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कविता : मैं कौन हूं?

मंगलवार,फ़रवरी 20, 2018
universe
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पहाड़ों पर टेसू ने रंग बिखेरे फागुन में हर कदम पर बज रहे ढोल फागुन में ढोल की थाप पे थिरकते पैर फागुन में महुआ लगे ...
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मैंने कभी सुना था, जीवन एक सुलगती हुई, सिगरेट के समान है।
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कविता : मोबाइल की विरासत

गुरुवार,फ़रवरी 15, 2018
कल जैसे ही हाथ में मोबाइल उठाया, मेरा बेटा दौड़ा-दौड़ा आया। 'मां मोबाइल दे दो जरूरी काम है', बोला, मेरा गुदगुदाता व ...
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मधुर-मधुर बहती हवाएं, छेड़ रहीं संवाद। प्रकृति छटा बिखेर रही, आया है मधुमास।
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कविता : इंसां झूठे होते हैं...

गुरुवार,फ़रवरी 8, 2018
इंसां झूठे होते हैं, इंसां का दर्द झूठा नहीं होता, इन ओंठों पर भी हंसी होती,गर अपना कोई रूठा नहीं होता।
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दु:ख की परिभाषा, भूखे से पूछो, या जिनके पास पैसा नहीं हो, उससे पूछो।
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अपनी आंखों को चार कर लेना, कितना मुश्किल है प्यार कर लेना। एक दिन लौटकर मैं आऊंगा,
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बस इसके आगे, थोड़ी ही और आगे एक बात कहना चाहते हैं हम, बस बहुत हो चुका सत्ता स्वार्थ की ख़ातिर दोनों देशों की जनता के साथ ...
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मंचों की कविता बनी, कम वस्त्रों में नार, नटनी नचनी बन गई, कुंद हो गई धार। नौसिखिये सब बन गए, मंचों के सरदार,
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हे बापू, तुम फिर आ जाते, कुछ कह जाते, कुछ सुन जाते। साबरमती आज उदास है, तेरा चरखा किसके पास है?
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कविता : बूढ़े होंगे हम...

सोमवार,फ़रवरी 5, 2018
बूढ़े होंगे, बूढ़े होंगे हम, एक न एक दिन कूड़े होंगे हम।
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परमात्मा का अंश है, अविनाशी आनंद, अंत समय उनमें मिले, जीव ब्रह्म सानंद।
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इस अज्ञानी के गागर में, शब्दों का खजाना है। शब्दों को लिखते-लिखते, जीवन को संवारा है।
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काल की अनंतता का प्रवर्तन, शून्य के वृत्त का सनातन आवर्तन। वर्तमान की चेतना से काल का आरंभ, प्रसूत अद्यतन क्षण का ...
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कविता : जिहाद

शुक्रवार,फ़रवरी 2, 2018
अंधेरों से दुश्मनी कई दुश्मन बना देती है, सिरफिरी हवाएं अक्सर दीया बुझा देती हैं।
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मैं भारतमाता का पुत्र प्रतापी, सीमा की रक्षा करता हूं। जो आके टकराता है, अहं चूर भी करता हूं।
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पायल छनकातीं बेटियां, मधुर संगीत सुनातीं बेटियां। पिता की सांस बेटियां, जीवन की आस बेटियां।
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मेरे बचपन में मेरी मां ने एक किस्सा सुनाया कि गंगा मां को आर-पार की पियरी चढ़ाई और बदले में पुत्ररत्न का उपहार पाया,
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थोड़ी शराब पी है, समझता नहीं है इतना।, आशिकी की क्या सजा है, सपनों में आज उसने...
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