पुस्तक समीक्षा : फसक, इस दौर की जीती-जागती तस्वीर

Widgets Magazine


'फसक' उत्तर-सत्य वाले इस दौर की एक जीती-जागती तस्वीर है, जहां ‘अच्छे दिन’ के नाम पर अफवाह, अंधविश्वास और फिरकापरस्ती के दिन फिर गए हैं। तथ्य, तर्क-विवेक और वैज्ञानिक नजरिए के प्रति आकर्षण का अल्पकालिक उभार अपने उतार पर है। उन गिरोहों की चांदी है, जिनके पास ‘भावनाएं मथने वाली मथानियां’ हैं और एक नया सार्वजनिक दायरा रचते फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे द्रुत माध्यमों को भी उल्टी गंगा बहाने के अभियान में जोत दिया गया है। बचवाली नामक पहाड़ी कस्बे की जमीन पर ऐसे दौर का साक्षात्कार करता यह तेजू, रेवा, पुष्पा, चन्दू पाण्डेय, भैयाजी, नन्नू महाराज, पी थ्री, लालबुझक्कड़, मोहन सिंह जैसे अलग-अलग पहचाने जा सकने वाले पात्रों के जरिए हमें हमारी दुनिया का एक नायाब ‘क्लोज-अप’ दिखाता है।
 
यह वही दुनिया है जिसे हम अखबारों, न्यूज चैनलों और अपने गली-मोहल्लों में रोज देखते हैं, पर इन सभी ठिकानों पर बिखरे हुए बिंदुओं को जोड़कर जब राकेश एक मुकम्मल तस्वीर उभारते हैं, तो हमें अहसास होता है कि इन बिंदुओं की योजक-रेखाएं अभी तक हमारी निगाहों से ओझल थीं। अचरज नहीं कि इस तस्वीर को देखने के बाद, उपन्यास के अंत में आए लालबुझक्कड़ के ऐलान को हम अपने ही अंदर से फूटते शब्दों की तरह सुनते हैं।
   
समय की नब्ज पर उंगली होते हुए भी ‘फसक’ में ज्वलंत दस्तावेज रच देने का बहुप्रतिष्ठित लोभ इतना हावी नहीं है कि कि‍स्सागोई पृष्ठभूमि में चली जाए। फसकियों (गपोड़ियों) के इलाके से आनेवाले राकेश तिवारी कि‍स्सा कहना जानते हैं। जिन लोगों ने ‘कठपुतली थक गई’, ‘मुर्गीखाने की औरतें’, ‘मुकुटधारी चूहा’ जैसी उनकी कहानियां पढ़ी हैं, उन्हें पता है कि इस कथाकार की पकड़ से न समय की नब्ज छूटती है, न पाठक की। राकेश की खास बात है इस चीज की समझ, कि वाचक की बंद मुट्ठी लाख की होती है और खुलकर भी खाक की नहीं होती, बशर्ते सही समय पर खोली जाए। थोड़ा बताना, थोड़ा छुपा कर रखना, और ऐन उस वक्त उद्घाटित करना, जब आपका कुतूहल सब्र की सीमा लांघने पर हो - यह उनकी कि‍स्सागोई का गुर है। इसके साथ चुहलबाज भाषा और व्यंग्यगर्भित कथा-स्थितियां मिलकर यह सुनिश्चित करती हैं कि एक बार उठाने के बाद आप उपन्यास को पूरा पढ़कर ही दम लें।
 
लेखक परिचय :  राकेश तिवारी, उत्तराखंड के गरमपानी (नैनीताल) में जन्म। कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल से शिक्षा। उपन्यास ‘फसक’ के अलावा दो कहानी संग्रह ‘उसने भी देखा’ और ‘मुकुटधारी चूहा,’ एक बाल उपन्यास ‘तोता उड़’ और पत्रकारिता पर एक पुस्तक ‘पत्रकारिता की खुरदरी जमीन’ प्रकाशित। कुछेक शुरुआती कहानियों का पंजाबी, तेलुगु आदि भारतीय भाषाओं में अनुवाद। एक कहानी (तीसरा रास्ता) पर फि‍ल्म बनी है और एक कहानी (दरोग्गा जी से ना कय्यो) के नाट्य-रूपांतरण के बाद दिल्ली सहित कई शहरों में नाट्य प्रस्तुतियां। व्यंग्य और बाल लेखन भी। पत्रकार के रूप में अखबार, पत्रिकाओं में राजनीति, खेल, साहित्य, कला, फिल्म, पर्यावरण, जनांदोलन और अन्य समसामयिक विषयों पर लेखन।
 
उपन्यास : फसक 
लेखक : राकेश तिवारी 
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 
पृष्ठ संख्या : 254 
मूल्य : 450 रूपए हार्ड कवर, 225 रूपए पेपरबैक
Widgets Magazine
वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।