कहानी : मेरी छात्रा


बात पुरानी हो चली है। उन्नीस सौ चौहत्तर ईसवीं में कठिघरा नाम के गांव में एक नई शिक्षिका आई। हमेशा वह समय से विद्यालय आती। विद्यालय में कई बच्चे स्कूल आना छोड़ रहे थे। सबकी सूची बनाकर वह बच्चों के घर संपर्क साधने लगी। वह चाहती थी कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न हो। कुछ बच्चे मार की डर से विद्यालय छोड़ रहे थे।
 
अध्यापकों का उस समय का प्रसिद्ध फॉर्मूला था 'या तो पढ़ाई छोड़ दोगे या पढ़ने लगोगे'।
 
नई शिक्षिका ने बच्चों को पढ़ाने का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वह अन्य अध्यापिकाओं से भिन्न थी। धीरे-धीरे बच्चों के मन का भय निकलने लगा। बच्चे अपनी नई अध्यापिका की सब बात मानने लगे।
 
विद्यालय का वातावरण बहुत हद तक बदल चुका था। अन्य चार अध्यापिकाओं से बच्चे थोड़ा-बहुत डरते से थे। अध्यापिका सत्यभामा की मेहनत से पूरे गांव के लोग काफी प्रभावित थे।
 
सत्यभामा पहले इमिलिया और अढ़ौरी गांव में तैनात रही थी। वहां के गांव के लोग और बच्चे बार-बार उस सत्यभामा के पुनः तैनाती करवाने का संदेश भेजते। वहां के बच्चे अब भी उस महान शिक्षिका की याद में आंसू न रोक पाते।
 
कठिघरा गांव में लगभग सब लोग खेतिहर और मजदूर थे। स्कूल के पास में एक गहरा तालाब था। एक दिन इंटरवेल की घंटी लगी तो रोज की तरह आज भी बच्चे खेलने के लिए भाग खड़े हुए। सत्यभामा ने उच्च स्वर में आदेशित किया 'धीरे से निकलिए भागिए नहीं, नहीं तो चोट लग सकती है'।
 
भले ही सत्यभामा बच्चों को मारती-पीटती न हो, पर बच्चे फिर भी उसकी सारी बात मानते थे। सब बच्चे अनुशासन के साथ कक्षा से बाहर निकले। एक बच्चा फिर भी बहुत तेज भागा।
 
 
 

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