक आदमी का जंजीर से बंधा हुआ हाथ दिखाई दे रहा था और फिर एक आरी नजर आती है। वीडियो देख कर यह तो समझ में नहीं आता कि क्या क्रिस्टियान ने ही उस आदमी का हाथ काटा। अगले दृश्य में क्रिस्टियान ही उस प्रताड़ित आदमी के माथे को चूमता हुआ दिखाई देता है।

सबीने ने जब यह वीडियो देखा तो उनकी दुनिया वहीं बिखर गई, "मेरी समझ के बाहर है कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है। यह सही नहीं है। ऐसा कुरान में कहीं नहीं लिखा है, किसी एक भी शुरा में नहीं।" सबीने बताती हैं कि जब उन्होंने फोन पर अपने बेटे को यही बात समझाने की कोशिश की तो वह उन पर भड़क गया और उन्हें नास्तिक कहने लगा, "उसने मुझसे कहा कि मैंने अपने धर्म को ठीक से समझा ही नहीं है।"


इस वीडियो के साथ ही वह आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई कि एक दिन क्रिस्टियान पछतावे के साथ लौट आएगा, "यह तो साफ ही था कि उसे दस से पंद्रह साल की कैद की सजा तो मिलनी ही थी।" सबीने मानती हैं कि सजा मिलना जायज भी था। वह आगे कहती हैं, "लेकिन कम से कम जेल में मैं उससे मिल तो पाती।" हमसे बातचीत के दौरान सबीने ने अबु इसा अल अलमानी के तौर पर अपने बेटे का जिक्र नहीं किया। हमसे कहने लगीं, "मेरे लिए वह क्रिस्टियान था और क्रिस्टियान ही रहेगा।"

क्या क्रिस्टियान ने सीरिया जा कर लोगों की जान भी ली? जब हमने यह सवाल किया तो सबीने ने कोई सीधा सीधा जवाब नहीं दिया। कहने लगीं, "उसने अल बगदादी के लिए आलू तो छीले नहीं। वह पूरा वक्त उसके पीछे खड़ा था और मेरे लिए यह बेइंतहा मुश्किल है। क्रिस्टियान इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहता था। वह बतौर एक जर्मन मुस्लिम सच्चाई के लिए अपनी जान देना चाहता था।"


फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसकी सबीने ने बिलकुल भी उम्मीद नहीं की थी। उनके पास व्हाट्सऐप पर एक तस्वीर आई। उत्साह से भरा क्रिस्टियान और उसके बगल में पूरी तरह पर्दा किए हुए यासमीना। फिर एक और तस्वीर आई। एके 47 बंदूक और उसकी मैगजीन पर रखा एक प्रेग्नेंसी टेस्ट स्ट्रिप, जो पॉजिटिव था। सबीने कहती हैं कि उस तस्वीर को देख कर वह चकरा गईं, "दोनों बहुत खुश थे और उन्हें बहुत नाज भी था। लेकिन बाप बनने के अहसास ने क्रिस्टियान को और भी ज्यादा कट्टर बना दिया था।"

यूं खत्म हुआ किस्सा
1 अगस्त 2017 को सबीने ने आखिरी बार अपने बेटे से बात की, "कह रहा था कि फिर जंग पर जा रहा है और मुझसे बहुत प्यार करता है।" उस दिन को याद करते हुए सबीने कहती हैं कि एक बुरे से अहसास ने उन्हें घेर लिया था, जैसे कुछ गलत होने का अंदेशा हो रहा हो। सबीने को यकीन है कि क्रिस्टियान ने भी मां के इस डर को महसूस किया था। यासमीना के लिए वह पहले ही इंतजाम कर गया था। अगर जंग में उसे कुछ हो जाता, तो उसके चुने हुए इराकी लड़ाके से यासमीना को निकाह करना था। सब कुछ पहले से ही तय किया जा चुका था।

