महाश्वेता देवी संस्मरण : भूख से बढ़कर कोई पढ़ाई नहीं होती

 
 
बंगाल की हमारी बहुत प्रिय लेखिका और कार्यकर्ता महाश्वेता दी ने सदियों से पीड़ित जनजातियों के लिए अपना सारा जीवन और लेखन समर्पित कर दिया। उनका जाना बहुत सी यादों को ताजा कर गया।
सन् 1981- नलिनी सिंह के कार्यक्रम 'सच की परछाइयां' के लिए पलामू के बंधुआ मजदूरों के बारे में महाश्वेता दी से मुझे एक साक्षात्कार लेना था। कोलकाता दूरदर्शन की टीम उनके बालीगंज स्थित घर पर पहुंची। किताबों और फाइलों से अटे पड़े उनके बहुत छोटे से कमरे में कैमरा लाइट फिट किया गया।
 
दीदी शायद रसोई से निकलकर आईं। रंगीन पाड़ वाली मुसी-तुसी-सूती साड़ी पहने। मेरी ओर देखकर बोलीं- सुधा, हमको हिन्दी अच्छा नहीं आता है। चोलेगा तो? 
 
मैंने बांग्ला में कहा- दीदी, जैसा भी बोलेंगी, हमारी समझ में आ जाएगा। 
 
उन्होंने अपनी फाइलों के ढेर को एक और सरकाया और कुर्सी पर बैठ गईं- चलो शुरू करो। 
 
निर्देशक ने कैमरामैन को देखा, कैमरामैन ने मेरी ओर। साड़ी की ओर इशारा करते मेरे कान में फुसफुसाकर कहा।   
मैंने दीदी से पूछा- दीदी, साड़ी बदलेंगी? ....क्यों? उन्होंने अपनी साड़ी को देखा, पल्ला घुमाकर सामने कस लिया।  
बोलीं- ठीक है न? कैमरामैन ने बेमन से हामी भर दी- ठीक है, चलेगा। एक दो ट्रॉयल शॉट हुए। पंखे की हवा से बाल कुछ उड़े हुए थे।
 
निर्देशक ने दीदी से इशारे से कहा- जरा बालों में कंघी फिरा लें। 
 
अब तो महाश्वेता दी उखड़ गईं- हमारा बात सुनेगा कि साड़ी देखेगा, हमारा चूल देखेगा? शुरू करो। 
 
...दस मिनट की बाइट भेजनी थी 'सच की परछाइयां' के लिए। साक्षात्कार 45 मिनट का हुआ। दीदी अपनी बांग्ला मिश्रित हिन्दी में बेझिझक धाराप्रवाह बोलती रहीं। कोलकाता दूरदर्शन पर पूरा कार्यक्रम प्रसारित किया गया।
 
रिकॉर्डिंग के बाद उन्होंने हमारे लिए एक खास कमरा खोला। उनके पहले तल्ले के घर के बरामदे को फलांग कर जाना पड़ता था, जहां आदिवासियों के हाथों से बनाई गई टोकरी, आसन और कई हस्तशिल्प रखे थे। हमारे सामान खरीदने पर वे बेहद खुश हुईं। मना करने के बावजूद बाकायदा उन्होंने रसीद काटी और जबरदस्ती थमाई।
महाश्वेता दी के घर पर ही चुन्नी कोटल से मिलना हुआ। मिदनापुर की लोधा जाति की पहली ग्रेजुएट लड़की जिसने एमएससी में दाखिला लिया और जिसे अंतत: मजबूर होकर आत्महत्या करनी पड़ी। बुधन शवर की मौत, जिसे आत्महत्या का नाम दिया गया था, का मुकदमा भी उन्होंने दायर किया। उनकी पूरी मेज कोर्ट-कचहरी की फाइलों से भरी पड़ी थी।
 
एक वाकया उन्होंने सुनाया था- एक बार सिंहभूम के आदिवासियों के साथ वे खाने बैठीं। पत्तल पर भात के साथ नमक-मिर्च रखा था। 
 
दीदी ने पूछा- भात किस चीज से सानेंगे?
 
एक आदिवासी ने जवाब दिया- 'दीदी, भूख से सान लीजिए।' 
 
यह घटना महाश्वेता दी ने मेरी किताब 'औरत की कहानी' के वक्तव्य के लिए बताई और कहा- 'भूख से बढ़कर कोई पढ़ाई नहीं होती।' 
 
इसी शीर्षक से उनका वक्तव्य मैंने लिया उनकी कहानी 'रूपसी मन्ना' के साथ, जो एक गरीब औरत के गलत के खिलाफ उठ खड़े होने और प्रतिकार की कहानी थी।
 
सन् 2009। कोलकाता के सॉल्ट लेक में महिलाओं का एक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा था जिसमें मुंबई से मेरे साथ मित्र उर्मिला पवार और अरुणा बुरटे गई थीं। मुंबई की डॉ. मंजुला जगतरामका भी उन दिनों वहीं थीं। हम चारों रोज सुबह एकसाथ जाते और रात को लौटते। महाश्वेता दी भी कई सेशंस में वक्ता थीं और हम खासतौर पर उनको सुनने जाते थे। वहां एकसाथ 4-5 जगह अलग विषयों पर चर्चा के सेशंस चल रहे थे। 
 
एक बार वे किसी और सेशन में थीं और हम दूसरे सेशन में बैठे थे। चर्चा के बीच में देखा- महाश्वेता दी पीछे से चली आ रही हैं। उनको देखकर कुछ हलचल हुई। उन्होंने उंगली मुंह पर रख इशारा किया- चुप। चुप। चालू रखो। और पीछे पड़े एक मूढ़े पर मेरे पास ही बैठ गईं। घुटनों की तकलीफ के कारण मैं भी जमीन पर नहीं बैठ सकती थी। मंच जैसा तो कुछ था नहीं, पर बोलने वाले आगे की पंक्ति में बैठे थे। 
 
अरुणा बुरटे ने इशारा किया- दीदी को यहां भेज दो। 
 
मैंने उनसे कहा तो उन्होंने मुझे जोर से डांट दिया- तूई चुप कोरे बोश तो। पूरे सेशन में वे कुछ नहीं बोलीं, सिर्फ सुनती रहीं। लगभग 1 घंटा बैठने के बाद चली गईं। ऐसी थीं महाश्वेता दी।
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सन् 2009 में जब कथादेश के लिए मन्नू दी पर एक अंक संपादित किया तो उन्होंने मन्नूजी पर एक संस्मरण लिखकर दिया, जो अंक में भी था और फिर किताब में भी। अपनी कहानियों की एक किताब उन्होंने 'प्रिय बांधवी मन्नू भंडारी को' समर्पित की।
 
बहुत से लोग उनकी कहानियों पर बनी फिल्मों से ही उन्हें जानते हैं- गोविन्द निहलानी की हजार चौरासी की मां, कल्पना लाजमी की (गुलजार लिखित) रुदाली, गुड़िया और चित्रा पालेकर की माटी माय। उन्हें इन फिल्मों में से चित्रा द्वारा निर्देशित और नंदिता दास अभिनीत 'माटी माय' सबसे जयादा पसंद थी, जो उनकी चर्चित कहानी 'डायन' पर बनी थी।
 
महाश्वेता दी, आप हमारे लिए एक प्रेरणा, एक ताकत हैं। आखिरी सलाम आपको।
 
(14 जनवरी 2014 : महाश्वेता दी के 88 वें जन्मदिन पर लिखी एक पोस्ट से कुछ अंश)

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