एक अल्हड़ दीवाना कवि : राजकुमार कुम्भज


 
- डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
 
सहज, सौम्य और सरल जिनका मिजाज है, सबकुछ होते हुए भी फकीराना ठाठ, आजाद पंछी की तरह गगन को नापना, मजाक और मस्ती की दुनिया से कविता खोजने वाले, अल्हड़ और मनमौजीपन में जिन्दादिली से जीने वाला, कविता लिखने के लिए केवल मुठ्ठी उठा कर नभ को पत्र भेजने का कहने वाला, जो बिना अलंकार के सरलता से कविता कह जाए, यदि अहिल्या की नगरी में ऐसा कोई शख्स आपको मिलेगा तो वह जरूर अपना नाम ही बताएगा। 
 
जी हां, 12 फरवरी 1947 को इंदौर (मध्यप्रदेश) में जन्मे और कविता जितने सरल, पानी जितने सहज और निर्लोभी, जिसे लेश मात्र भी यह घमंड नहीं हो कि वो ही है जिसकी कविता के सौन्दर्य के कारण सन 1979 में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' द्वारा सम्पादित 'चौथा सप्तक' में शामिल अग्र कवियों में उनका नाम लिया जाता हो, जिनकी 20 से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हो वही राजकुमार कुम्भज हैं। यह तो तय है कि मालवा की धीर वीर गंभीर रत्नगर्भा धरती ने राजकुमार कुम्भज जैसे रत्नों को जन्म देकर जरूर अभिमान किया होगा। 
 
हजारों किस्से, सैकड़ो बातें, बीसियों विषय जिन पर कुम्भज जी बहुत कुछ सिखाते हैं, इस पहचान का नाम ही राजकुमार हो। 'मिनी पोएट्री' या कहें लघु कविता जैसा नवाचार कर साहित्य जगत में नई कविता को स्थान दिलाने वाले लोगों में अग्रणी कवि कुम्भज कविता का कुंभ है। वह न केवल साहित्य जगत में अपितु जीवन में भी राजकुमार ही रहे।
 
कुम्भज जी के जीवन के यथार्थ के प्रति विचार इतने आधुनिक है कि 1977 में पारम्परिक मान्यताओं एवं रूढ़ियों को तोड़ते हुए प्रेम विवाह किया, जो लिखा वही जीया भी। जवानी के दिनों में जींस-शर्ट और बड़े बक्कल वाला चौड़ा बेल्ट पहन बुलेट पर सवारी करने वाले बुलेटराजा कुम्भज जिसका ठिकाना या कहें अनाधिकृत पता इंडियन कॉफी हाउस हुआ करता था, जिसने प्रेम को लिखा है, जो प्रेम को जीया भी है और सत्य इतना कि जो किया बेझिझक बेबाक तरीके से बोल दिया, न लाग लपेट न डर। 
 
साहित्य से लेकर राजनैतिक परिपेक्ष तक, देश से लेकर विदेश तक हर मुद्दे पर गहरी और मजबूत पकड़ रखकर अपने लेखन से बेबाक टिप्पणी देने वाले का नाम कुम्भज है। राजकुमार कुम्भज समकालीन हिन्दी कविता के सबसे बड़े हस्ताक्षर है।
 
जो, जितना, हंसता हूं मैं
उतना, उतना, उतना ही रोता हूं
एक दिन एकांत में
एक दिन सूख जाता है भरा पूरा तालाब
कुबेर का खजाना भी चूक जाता है एक दिन
स्त्रियां भी कर देती हैं इनकार प्रेम करने से
उमंगों की उड़ान भरने वाले तमाम कबूतर भी
उड़ ही जाते हैं एक न एक दिन अनंत में
फिर रह जाता है एक दिन सिर्फ वह सच जो चट्टासन
माना कि पहाड़ भी उड़ते थे कभी फूंक से
मगर अब उड़ता नहीं है पत्ता कोई शक नहीं कि बहती हैं हवाएं...
बहती हवाओं की तरफ ही पूर्ववत शक नहीं कि पकती हैं फसलें...
पकती फसलों की तरह ही पूर्ववत शक नहीं कि झरती हैं पत्तियां...
झरती पत्तियों की तरह ही पूर्ववत मैंने सोचा मुझे हंसना चाहिए
मैं हंसा और निरंतर-निरंतर जोर-जोर से भी
फिर उतना, उतना, उतना ही रोका एक दिन एकांत में भी
जितना, जितना, जितना हंसा मैं 
सार्वजनिक सभा में जितना, जितना, जितना भी हंसता हूं मैं
रोता हूं उससे कहीं ज्यादा।
 
ऐसी कविताओं के माध्यम से समाज को चिंतन देने वाले जिन्दादिल, अल्हड़ और मस्ताने जो सुफियाना मिजाज से निज हृदयासन पर बैठाने वाले कवि है। फक्कड़ मिजाज और नई कविता में गहनता के साथ कम शब्दों में यथार्थ को बयां करने वाले राजकुमार कुम्भज जी की काव्य साधना प्रणम्य है।  
वागेश्वरी की कृपा उन पर सदा बनी रहें और हम नौजवानों को सदैव यह दिवाकर अपनी काव्य रश्मियों से प्रकाश बांटता रहे यही कामना करते हैं। 
 
(लेखक परिचय- पत्रकार एवं स्तंभकार। मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं)
 

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