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आज सारा देश ही 'शिवपालगंज' है

मंगलवार,अक्टूबर 31, 2017
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परसाई के बहाने

गुरुवार,अगस्त 24, 2017
हिन्दी साहित्य के मशहूर व्यंग्यकार और लेखक हरिशंकर परसाई से आज कौन परिचित नहीं है और जो परिचित नहीं हैं, उन्हें परिचित ...
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हिन्दी पत्रकारिता के अमिट हस्ताक्षर और बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजेन्द्र माथुर (रज्जू बाबू) की 7 अगस्त को जन्मतिथि है। ...
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नई दिल्ली। दिल्ली हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष एवं सुप्रसिद्ध लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को आज यहां उदयराज सिंह स्मृति सम्मान ...
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राजनीति में विचारों के लिए सिकुड़ती जगह के बीच पं. दीनदयाल उपाध्याय का नाम एक ज्योतिपुंज की तरह सामने आता है। अब जबकि ...
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युगदृष्टा साहित्यकार दिनकर ने अपने समय की कठिनाइयों को बड़ी पैनी दृष्टि से देखा व पहचाना। युवा आक्रोश तथा अनुशासनहीनता ...
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यह बात आश्चर्यजनक है लेकिन सच है कि लेखन कभी उन्होंने घर में रहकर एयरकंडीशंड रूम में नहीं किया बल्कि विषय की आवश्यकता ...
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उदारीकरण की बयार का सबसे बड़ा हमला संस्कृति पर हुआ है..भारतीय समाज में तमाम ऊंच-नीच के बावजूद आत्मीयता की एक अजस्र धारा ...
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हिंदी तथा पंजाबी लेखन में स्पष्टवादिता और विभाजन के दर्द को एक नए मुकाम पर ले जाने वाली अमृता प्रीतम ने अपने साहस के बल ...
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टैगोर दुनिया के संभवत: एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के ...
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प्रेमचंद एक सच्चे भारतीय थे। एक सामान्य भारतीय की तरह उनकी आवश्यकताएँ भी सीमित थी। उनके कथाकार पुत्र अमृतराय ने एक जगह ...
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आज हिंदी साहित्य को 'उसने कहा था' जैसी कालजयी कहानी देने वाले पं. श्री चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की जयंती है। गुलेरी की ...
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रमाकान्त पाण्डेय अकेले के अब तक सोलह उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से अधिकाँश साहित्यागार जयपुर से प्रकाशित हुए ...
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बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में अनेक महापुरुषों ने राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपने बहुआयामी व्यक्तित्व और कालजयी कृतित्व की ...
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'मधुशाला' के रचयिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म 27 नवंबर, 1907 को ...
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प्राण कुमार शर्मा ने आज 75 साल की उम्र में अपनी अंतिम सांस ली। प्राण नाम से पहचाने जाने वाला यह रचयिता अपने पीछे एक ऐसी ...
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भोजपुरी साहित्यकार रामनाथ पांडेय का नाम इतिहास-पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित है। यों तो वे 16 जून 2006 को बयासी वर्ष की ...
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अनादिकाल से रवाँ वक्त का दरिया अपने भीतर न जाने कितने युग समोता चला गया। ऐसे लोग, जो पैदा हुए और गुमनाम-सी ज़िंदगी जीकर ...
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बीसवीं सदी के आरंभ में भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था से बिखराव के कगार पर खड़े चीन और बीसवीं सदी के अंत में ...
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उन्होंने रेडियो पर अपना ऐतिहासिक उद्बोधन दिया- 'यह मैं हूं जनरल द गॉल' और उन्होंने अपने प्रभावी वक्तव्य में सभी ...
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