भगवान बाहुबली और श्रवणबेलगोला का रहस्य

अनिरुद्ध जोशी|
के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के दो पुत्र हुए भरत और बाहुबली। भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत रखा गया था। चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता ऋषभदेव थे और उनके 100 भाइयों में से प्रमुख का नाम 'बाहुबली' था। ऋषभदेव के जंगल चले जाने के बाद राज्याधिकार के लिए बाहुबली और भरत में युद्ध हुआ। बाहुबली ने युद्ध में भरत को परास्त कर दिया।

लेकिन इस घटना के बाद उनके मन में भी विरक्ति भाव जाग्रत हुआ और उन्होंने भरत को राजपाट ले लेने को कहा, तब वे खुद घोर तपश्चरण में लीन हो गए। तपस्या के पश्चात उनको केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। भरत ने बाहुबली के सम्मान में पोदनपुर में 525 धनुष की बाहुबली की मूर्ति प्रतिष्ठित की। प्रथम सबसे विशाल प्रतिमा का यह उल्लेख है।

क्यों हुआ युद्ध?
राजा भरत को अपनी आयुधशाला में से एक दिव्य चक्र प्राप्त हुआ। चक्र रत्न मिलने के बाद उन्होंने अपना दिग्विजय अभियान शुरू किया। दिव्य चक्र आगे चलता था। उसके पीछे दंड चक्र, दंड के पीछे पदाति सेना, पदाति सेना के पीछे अश्व सेना, अश्व सेना के पीछे रथ सेना और हाथियों पर सवार सैनिक आदि चलते थे। जहां-जहां चक्र जाता था, वहां- वहां के राजा या अधिपति सम्राट भरत की अधीनता स्वीकार कर लेते थे। इस तरह पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से उत्तर और उत्तर से पश्‍चिम की ओर उन्होंने यात्रा की और अंत में जब उनके पुन: अयोध्या पहुंचने की मुनादी हुई तो राज्य में हर्ष और उत्सव का माहौल होने लगा। लेकिन अयोध्या के बाहर ही चक्र स्वत: ही रुक गया, क्योंकि राजा भरत ने अपने भाइयों के राज्य को नहीं जीता था।

बाहुबली को छोड़कर सभी भाइयों ने राजा भरत की अधीनता स्वीकार कर ली। भरत का बाहुबली से मल्ल युद्ध हुआ जिसमें बाहुबली जीत गए। ऐसे में बाहुबली के मन में विरक्ति का भाव आ गया और उन्होंने सोचा कि मैंने राज्य के लिए अपने ही बड़े भाई को हराया। उन्होंने जीतने के बाद भी भारत को अपना राज्य दे दिया। इस तरह भरत चक्रवर्ती सम्राट बन गए और कालांतर में उनके नाम पर ही इस नाभि खंड और उससे पूर्व हिमखंड का नाम भारत हो गया।

बाहुबली की विशालकाय मूर्ति :
भारतीय राज्य के मड्या जिले में श्रवणबेलगोला के गोम्मटेश्वर स्थान पर प्राचीन जैन तीर्थस्थल स्थित है। यहां पर भगवान बाहुबली की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है, जो पूर्णत: एक ही पत्थर से निर्मित है। इस मूर्ति को बनाने में मूर्तिकार को लगभग 12 वर्ष लगे। बाहुबली को गोमटेश्वर भी कहा जाता था।

श्रवणबेलगोला में गोम्मटेश्वर द्वार के बाईं ओर एक पाषाण पर शक सं. 1102 का एक लेख कानड़ी भाषा में है। इसके अनुसार ऋषभ के दो पुत्र भरत और बाहुबली थे। ऋषभदेव के जंगल चले जाने के बाद राज्याधिकार के लिए बाहुबली और भरत में युद्ध हुआ। बाहुबली ने युद्ध में भरत को परास्त कर दिया। लेकिन इस घटना के बाद उनके मन में भी विरक्ति भाव जाग्रत हुआ और उन्होंने भरत को राजपाट ले लेने को कहा, तब वे खुद घोर तपश्चरण में लीन हो गए। तपस्या के पश्चात उनको यहीं पर केवल ज्ञान प्राप्त हुआ।

चक्रवर्ती राजा भरत ने बाहुबली के सम्मान में पोदनपुर में 525 धनुष की बाहुबली की मूर्ति प्रतिष्ठित की। प्रथम सबसे विशाल प्रतिमा का यहां उल्लेख है।

कालांतर में मूर्ति के आस-पास का प्रदेश वन कुक्कुटों तथा सर्पों से व्याप्त हो गया जिससे लोग मूर्ति को ही कुक्कुटेश्वर कहने लगे। भयानक जंगल होने के कारण यहां कोई पहुंच नहीं पाता था इसलिए यह मूर्ति लोगों की स्मृति से लुप्त हो गई।

गंग वंशीय रायमल्ल के मंत्री चामुंडा राय ने इस मूर्ति का वृत्तांत सुनकर इसके दर्शन करने चाहे, किंतु पोदनपुर की यात्रा कठिन समझकर श्रवणबेलगोला में उन्होंने पोदनपुर की मूर्ति के अनुरूप ही गोम्मटेश्वर की मूर्ति का निर्माण करवाया। गोम्मटेश्वर की मूर्ति संसार की विशालतम मूर्तियों में से एक मानी जाती है।

श्रवणबेलगोला में चंद्रगिरि और विंध्यगिरि नाम की दो पहाड़ियां पास-पास हैं। पहाड़ पर 57 फुट ऊंची बाहुबली की प्रतिमा विराजमान है। हर 12 वर्ष बाद होता है।


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