अस्त हुआ अटल सितारा

पुनः संशोधित गुरुवार, 16 अगस्त 2018 (19:41 IST)
दक्षिणपंथी राजनीति में आकंठ डूबे होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीतिक और वैचारिक विरोधियों के बीच जो सम्मान अर्जित किया वह आज की परिस्थितियों में सर्वथा दुर्लभ है। उनके दोस्त पार्टी से ज्यादा उसके बाहर थे।

बीते पांच-सात दशकों में ऐसे कम ही नेता हुए हैं जिन्हें अटल बिहारी वाजपेयी जैसी स्वीकार्यता हासिल हुई हो। साफ नीयत, सरल स्वभाव, कुशल वक्ता और कठिनाइयों में डटे रह कर कविहृदय अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत की बहुदलीय राजनीति को समृद्ध करने वाले नेताओं की पहली पंक्ति में जगह बनाई।


गठबंधन सरकारों के दौर में जब बीजेपी सांप्रदायिकता के नाम पर "अछूत" मानी जा रही थी और संसद में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद ज्यादातर दलों ने उससे दूर रहने में भलाई समझी, तब यह बात बहुत खुले तौर पर और बार बार कही जाती रही कि "अटल जी तो अच्छे हैं लेकिन पार्टी गलत है।" ऐसे मौकों पर उन्होंने बड़ी दृढ़ता से यह साफ कर दिया था कि भारतीय जनता पार्टी के बाहर जाने का विचार उनके मन में रत्ती भर भी नहीं है। अपनी ही पार्टी में आगे चल कर खुद को मुखौटा समझे जाने की बात भी उनके मन में आई पर इसे लेकर कभी उन्होंने बहुत विवाद नहीं उठाया।


वाजपेयी आजाद भारत के अकेले ऐसे नेता थे जिन्हें आठ प्रधानमंत्रियों का विपक्षी नेता के रूप में सामना करने के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौका मिला। निश्चित रूप से इस लंबे अनुभव ने उनके अंदर एक बड़े हृदय वाले चतुर राजनेता और कूटनीतिज्ञ को विकसित होने का मौका दिया।


प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व करने से पहले ही वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के प्रतिनिधि के रूप में अपनी बातों का लोहा मनवा चुके थे। संयुक्त राष्ट्र में उनके भाषणों की एक लंबी कतार है जिनसे उनकी दूरदृष्टि, एक राष्ट्र के लिए जरूरी मुद्दों की गहरी समझ और कठिन परिस्थितियों में भी अपनी बातों से सामने वाले को परास्त करने का कौशल दिखाई देता है। भाषण देने मंच पर आते तो पहले वाक्य से ही लोगों को बांध लेते। इस बेजोड़ हुनर ने उनके व्यक्तित्व में बड़ा योगदान दिया।


संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में पाकिस्तान के सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने सीमा पार आतंकवाद के आरोपों पर कहा, "ताली एक हाथ से नहीं बजती।" जब अटल जी की बारी आई तो उन्होंने कहा "यह सच है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती लेकिन चुटकी एक हाथ से जरूर बजती है, बजाते रहिए।"


उनके शासनकाल में देश के भीतर और बाहर ऐसे कई मौके आए जो भारतीय नेतृत्व की निर्णय क्षमता का इम्तिहान थे। परमाणु परीक्षण, करगिल युद्ध, अमेरिका पर अल कायदा के हमले के बाद आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जंग, इराक पर अमेरिकी हमला, परवेज मुशर्रफ को बातचीत के लिए भारत बुलाना, जम्मू कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगरानी में चुनाव, कश्मीरी अलगाववादियों से बातचीत, बांग्लादेश के साथ तीन बीघा गलियारे का विवाद, एयर इंडिया के विमान का अपहरण जैसी कई चुनौतियां उनके सामने आई जिनका उन्होंने सामना किया।


उनके निर्णयों की आलोचना भी हुई लेकिन वे अपने मार्ग पर अटल रहे। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात के दंगों के बाद राजधर्म निभाने का मशविरा देने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया जबकि मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला उन्हीं ने किया था।


भारतीय जनता पार्टी ने राममंदिर के मुद्दे को हवा देकर अपने लिए जनाधार जुटाने का भरपूर प्रयास किया, पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर आम सहमति थी और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उसमें हिस्सा लेने से कभी गुरेज नहीं किया। पार्टी को मिली कामयाबियों ने उन्हें इस मार्ग पर डटे रहने के लिए विवश भी किया लेकिन जानकार बताते हैं कि वाजपेयी कभी भी बल प्रयोग या आंदोलन के जरिए विवादित भूमि पर राममंदिर बनवाने के पक्ष में नहीं थे। उनकी यही कोशिश थी कि इसका हल बातचीत या फिर अदालत के जरिए निकले। उनकी मंशा चाहे जो भी हो लेकिन बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के कृत्य ने उनके माथे पर एक दाग तो लगा ही दिया।


