हिन्दी कविता : सृष्टि का आरंभ



का है प्रारंभ
काल परिवर्तित होते रहे
परिवर्तित होते रहे
तरल होते गए
भाव मन में सोते गए।
गूढ़ से मूढ़ लेखन हुआ
प्रेम से दूर अंकन हुआ
विषयों में विषमता बढ़ी
कथ्य की क्षमता बढ़ी
छंद क्षमता छिन गई
मन विषमता रम गई।

गद्य बोझिल हो गया
पद्य धूमिल हो गया
कहां है 'देवी' की माया
कहां है पंत की ग्राम्या।

न अब कामायनी मिलेगी
न गबन-गोदान खिलेंगी
न सतपुड़ा के घने जंगल
न जिंदगी के अब है मंगल।
अब तो हॉफ गर्लफ्रेंड है
व्हॉट्स एप से करते सेंड हैं
दस रचनाएं एक दिन में लिखते हैं
न वर्तनी, न मात्रा का ध्यान रखते हैं।

साहित्य में न अब सरोकार दिखते हैं
सब अपनी भड़ास लिखते हैं
साहित्य सम्मानों की होड़ लगती है
कविता हर मंच पर सजती है।

चुटकुले चुगली चबाली
कविता है साहित्य से खाली
कभी तराजू में तौलोगे उस जमाने को
पासंग में भी न पाओगे इस शब्दखाने को।

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