लघुकथा : मजदूर दर्द गाथा

सात सिंघ बड़े अधिकारी हैं। इन दिनों उन्हें साहित्य लिखने का शौक चढ़ गया। अब साहब का लिखा साहित्य था, सो दूर-दूर तक नाम से विख्यात होने लगा। अब ऑफिस जाना तो बस कहने भर को था, दिन-रात साहित्य सेवा करके नाम कमाना उद्देश्य बन गया था।
एक दिन एक खेतिहर सात सिंघ के ऑफिस आ गया। सात सिंघ आज कई दिनों बाद ऑफिस आए थे। संयोग से मजदूर से मुलाकात होनी जो लिखी थी।
 
सात सिंघ बोले, यार तुम लोग लिखने भी नहीं देते। बोलो काहे आए हो?
 
मजदूर बोला, साहब बिटिया की शादी थी, पैसा निकालने बैंक गया था।
 
सात बोले, फिर मजदूर ने कहा कि पैसा निकालकर घर आ रहा था कि गांव के ननकू गुंडे ने पैसे छिनवा दिए। साहब कोई पुलिस वाले सुन नहीं रहे। 
 
सात खीझकर उठ खड़े हुए। बोले, साहित्य साधना में विघ्न डालने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? और मजदूर को धक्के मारकर बाहर करवा दिया गया। 
 
सात सिंघ ऑफिस आए जरूर थे, पर साहित्य को अपना कर्म मान चुके थे। पूर्ण समर्पण से लेखन में जुटे थे। 
 
मजदूर घर आ गया। मजदूर की बिटिया कुछ पढ़ी थी। उसने अपने पिता के दर्द पर एक बड़ा लेख लिखा। लेख यथार्थ से जुड़ा था, पर मजदूर की बिटिया का लिखा पढ़ता भी कौन?
 
कुछ समय बाद सात सिंघ की एक प्रसिद्ध पुस्तक प्रकाशित हुई उसका शीर्षक था 'मजदूर का दर्द'। यह पुस्तक काफी सराही गई और खूब पढ़ी गई।
 
सात सिंघ ने मजदूरों के लिए किए गए अपने सेवा-श्रम का उल्लेख साहित्य के माध्यम से बखूबी किया था। एक दिन एक बड़ी सभा लगी थी। लोग काफी संख्या में थे कि अचानक सभा शुरू हुई। सात सिंघ के मजदूरों के प्रति साहित्य के माध्यम से लिखे गए दर्द पर उन्हें सच्चा साहित्य प्रेमी और मजदूरों के मसीहा के रूप में घोषित कर दिया गया।
 
संयोगवश आज वही मजदूर वहां पर बज रहीं तालियों और सात सिंघ की प्रसिद्धि की चर्चा सुन रहा था। वाकई उसे पूरे प्रकरण में दर्द महसूस हो रहा था। वहां पर अन्य लेखकों के लिखे लेखों की चर्चा होनी थी।
 
मजदूर की बेटी का लेख भी चयनित हुआ था, पर सराहना सिर्फ साहब के लेख को मिली थी, क्योंकि असली दर्द साहब होने के नाते सिर्फ वहीं लिख सकते थे। साहब के समाज के प्रति इसी समर्पण ने तो उन्हें लोकप्रिय बना डाला था। 
 
मजदूर सोच रहा था कि बड़ी बात लिखने के लिए बड़े पद पर होना जरूरी है। प्रोग्राम समाप्त हो चुका था, लेकिन यह डंका था साहब के साहित्य की अमरगाथा की शुरुआत का।
 
सात सिंघ साहब ने एक सेवा की एक नई नींव डाल दी थी। सारी पत्र-पत्रिकाएं अब प्रसिद्धि के लिए साहब के लेख ढूंढ रही थीं।

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