कृष्ण और उनका जीवन

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कृष्ण पूर्ण योगी और यौद्धा थे। यमुना के तट पर और यमुना के ही जंगलों में गाय और गोपियों के संग-साथ रहकर बाल्यकाल में कृष्ण ने पूतना, शकटासुर, यमलार्जुन, कलिय-दमन, प्रलंब, अरिष्ट आदि का संहार किया तो किशोरावस्था में बड़े भाई बलदेव के साथ कंस का वध किया। जवान होते-होते उनकी दूर-दूर तक ख्याति फैल गई थी। फिर भी कृष्ण का जीवन सफलताओं और असफलताओं की एक लंबी और रोचक दास्तान है।

कृष्ण के बाल जीवन पर अनेक किस्से लिखे गए हैं लेकिन महाभारत में कृष्ण के बाल्यकाल का वृत्तांत नहीं मिलता। महाभारत के हरिवंश पर्व में ही कृष्ण का जीवन वृत्तांत मिलता है। महाभारत के भीष्म पर्व में भीष्म द्वारा कृष्ण की जो महिमा का वर्णन किया गया है वह शिशुपाल द्वारा आपत्ति लिए जाने के कारण ही किया गया था। यह सब वचन प्रशंसा के निमित्त ही कहे गए थे। भीष्म ने कृष्ण के उत्तम चरित्र को देखकर उन्हें नारायण हरि का पद दिया था।

कृष्ण जन्म : हिंदू मान्यता अनुसार विष्णु ने आठवें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में आठवें अवतार श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सात मुहूर्त निकल गए और आठवाँ उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न में हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में ईसा से लगभग 3200 वर्ष पूर्व उनका जन्म हुआ। ज्योतिषियों अनुसार उस समय शून्य काल (रात 12 बजे) था।

ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग 1500 ई.पू. माना जाता है, जो कि अनुचित है। हिंदू काल गणना अनुसार आज से लगभग 5235 वर्ष पूर्व कृष्ण का जन्म हुआ था।

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कालिया नाग : कदंब वन के समीप एक नाग जाति का व्यक्ति रहता था, जिसे पुराणों ने नाग ही घोषित कर दिया। उक्त व्यक्ति बालक कृष्ण के द्वार पर आ धमका था। जबकि घर में कोई नहीं था, लेकिन बलशाली कृष्ण ने उक्त व्यक्ति को तंग कर वहाँ से भगा दिया। इसी प्रकार वहीं ताल वन में दैत्य जाति का धनुक नाम का अत्याचारी व्यक्ति रहता था जिसे बलदेव ने मार डाला था। उक्त दोनों घटना के कारण दोनों भाइयों की ख्‍याति फैल गई थी।

कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका : कृष्ण को चाहने वाली अनेक गोपियाँ और प्रेमिकाएँ थीं। कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेम संबंधों को आध्यात्मिक और अति श्रृंगारिक रूप दिया गया है। महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता।

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ हैं। राधा, ललिता आदि उनकी प्रेमिकाएँ थीं। उक्त सभी को सखियाँ भी कहा जाता है। राधा की कुछ सखियाँ भी कृष्ण से प्रेम करती थीं जिनके नाम निम्न हैं:- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी हैं। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की कुछ ही प्रेमिकाएँ थीं जिनके नाम इस तरह हैं:- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा।

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कंश का वध : किसी ने कंस को बताया कि वासुदेव और देवकी की संतान ही उसकी मृत्यु का कारण होगी। अत: कंस उक्त दोनों की संतान के उत्पन्न होते ही मार डालता था। कृष्ण वासुदेव की आठवीं संतान थे। वासुदेव इस संतान को चोरी-चोरी नंदग्राम में नंद ग्वाले के घर रख आए और फिर कृष्ण का वहीं पालन-पोषण हुआ। इसी काल में कृष्ण की दूसरी माँ के पुत्र बलराम को भी वहाँ लाकर रख दिया था। दोनों भाई वहीं पले-बढ़े।

कालिया और धनुक का सामना करने के कारण दोनो भाइयों की ख्याति के चलते कंस समझ गया कि ज्योतिष भविष्यवाणी अनुसार इतने बलशाली तो वासुदेव और देवकी के पुत्र ही हो सकते हैं। तब कंस ने दोनों भाइयों को पहलवानी के लिए निमंत्रण ‍दिया क्योंकि कंस चाहता था कि इन्हें पहलवानों के हाथों मरवा दिया जाए, लेकिन दोनों भाइयों ने पहलवानों के शिरोमणि चाणूर और मुष्टिक को मारकर कंस को पकड़ लिया और सबके देखते-देखते ही उसको भी मार दिया।

कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा: योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर हासिल की थी। उस काल में उज्जैन को उज्जयिनी व अवंतिका कहा जाता था। वहाँ से शिक्षा पाकर वे मथुरा की रक्षा करने लगे। कंस के मरने पर उन्होंने मथुरा में वृष्णि, अंधक, भोज और शनि वंशों का गणराज्य स्थापित किया था।

जरासंघ का आक्रमण: जरासंघ कंस का श्वसुर था। कंस की पत्नी मगथ नरेश जरासंघ को बार-बार इस बात के लिए उकसाती थी कि कंस का बदला लेना है। इस कारण जरासंघ ने मथुरा के राज्य को हड़पने के लिए कई आक्रमण किए तब अंतत: कृष्ण ने अपने सजातियों को मथुरा छोड़ देने पर राजी कर लिया। वे सब मथुरा छोड़कर रैवत पर्वत के समीप कुशस्थली पुरी (द्वारिका) में जाकर बस गए।- महाभारत मौसल- 14.43-50

