रोशनी बांटते कबीर भविष्य की अमिट वाणी थे



दिल-दिमाग को टटोल याद करने की कोशिश करती हूं कि से मेरा परिचय कितना पुराना है। कक्षा 3 में पढ़े 'नीति के दोहे' जितना या कक्षा छ: में दोहे याद ना कर पाने की एवज तड़-तड़ पड़ती छड़ी जितना। कक्षा नौ की व्याख्या के साढ़े तीन नंबर या बीए फाईनल के 15 नंबरों की चिंता। या फिर घोर साहित्यिकता के वे नाजुक पल जब कबीर पढ़ते-पढ़ते आंखें अनायास ही जल-थल हो जाया करती थी। 
 
अंधों की बस्ती में रोशनी बेचते कबीर वाकई अपने आने वाले समय की अमिट वाणी थे। कबीर का जन्म इतिहास के उन पलों की घटना है जब सत्य चूक गया था और लोगों को असत्य पर चलना आसान मालूम पड़ता था। अस्तित्व, अनास्तित्व से घिरा था। मृत प्राय मानव जाति एक नए अवतार की बाट जोह रही थी। ऐसे में कबीर की वाणी ने प्रस्फुटित होकर सदियों की पीड़ा को स्वर दे दिए। अपनी कथनी और करनी से मृत प्राय मानव जाति के लिए कबीर ने संजीवनी का कार्य किया। 
 
इतिहास गवाह है, आदमी को ठोंक-पीट कर आदमी बनाने की घटना कबीर के काल में, कबीर के ही हाथों हुई। शायद तभी कबीर कवि मात्र ना होकर युगपुरुष कहलाए। 'मसि-कागद' छुए बगैर ही वह सब कह गए जो कृष्ण ने कहा, नानक ने कहा, जीसस ने कहा और मोहम्मद ने कहा। मजे की बात, अपने साक्ष्यों के प्रसार हेतु कबीर सारी उम्र किसी शास्त्र या पुराण के मोहताज नहीं रहे। न तो किसी शास्त्र विशेष पर उनका भरोसा रहा और ना ही जीवन भर स्वयं को किसी शास्त्र में बांधा। 
 
सच है, कबीर ने समाज की दुखती रग को पहचान लिया था। वे जान गए थे कि हमारे सारे उत्तर पुराने हो गए हैं। नई समस्याएं नए समाधान चाहती हैं। नए प्रश्न, नए उत्तर चाहते हैं। नए उत्तर, पुरानेपन से छुटकारा पाकर ही मिलेंगे। तभी तो कबीर के दुस्साहस ने उनसे लिखवाया था -
 
'तू जो बामण-बामणी जाया, 
और राह ह्वै क्यों नहीं आया' 
अथवा 
तू जो तुरक-तुरकनी जाया 
भीतर खतना क्यों ना कराया। 
 
यह कबीर की ही नवीन सोच का परिणाम था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र, एवं वैश्यों में टूटा समाज फिर से एकजुट होकर बाह्य शक्तियों का सामना करने में सक्षम हो पाया। 

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