0

हिन्दी कविता : सूरज

बुधवार,सितम्बर 19, 2018
0
1
साहित्य की फुलवारी, सरल-सुबोध पर है भारी। अंग्रेजी से जंग जारी, सम्मान की है अधिकारी।
1
2
कम्प्यूटर के युग के दौर में, थोपी जा रही अंग्रेजी शोर में। आधुनिकता की कहते इसे जान, छीन रहे हैं हिन्दी का रोज मान।
2
3
वे देश के अन्नदाता हैं वो तमाम कष्ट सह पेट पालता है तमाम जनता का अकाल, ओलावृष्टि, अतिवृष्टि
3
4
खुशी के कारण बहुत मिलेंगे, कभी किसी की खुशी का कारण बनो। जो बांटोगे वही मिलेगा, दु:ख बांटो या सुख बांटो।
4
4
5
समझना होगा, दुनिया की चाल को, बदलना होगा, खुद से अपने हालात को। ठोकर खाकर ही इंसान संभलता है,
5
6
तरसी यशोदा, सुन सुन कान्हा अबके मेरे घर भी आना अंगना सूना आंखे सुनी इनमें ख्वाब कोई भर जाना
6
7
दिन हो, रात हो अब युवा हिन्द के करते आराम नहीं, समाज बदल रहा है युवा, व्याकुलता का अब काम नहीं, भारत माता की वेदी पर ...
7
8

हिन्दी कविता : तुम बदल गए

गुरुवार,अगस्त 23, 2018
तुम बदल गए। थामकर हाथ तुम्हारा, चल पडी थी सपनों में रंग भर के उम्मीद के पंख लगाकर,
8
8
9
तुम्हारी देह और हमारे मन को जलाते अंगारों में हवा में घुल चुके तुम्हारे ही विचारों में आकाश के तारों में
9
10
सूर्य उदय से सूर्यास्त तक सुनहरी गुलाबी बदलती किरणों को निहारकर शब्दों में
10
11
बहुत उदास, बहुत निराश है आज की सुबह, अपने लाड़ले के बिना हुई है आज की सुबह।
11
12
बदला मौसम, ढलती छाया, रिसती गागर, लुटती माया, सब कुछ दांव लगाकर घाटे का व्यापार हुआ। नए मील का पत्‍थर पार हुआ।
12
13
अटल मौन देखो हुआ, सन्नाटा सब ओर। अंतिम यात्रा पर चले, भारत रत्न किशोर।
13
14
मौत को देखा है सिसकते हुए, देखा है वटवृक्ष को निढाल होते हुए। जिसकी छत्रछाया में पनपे सभी, उनके लिए आंसू बह निकले।
14
15
हानि-लाभ के पलड़ों में तुलता जीवन व्यापार हो गया, मोल लगा बिकने वाले का, बिना बिका बेकार हो गया,
15
16
तन पर पहरा, भटक रहा मन, साथी है केवल सूनापन, बिछुड़ गया क्या किसी का, क्रंदन सदा करुण होता है।
16
17
हरी-हरी दूब पर ओस की बूंदें अभी थीं, अब नहीं हैं। ऐसी खुशियां जो हमारा साथ दें कभी नहीं थीं, कहीं नहीं हैं।
17
18
जीवन की ढलने लगी सांझ उमर घट गई डगर कट गई जीवन की ढलने लगी सांझ।
18
19
मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना गैरों को गले न लगा सकूँ इतनी रुखाई कभी मत देना।
19