Widgets Magazine
0

पृथ्वी दिवस पर कविता : सोचो ज़रा

रविवार,अप्रैल 22, 2018
0
1
देह हूं मैं प्राणों से भरी , अहसासों से भरी देह हूं मैं जब छूते हो मुझे मेरी अनुमति के बिना कांप सी जाती हूं ...
1
2
पापा, आना सरहद पार से, दुश्मन के घरबार से। रस्ता देखे थकी हैं अंखियां, चुप हूं मेरी खो गई निंदिया।
2
3
और रखा ही क्या है? इस जीवन में, हंसना, बोलना, खेलना, खाना जीवन में, खुलकर जी लो इस जीवन को, जीवन के हर एक पल को,
3
4

कविता : आ जाती हैं कुछ यादें

बुधवार,अप्रैल 18, 2018
धूल की पर्तों के नीचे तस्वीरों में अहसास जगाती हुई, ख़्वाहिशें कांधे पे लिए कुछ इठलाती हुईं, आ जाती हैं कुछ यादें दिल को ...
4
4
5
तुमने कहा था साथ रखना, सब होगा अच्छा विश्वास रखना। कोई बैरी नहीं सपनों का, स्वप्न मगर कुछ खास रखना।
5
6
आतंकवादियों की खोज होती रही सारे जहान में। अमेरिका-यूरोप में, अफ्रीका-मिडिल ईस्ट में, ईरान में।। इने-गिने कुछ मिले यहां ...
6
7
नज़र आता है डर ही डर, तेरे घर-बार में अम्मा नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा...
7
8
कभी मिलना उन गलियों में जहां छुप्पन-छुपाई में हमने रात जगाई थी। जहां गुड्डे-गुड़ियों की शादी में दोस्तों की बारात बुलाई ...
8
8
9
पत्रकार, लेखिका व शायरा फ़िरदौस ख़ान ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर एक गज़ल लिखी है। इस ग़ज़ल में राहुल गांधी के वजूद का ...
9
10
मैं दर्पण ही तो हूं तुम्हारा संवारा है नित्य तुमको विभिन्न कोणों से तुम में साकार होना मैंने स्वीकार लिया।
10
11
तू दे मुझको गालियां, में तुझ पर मानहानि का केस करूं। (तू बन रामलीला का रावण, मैं मंच पर राम का भेस धरूं।।)
11
12

शिक्षाप्रद कविता : छिपकली

बुधवार,अप्रैल 4, 2018
छिपकली मादा लंगूर की तरह नहीं है जो अपने मृत शिशु को छाती से चिपकाए घूमती है।
12
13
ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं, गरमी की छुट्टियों को तगड़े आलस में जी आऊं, भानुमति के पिटारे से निकलूं छोटी सी ...
13
14

कथनी और करनी

सोमवार,अप्रैल 2, 2018
वे ईश-पूजा के उपरांत करबद्ध प्रार्थना कर रहे थे-हे प्रभु! सम्पूर्ण विश्व शांति, स्वच्छता, कर्मशीलता, पवित्रता और ...
14
15
वे ले भागे बैंकों का धन। जब तक खबर लगी हमको। कितने ही कर चुके अतिक्रमण। जब तक खबर लगी हमको।।
15
16
वैसे तो दोनों का नाम 'श' से प्रारंभ होता था एक शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था और दूसरा शोषक वर्ग का।
16
17
कुहू-कुहू कर मीठे स्वर में, हमें बुलाती कोयल रानी। अमराई में तान सुरीली, उसकी लगती बड़ी सुहानी
17
18
तथागत का हंसता-सा चित्र पुष्पहारों से हो रहा सुवासित कोविद, आगंतुक सभी उपस्थित अब होगा गरूड़ पुराण वाचित!!
18
19
हम भी मिट्टी, तुम भी मिट्टी, मिलगा हर कोई मिट्टी में। फिर भी लगे हुए हैं सब, चंद सिक्कों की गिनती में।
19