विवेकानंद : देशभक्ति का सच्चा पर्याय...



4 जुलाई : स्वामी की पुण्यतिथि पर विशेष



- विनय कुशवाहा

यूरोप के एक व्यक्ति ने भारतीय से पूछा कि आप किस जानवर के दूध को सबसे अच्छा मनाते है तो भारतीय ने उत्तर दिया 'भैंस'। तब उस यूरोपीय ने कहा 'आप लोग तो गाय के दूध को अमृत मानते है'। तब, भारतीय ने कहा आपने जानवर के बारे में पूछा था, हमारे लिए गाय जानवर नहीं 'माता' है। यह भारतीय और कोई नहीं स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)
थे।

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। स्वामी विवेकानंद के बचपन का नरेंद्र था। विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)का पूरा नाम था। विवेकानंद के पिता की मृत्यु उनके बचपन में हो जाने से उनका जीवन अभावों में बीता। नरेंद्र स्वास्थ्य के प्रति बहुत जागरुक थे। नियमित कसरत करना और फुटबॉल खेलना उनकी दैनिक दिनचर्या में था। स्वामी विवेकानंद बचपन से ही अल्हड़ किस्म के व्यक्ति थे, हर समय उनके मन में एक ही कौंधा करता था कि 'ईश्वर है या नहीं? यदि है तो आपने देखा है'।
इसी सवाल जबाव ढूंढने के लिए वे हमेशा उत्सुक रहते थे। सवाल का जबाव ढूंढते-ढूंढते एक दिन वे आचार्य रामकृष्ण के पास पहुंच गए। रामकृष्ण ने उनके सवाल का जबाव देते हुए कहा कि मैनें ईश्वर को देखा है। विवेकानंद ने रामकृष्ण से दीक्षा ले ली और नरेंद्र से विवेकानंद बन गए। रामकृष्ण की तरह उन्होंने भी समाजसेवा को अपना प्रमुख कार्य बना लिया। विवेकानंद ने समाजसेवा को आधार बनाते हुए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

स्वामी विवेकानंद को बचपन में किसी ने बताया था कि ध्यान लगाने से ईश्वर की प्राप्त होती है। एक बार स्वामीजी ध्यान में मग्न थे तभी एक सांप आ गया। आसपास बैठे सारे लोग भाग गए परंतु स्वामीजी का ध्यानभंग नहीं हुआ। ध्यान के प्रति उनका रुझान बढ़ता गया। वे धीरे-धीरे 3-4 घंटे तक ध्यान लगाने लगे। विवेकानंद कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। एक बार शिकागो में वे अपने रूम में बैठकर पुस्तक पढ़ रहे थे। जैसे ही एक पुस्तक खत्म होती तो नौकर को भेजकर पुस्तकालय दूसरी पुस्तक मंगा लेते यह क्रम चलता रहा। लाइब्रेरियन ने सोचा कि किताब पढ़ रहा है या नहीं, केवल पन्ना पलटा रहा है। वह स्वामीजी के रूम पर पहुंच गया और चिल्लाने लगा, तब स्वामीजी ने शांत करते हुए कहा किताबों में कई गलतियों को बताकर साबित कर दिया की वे पुस्तक पढ़ रहे है।

स्वामी जी एक कुशल वक्ता थे। 11 सितंबर 1893 को शिकागो में विश्व धर्म संसद में दिए भाषण में भाईयों और बहनों शब्द का प्रयोग करके उन्होंने सबका मन मोह लिया। स्वामी जी ने भारतीय संस्कृति से विश्व को अवगत कराया। इस संबोधन के बाद वे विश्व की महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में शुमार हो गए। अमेरिका में एक बार एक महिला ने उनसे पूछा कि आप मुझसे शादी करेंगे तो स्वामीजी का उत्तर था कि मैंने तो आपको मां लिया। क्या इससे बड़ा कोई रिश्ता हो सकता?
स्वामी जी ने समाज को बहुत कुछ दिया जिससे इस देश का भला हो सके। पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने गूढ़ रहस्यों से पर्दा उठाया। विवेकानंद ने राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, जनयोग और स्वामी जैसी पुस्तकें लिखी। भारत यात्रा के समय उनके द्वारा दिए हुए भाषण का संकलन 'स्पीच ऑफ कोलम्बो टू अल्मोड़ा' में किया गया।

स्वामी विवेकानंद कर्म में विश्वास करते थे। वे कहते थे कि भारत को आजादी बिना आध्यात्मिक ज्ञान के नहीं मिल सकती है। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि 'यदि मुझे 100 उर्जावान युवा मिल जाए तो मैं इस देश की काया पलटकर रख दूंगा'। वे सतत् प्रयत्नशील रहते थे कि कैसे इस देश को स्वतंत्रता कैसे मिले साथ ही साथ अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी को कैसे दूर किया जाए। पश्चिम की यात्रा के बाद जब वे भारत आए तो उनका कन्याकुमारी में जोरदार स्वागत हुआ। इसी का गवाह है वहां स्थित विवेकानंद शिला। विवेकानंद ने पूरे भारत का भ्रमण किया और जनक्रांति को बढ़ावा दिया।
एक बार की बात है जब वे खेतड़ी पहुंचे तो खेतड़ी नरेश ने उनका सम्मान भाव से स्वागत किया। स्वामी जी के सम्मान में नृत्य का आयोजन किया। यह नृत्य एक वेश्या के द्वारा किया जाना है, यह सुनकर स्वामी जी सभा का त्याग करके जाने लगे और कहा कि मैं एक वेश्या का नृत्य नहीं देख सकता। तभी वेश्या ने कहा क्या आप वेश्या को इंसान नहीं
समझते? क्या हम समाज का हिस्सा नहीं? यह सूनकर स्वामी जी को अपनी गलती का एहसास हो गया। विवेकानंद को स्वामी की उपाधि खेतड़ी नरेश ने ही दी थी।
स्वामीजी वास्तव एक विराट स्वरुप वाले व्यक्ति थे। 4 जुलाई 1904 को स्वामी जी का देहावसान हो गया। एक नई और महान सोच वाले व्यक्ति ने इस धरती को अलविदा कह लिया।

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