लघुकथा - संस्कारों का मान


- देवेंन्द्र सोनी बात रमेश के अस्तित्व पर आकर अटक गई थी। रह-रह कर उसका मन अपनी जिंदगी को यूं ही खत्म करने के लिए उकसाता था, पर वह इन विचारों को नकारने की पूरी कोशिश करता। उसके जेहन में मृत्यु शैय्या पर लेटी अपनी मां के वे शब्द गूंज जाते, जो उन्होंने अपने अंतिम समय में कहे थे। जाते-जाते अपने इकलौते पुत्र रमेश से यही कहा था उन्होंने - बेटा मेरे बाद तू अकेला हो जाएगा। अभी बेरोजगारी से जूझ रहा है। हिम्मत मत हारना और हर स्थिति में मेरा कामयाब राजा बेटा बनकर मेरे संस्कारों का मान रखना। घर की आर्थिक स्थिति तू समझता है। तुझे ही अब अपनी और अपने पिता की जिम्मेदारी उठाना है। जो कुछ थोड़ा बहुत है घर में उसी से कुछ काम-धंधा कर लेना।


...पर यह क्या ! मां की मृत्यु के कुछ समय बाद ही पिताजी नई मां ले आए। युवा रमेश का मन इसे स्वीकार नहीं पा रहा था। जैसे-तैसे कुछ दिन तो ठीक ठाक निकले। फिर पिताजी ही उसे लेकर रोज-रोज उलाहने देने लगे। रमेश रोज सुबह नौकरी की तलाश में निकलता और देर रात घर लौटता। तंगहाली और निराशा उसे अवसाद का शिकार बनाती जा रही थी। घर में उसका अस्तित्व शून्य होते जा रहा था। जब भी घर छोड़कर जाने का मन करता, अपनी मां के अंतिम शब्द उसकी राह रोक लेते और वह अपने अस्तित्व को निरंतर नकारे जाने के बाद भी मन मारकर रात को घर लौट आता।

नई मां रमेश की इस मनोदशा को समझ रही थी, पर रमेश को समझाने से हिचकती थीं। लेकिन आखिर कब तक अनदेखा करती - अब थी तो वह आखिर रमेश की मां ही। भले ही नई हो या समाज की नजर में सौतेली। अंततः एक दिन उन्होंने रमेश से खुलकर बात करने की ठानी और अपने पतिदेव को भी इसके लिए सहमत कर लिया।

देर रात जब रमेश घर लौटा तो बेहद उदास था। नई मां ने बात शुरू करते हुए रमेश से कहा - देखो बेटा तुम स्वीकारो या न स्वीकारो पर अब मैं ही तुम्हारी मां हूं । जानती हूं, तुम्हारे लिए यह स्वीकारना आसान नहीं है पर वर्तमान में रहना सीखो। मैं तुम्हारी जन्म देने वाली मां नहीं तो क्या - आखिर हूं तो मां ही। मत कहो मुझे मां, पर अपनी दशा सुधारो और नौकरी की तलाश में यहां-वहां भटकना छोड़ अपना ही कोई काम- काज शुरू कर लो । तुमने कम्प्यूटर का कोर्स किया है, इसी को आधार बनाकर अपना काम प्रारंभ कर लो। ईश्वर और तुम्हारी मां का आशीष तम्हें सफलता देगा और हां ये मेरे पास पचास हजार की नगदी रकम यूं ही पड़ी है ,कल ही इससे जरूरी सामान खरीद लेना। पड़ोस के शर्मा जी की दुकान मैंने किराए पर ले ली है। अच्छा सा मुहूर्त देखकर अपना खुद का काम शुरू करो। अब यहां-वहां भटकने की जरूरत नहीं।

यह कहकर नई मां ने रमेश को पैसे दिए। रमेश कुछ कह पाता इससे पहले ही उन्होंने अपनी आंखों में आते आंसुओं को रोका और पलट कर वापस अपने कमरे में जाने का उपक्रम कर दरवाजे की ओट में खड़ी हो गई। उन्हें रमेश की प्रतिक्रिया का इंतजार जो था। इधर रमेश स्तब्ध हो गया। सोच रहा था जो नई मां कल तक उसे अनदेखा करती थी, आज उनमें अचानक यह बदलाव कैसे ? जिसे वह कभी मां नहीं कह पाया, आज वही उसके अस्तित्व को बचाने के लिए अपनी जमा-पूंजी दे गई। इसी उहापोह में बरबस ही उसकी नजर अपनी मां की तस्वीर पर गई। उसे लगा जैसे वह मंद-मंद मुस्कुरा कर कह रही है - मां तो मां ही होती है।

अब रमेश भी मुस्कुरा रहा था। अनायास ही उसके मुंह से निकली मां की ध्वनि से पर्दे की ओट में खड़ी नई मां भी मुस्कुरा उठी। उसे लगा जैसे उसने अपने अस्तित्व के साथ ही रमेश का अस्तित्व भी बचा लिया।

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