19 सितंबर को अगला फोन आया। इस बार फोन पर बहु थी, "उसने बहुत फख्र से कहा कि इसा शहीद हो गया है। अल्लाह के लिए जंग लड़ते हुए वह मारा गया है।" यह कहते हुए सबीने की आवाज में दर्द भर आता है। आगे कहती हैं, "नहीं, क्रिस्टियान अल्लाह के लिए नहीं, अल बगदादी और उसके गुंडों की जंग में मारा गया है।" यह कहते कहते मां की आंखें भर आती हैं। आगे कहती हैं, "ऐसे पल में आप कुछ सोचने लायक ही नहीं रह जाते।"

सोशल मीडिया में जल्द ही क्रिस्टियान की खून से लथपथ लाश की तस्वीर फैल गई थी। होम्स के करीब रेगिस्तान में वह मरा हुआ मिला था। बेटे की मौत की खबर आने के बाद सबीने को जिस दर्द, जिस दुख और जिस बेबसी से गुजरना पड़ा था, वह हमें उसके बारे में भी बताती हैं। सबीने कहती हैं कि धर्म ने उन्हें सब्र रखने में मदद की है। वही इस्लाम, जिसकी व्याख्या उनके बेटे ने कुछ और ही कर ली थी, सबीने उसी इस्लाम में शांति खोजती हैं।

आज सबीने एकदम अकेली हैं। उनके पास अपना कहने वाला कोई भी नहीं है। वह देखती हैं कि जैसे ही लोगों को पता चलता है कि वह कौन हैं, वे उनसे नजरें चुराने लगते हैं। लोग हैरान हो कर पूछते हैं, "तुम उसी क्रिस्टियान लापे की मां हो?" सबीने ने यह सवाल ना जाने कितनी बार सुना है। अब वह इसका जवाब भी देने लगी हैं, "हां, मैं उसी क्रिस्टियान लापे की मां हूं। लेकिन मुझसे डरने की कोई जरूरत नहीं है। ना तो मैंने अपने कपड़ों के अंदर कोई कलाश्निकोव छिपा रखी है और ना ही मैं लोगों के हाथ काटती फिरती हूं।"

"आतंकवादी की मां"। क्रिस्टियान की मौत के बाद से सबीने को दुनिया इसी नाम से पुकारती है। घर के पास दवा लेने दुकान पर जाती हैं, तो वहां भी ताने मिलते हैं, "हाल ही में मैं डॉक्टर का पर्चा ले कर गई, तो उन्होंने मुझे वहां से चले जाने को कहा। सब जगह लोग मुझे गाली देते हैं। मैं वो मां हूं जो अपने बच्चे की ठीक से परवरिश नहीं कर पाई। कई बार तो लोग मुझे ही आतंकवादी घोषित कर देते हैं।" काफी वक्त से वह नमाज पढ़ने मस्जिद भी नहीं गई हैं क्योंकि उनसे कहा गया है कि उनके वहां आने से मस्जिद का नाम बदनाम होगा।

2017 के अंत में क्रिस्टियान के बेटे का जन्म हुआ। उसी दिन, जिस दिन क्रिस्टियान का जन्मदिन था। सबीने अपने फोन पर हमें तस्वीरें दिखाती है। बच्चे का चेहरा बाप से खूब मेल खाता है। इस बीच यासमीना ने उस इराकी लड़ाके से शादी कर ली है, जिसे क्रिस्टियान उसके लिए चुन कर गया था। वह सबीने से संपर्क करती है, लेकिन कई बार हफ्ते बीत जाते हैं और उसका कोई अता पता नहीं होता।


अब सबीने की सबसे बड़ी ख्वाहिश यही है कि एक बार अपने पोते को अपनी गोद में उठा सकें। लेकिन उन्हें लगता है कि उनका यह सपना बस सपना ही बन कर रह जाएगा, "क्रिस्टियान को ले कर मुझे अहसास हो गया था कि मैं उसे खो दूंगी, और मैं जानती हूं कि इस बच्चे को भी मैं खो ही दूंगी।"
रिपोर्ट एस्थर फेल्डेन


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