भौमासुर से युद्ध : इस पलायन के दौरान हिमालय जिसे देवलोक कहा जाता था वहाँ भौमासुर का राज्य हो चला था जो देवताओं को सताया करता था। उसने इंद्र की माता अदिति के कुंडल छीन लिए थे और वह उसे वापस नहीं कर रहा था। तब देवों के कहने पर कृष्ण ने भौमासुर से युद्ध करना स्वीकार कर लिया। लेकिन उन्होंने दो शर्तें उपस्थित कर दीं। एक तो उन्होंने सुदर्शन चक्र माँगा और दूसरा युद्ध के लिए गरुड़ यान। तब ही वे युद्ध करेंगे। देवराज इंद्र ने यह स्वीकार कर लिया। चक्र और गरुढ़ यान होने के कारण उन्हें विष्णु का अवतार माना जाने लगा। क्योंकि यह दोनों ‍वस्तुएँ सिर्फ विष्णु के पास ही होती थीं। सुदर्शन चक्र को उस काल में बहुत ही घातक अस्त्र माना जाता था।

कृष्ण की गीता : वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों का सार 'गीता' को माना है। कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान महाराजा पांडु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र अर्जुन को जो ज्ञान दिया वह गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गीता में सब कुछ है- दर्शन है, योग है, धर्म है और नीति भी। गीता कृष्ण द्वारा महाभारत के भीष्मपर्व में अर्जुन को दिया गया ज्ञान है। इसे महाभारत के साथ पढ़ने और समझने से ही लाभ मिलता है। अन्यत्र से नहीं।

महाभारत युद्ध : विश्व इतिहास में महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध के नाम से जाना जाता है। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने एक बाण लगने के कारण देह छोड़ दी थी।

महाभारत युद्ध चंद्रवंशियों के दो परिवार कौरव और पांडव के बीच हुआ था। उक्त लड़ाई आज के हरियाणा स्थित कुरुक्षेत्र के आसपास हुई मानी गई है। इस युद्ध में पांडव विजयी हुए थे। इस लड़ाई में कृष्ण पांडवों के साथ थे। बलदेव दुर्योधन की ओर से लड़ना चाहते थे लेकिन कृष्ण के पांडवों की ओर होने से उन्होंने युद्ध का त्याग कर दिया। इस युद्ध के बाद यदुवंशियों में आपसी फूट पड़ गई और वे सभी आपस में लड़कर ही मर गए। पारिवारिक युद्ध के चलते कृष्ण के पुत्र साम्ब, चारुदेष्ण, और प्रद्युम्न तथा पोते अनिरुद्ध भी जब युद्ध में मारे गए तो कृष्ण ने क्रोधवश शेष बचे यादवों का नाश कर दिया।- महाभारत मौसल-3.41-3.46

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तपस्या और महाप्रयाण : यादवों का नाश होने के पश्चात्य उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपने यदुवंशियों का विनाश देखा इससे पूर्व आपने कुरुवंशियों का नाश देखा। अब मैं यादवों के बिना द्वारिका की रक्षा करने में असमर्थ हूँ। अंत: वन में जाकर बलदेवजी के साथ तपस्या करूँगा।- महाभारत मौसल-4-6

वन में श्रीकृष्ण भूमि पर लेटे थे। उस समय एक व्याघ मृगों को मारने की इच्छा से उधर आ निकला। व्याघ ने दूर से श्रीकृष्ण को मृग समझकर उन पर बाण चला दिया। जब वह पास आया तो पीताम्बरधारी कृष्ण को वहाँ देख भयभीत हो खड़ा रह गया। 119 वर्ष की उम्र में कृष्ण ने देह छोड़ दी।

परमात्मा और कृष्ण : कृष्ण को महर्षि वेद व्यास परमात्मा मानते थे। महाभारत को छोड़कर कृष्ण के जीवन चरित्र के संबंध में पुराणों या अन्य ग्रंथों में अतिरंजित चित्रण किया गया। जबकि गीता और महाभारत में अनेक स्थानों पर कृष्ण ने स्वयं को कभी ईश्वर या परमात्मा नहीं कहा।

गीता के श्लोक 13-19 में परमात्मा, आत्मा और प्रकृति में भेद माना है। गीता और महाभारत में कई स्थानों पर भगवान कृष्ण ने परमात्मा की सत्ता को स्वीकार कर यह सिद्ध किया है कि वे स्वयं परमात्मा नहीं हैं। गीता में अनेक स्थानों पर परमात्मा को अन्य वचन में कहा गया है। जहाँ उत्तम पुरुष (मैं) में लिखा गया है वहाँ उक्त काल व परिस्थितिवश विशेष प्रयोजन में ऐसा हो सकता है।

भगवान का अर्थ जो समस्त ऐश्वर्य-युक्त हो तथा धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान वैराग्य से युक्त हो। जो योगयुक्त मोक्ष में स्थित है उसे ही स्थितप्रज्ञ, भगवान, अरिहंत या बुद्ध कहा जाता है। भगवान शब्द का उपयोग परमात्मा या ईश्वर के लिए भी किए जाने से भ्रम उत्पन्न होता है।

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
'न कोई मरता है और न ही कोई मारता है, सभी निमित्त मात्र हैं...सभी प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर के थे, मरने के उपरांत वे बिना शरीर वाले हो जाएँगे। यह तो बीच में ही शरीर वाले देखे जाते हैं, फिर इनका शोक क्यों करते हो।'- कृष्
अंतत: कृष्ण के जीवन के कई उलझे हुए पहलू हैं जिन्हें समझना आसान नहीं है किंतु फिर भी महाभारत का गहन अध्ययन किया जाए तो उनके जीवन की सच्चाई को जाना जा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम कृष्ण के जीवन को पौराणिक गाथा और चमत्कारों से हटाकर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ लिखें। इति। श्रीकृष्णाय शरणम मम्।


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