सिर्फ राजनेता ही नहीं, उनके अंदर एक कुशल प्रशासक भी था जो नीतियां बनाने और उन पर चलने का साहस दिखा सकता था। नदियों को जोड़ने, देश भर में राजमार्गों को सुदृढ़ करने और नई टेलिकॉम नीति का जो काम उन्होंने शुरू करवाया उसका नतीजा आज भारत के बुनियादी ढांचे में बड़े परिवर्तनों के रूप में दिखाई देता है। अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की जो पहल पीवी नरसिंहा राव के शासन काल में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के निर्देशन में शुरू हुई, उसे वास्तविक ऊंचाई देने का श्रेय वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार को जाता है।


वाजपेयी ने अपने विरोधियों का कभी तिरस्कार नहीं किया। बेजोड़ वक्ता थे लेकिन विरोधियों पर निजी हमले या उन पर लांछन लगाने की कोशिशों से हमेशा दूर रहे, हालांकि उनकी मुखालफत करने का कभी कोई मौका भी हाथ से जाने नहीं दिया। कम्युनिस्ट पार्टी में बड़े नेता रह चुके सोमनाथ चटर्जी तमाम दलगत मतभेदों के बावजूद वाजपेयी के घनिष्ठ मित्रों में थे। संसद के भीतर और बाहर जिस गरिमा की अपेक्षा नेताओं से की जाती है उसके वे सदैव ध्वजवाहक रहे और 10 बार के सांसद रहे अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ संसद में ऐसा कोई वाकया ध्यान में नहीं आता जब उनके आचरण से किसी को शिकायत हुई हो।


आजीवन अविवाहित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदर्शों पर अडिग रहने के बावजूद उन्होंने निजी जिंदगी में बंधनों को स्वीकार नहीं किया और यहां वे खुलेपन के पक्षधर रहे। हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान उनके जीवन का मूलमंत्र था लेकिन इसमें किसी के लिए नफरत या द्वेष के लिए कोई जगह नहीं थी। उनकी एक कविता है, मेरे प्रभु मुझे इतनी ऊंचाई कभी ना देना, गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी ना देना।


भारत में बहुदलीय राजनीति की संभावनाओं और सीमाओं के बीच लोकतंत्र को मजबूत करने में जिन लोगों की प्रमुख भूमिका रही, अटल बिहारी वाजपेयी उस कतार के राजनेता थे। यह वो पीढ़ी थी जिसने भारत में आजादी के आंदोलन को अंजाम तक पहुंचते, फिर विभाजित और स्वाधीन भारत के निर्माण की चुनौतियों को बनते, उभरते और कुछेक मामलों में खत्म होते देखा था।


यह वो वक्त था जब भारत के लिए आगे बढ़ने का मार्ग स्पष्ट नहीं था और आजादी के नायक अपनी सोच को भारत की सोच बनाने में जुटे थे। तब से लेकर भारत, पाकिस्तान और चीन की लड़ाइयों, आपातकाल, आरक्षण, राम जन्मभूमि विवाद और फिर आर्थिक उदारीकरण तक के हर दौर की राजनीति ने अटल बिहारी वाजपेयी को एक नेता के तौर पर गढ़ा। इनमें से और राम जन्मभूमि आंदोलन की छाप उनके राजनीतिक जीवन पर सबसे ज्यादा गहरी थी।



इन सब की परिणति पहले 13 दिन फिर 13 महीने और फिर कार्यकाल पूरा करने वाली भारत की पहली गैरकांग्रेसी सरकार के रुप में हुई। हालांकि यहां तक पहुंचते पहुंचते आजादी के पचास साल और वाजपेयी की उम्र का तीन चौथाई हिस्सा बीत चुका था। उन्होंने खुद ही लिखा था, "जीवन की ढलने लगी सांझ, उम्र घट गई डगर कट गई, बदले हैं अर्थ, शब्द हुए व्यर्थ, शांति हुए बिना, जीवन की खुशिया हैं बांझ...जीवन की ढलने लगी सांझ।"


कश्मीर समस्या के हल में "कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत" के रास्ते पर चलने का उनका नारा हो या फिर "जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान" की उक्ति में देश के विकास की इबारत लिखने की मंशा, आने वाली पीढ़ियों को उन्होंने आगे चलने का एक मार्ग तो दिखा ही दिया था। वे कवि भी थे, वक्ता भी और राजनेता भी लेकिन तीनों रूपों मे वे एक दूसरे के पूरक थे, विरोधी नहीं। भारत की राजनीति में उनकी गैरमौजूदगी से खाली हुई जगह को भरने में लंबा वक्त लगेगा।

रिपोर्ट निखिल रंजन



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