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अश्वत्थामा मारा गया किंतु अश्वत्थामा अमर है

सुशोभित सक्तावत|
अश्वत्थामा का अमरत्व वर्षों से अनेक मिथकों का हिस्सा रहा है। बचपन से ही हम अश्वत्थामा की अमरता की कहानियां सुनते आए हैं। यदा-कदा अख़बारों, टीवी और सोशल मीडिया में यह भी उल्लेख मिलता रहा है कि अश्वत्थामा को कहीं देखा गया और उसकी पहचान में वर्ण‍ित उसके जाति चिह्नों के आधार पर की गई। वैसे भी भारत का मन मिथकजीवी है और इस तरह के मिथकों में रमना उसको भाता है।
 
इसके बावजूद जहां महाभारत के शेष पात्रों पर अनेक काव्य और गल्पकृतियां रची जा चुकी हैं, अश्वत्थामा को केंद्र में रखकर वैसी कोई पुस्तक अभी तक प्रस्तुत नहीं की जा सकी थी। की पुस्तक "अश्वत्थामा" इस कमी को पूरा करती है और महाभारत के इस विस्मृत नायक को फिर से हमारी कल्पनाओं में जीवंत बना देती है।
 
यह पुस्तक अश्वत्थामा के जीवन पर एक उपन्यास है, जिसे स्वयं अश्वत्थामा के दृष्ट‍िकोण से यानी प्रथम पुरुष में लिखा गया है। के पन्ने उलटते हुए बहुधा ऐसा जान पड़ता है इसमें गल्प की लय उतनी उभरकर सामने नहीं आ पाई है, जितनी कि अपेक्षा की जानी चाहिए और अगर आशुतोष गर्ग अन्य पुरुष में यह पुस्तक लिखने का प्रयास करते तो संभवत: एक अधिक वस्तुनिष्ठ आख्यान हमारे हाथों में होता। इसके बावजूद आशुतोष की किताब अश्वत्थामा के जीवन पर मिथकों, कथाओं, सच्चाइयों और कल्पनाओं का एक अनूठा संकलन है और पुस्तक के लिए किया गया गहन शोध इसके हर पन्ने पर झलकता है।
 
आशुतोष गर्ग ने अश्वत्थामा को "महाभारत का शापित योद्धा" कहकर पुकारा है। यही उनकी किताब का उपशीर्षक भी है। हम सभी जानते हैं कि अश्वत्थामा का अमरत्व उसको मिला एक अभिशाप था, जो अमरत्व के बारे में पूर्व-निर्मित रोमानी कल्पनाओं को ध्वस्त करता है। अश्वत्थामा इस संसार-चक्र का चिर नागरिक है और महाभारत के काल से आज तक घटित हुए अनेकानेक युगों का साक्षी रहा है। हम अश्वत्थामा को एक कालयात्री भी कह सकते हैं। 
 
श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को अभिशाप दिया था, किंतु क्या उसका अपराध इतना बड़ा था भी। अश्वत्थामा की छवि एक कुटिल और दुराचारी नायक की बना दी गई है, जो कि दुर्योधन का सहयोगी था । लेकिन क्या यह सच है। आशुतोष गर्ग की किताब अश्वत्थामा के जुड़े इन अनेक कौतूहलों का संधान करती है। 
 
पौराणिक उपन्यासों में मराठी के शिवाजी सावंत, गुजराती के कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और हिंदी में नरेंद्र कोहली ने जो लक़ीर खींची है, उन मानदंडों के अनुकूल स्वयं को सिद्ध कर पाना तो ख़ैर हर युवा रचनाकार के लिए एक दुष्कर कसौटी है, फिर भी आशुतोष गर्ग ने एक प्रयास किया है। हमें इस प्रयास का स्वागत करना चाहिए। 
 
साथ ही महाभारत में धर्मराज युधिष्ठ‍िर द्वारा बोले गए सबसे बड़े असत्य की कथा के साथ जिस अश्वत्थामा का मिथक जुड़ा है, उसके अंतर्सत्यों की पड़ताल अर्धसत्यों के इस युग में आगे भी की जाती रहेगी, यह आशा नहीं करने का भी कोई कारण दिखाई नहीं देता। अस्तु।
 
पुस्तक : अश्वत्थामा 
लेखक : आशुतोष गर्ग 
प्रकाशक : मंजुल पब्ल‍िशिंग हाउस 
पृष्ठ : 184
मूल्य : 175 रुपए मात्र
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