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कविता : ओम पुरी जिंदा है

Last Updated: शनिवार, 20 मई 2017 (16:51 IST)


मेरे बाथरूम में
एक अनोखा प्रयोग चल रहा है
दरवाजा बंद कर के
घण्टों बैठा रहता हूं 
घुटन की सांस लिए/हर रोज
सोचता हूं 
“आज क्या मैं ईमानदार नहीं रहा ?”
 
एक नौसिखिया जादूगर,
जो सरेआम कत्ल जैसा
कुछ कर जाता है,
उसकी जिम्मेदारी एक संगठन ले लेता है
वह जादूगर लोगों की जीवन-शैली में
क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहा है।
संगठन कि ऊर्जा एवं चिंतन से प्रभावित हूं 
 
काले कपड़ों में लिपटा
एक इंसान कहता है
कि उसने सपने में 
सड़कों पर दौड़ते वाहनों से 
बिजली पैदा करने की विधि विकसित की है।
 
एक दिन आपकी टूथपेस्ट में नमक नहीं होगा..
और आप “लक्षमणरेखा” खाकर
आत्महत्या जैसा कोई कोमल कदम उठा लोगे।
 
अंटार्क्टिका का मौसम
बिरले ही पाले और बर्फीली हवाओं से मुक्त रहता है,
पर इसी बर्फीली हवाओं की आड़ में
इंसानी बस्ती की एक लाल लिपस्टिक के लिए
लाल खून जैसा खेल मैंने देखा है।
वे मनुष्य के जीवन को
समृद्ध और आरामदायक बना सकते हैं।
 
मेरे दिमाग का “पश्च मष्तिष्क”
यह समझता है कि
मासूम जनता को छोटे-छोटे प्रलोभनों द्वारा
आसानी से खरीदा जा सकता है।
लेकिन मैं अपने दिमाग को रौंदकर
अपनी गर्दन को
उस शोरूम में लेकर जाना चाहता हूं
जहां विचारों की अभिव्यक्ति का 
गला घोटा जाएगा।
 
अभी तक इंसान ने
रोका हुआ था खुद को,
आप अपनी टिप्पणियों में
गुप्त अंगों का नाम लेते हुए 
एक से दस तक जिनती संख्याएं गिन सकते हो
उतनी संख्या में हर सेकंड एक इंसान मर जाता है।
 
एक दिन हम लोगों को
मौत के वैकल्पिक प्रश्न का 
सरल उत्तर समझ में आएगा,
अगर नहीं आएगा तो
हम उसे थोड़ा सा बदल देते हैं, ताकि उत्तर दिया जा सके।
 
सड़कों पर लड़की जैसी कोई चीज या ऊर्जा का
धड़ल्ले से अपहरण हो जाता है
हम अपने अंतर्मन से कुछ नहीं पूछ सकते।
 
हवस की फिल्म के हसीन वक्त
(बलात्कारी की नजरों में)
दिमाग और चमड़ी भी इतनी मोटी हो जाती होगी कि
खुजली मिटाने के लिए कोई साधारण नाखून पर्याप्त नहीं होते।
 
एक दिन,
हड्डियों की मौत की सीरीज का
सिरियल नंबर वहीं से शुरू होगा
जहां तक उर्दू मे लिखा गया था– कत्ले आम।
 
मैंने जीव विज्ञान में महसूस किया था
कि भारतीय गैंडे में केवल एक सींग होता है।
वह अफ्रीकी गैंडे से थोड़ा बड़ा होता है।
 
आप निश्चिंत रहें,
कुदरत ने अपने सभी पुत्रों के आराम की व्यवस्था की है।
आप अपने कोलगेट की गर्दन मरोड़ि‍ए
तब तक ओम पूरी जिंदा रहेंगे।
बृजमोहन स्वामी "बैरागी"
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