हार्ट अटैक से बचें : दिल कीजिए आयुर्वेद के हवाले

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-अच्युत कुमार त्रिपाठी
 
विश्व की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हृदय रोग से पीड़ित है जो अनियमित भोजन, अनियमित दिनचर्या के साथ फास्ट फूड अत्यधिक प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से एसिडिटी, गैस, उच्च रक्तचाप, मोटापा तथा मधुमेह जैसे रोग के साथ हृदय रोग की उत्पत्ति करता है, जिसमें एंजायना पेन, हार्ट अटैक, आर्टी चोक, जैसे प्रमुख रोग हैं। 
 
प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य पदार्थों के अत्यधिक सेवन से की उत्पत्ति होती है जो रक्तवाहिनी के शिराओं में मोम की तरह जमा होकर रक्त के प्रवाह में बाधा उत्पन्न कर साँस लेने में कठिनाई पैदाकर को जन्म देता है। इसमें यकृत (लीवर) की भूमिका महत्वपूर्ण होती है जो प्रोटीन, ग्लूकोज आदि पदार्थों को घुलनशील बनाकर स्वास्थ्य के उपयोगी बनाती है। में 60 से 85 प्रतिशत रोगी आयुर्वेद के उपचार तथा खानपान को नियंत्रित कर बिना किसी शल्यक्रिया के आजीवन स्वास्थ्य रह सकते हैं। 
 
अनियमित खानपान तथा लंबे समय तक कब्ज की स्थिति में जब भोजन का पाचन नहीं होता और भोजन आमाशय तथा अन्य पाचन अंगों में एकत्र होकर सड़न पैदा कर देता है जिससे एक प्रकार के विषाक्त पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है और वह रक्त के साथ यूरिन एसिड में परिवर्तित होकर गुर्दों में जाकर छनन क्रिया में बाधा उत्पन्न कर देता है। 
 
जब किडनी से छनन क्रिया भरपूर ढंग से नहीं हो पाती तो यूरिया, प्रोटीन तथा अन्य द्रव्य रक्त के साथ हृदय में पहुँच जाते हैं जिससे रक्त में गाढ़ापन आ जाता है। नतीजतन आँखों के नीचे, पैरों में तथा घुटनों में सूजन के साथ-साथ संधिवात तथा उच्चरक्त चाप की वृद्धि हो जाती है। 
 
ऐसी स्थिति में एलोपैथी चिकित्सक लेसिक्स तथा अन्य हाई डोज दवाएं देते हैं जिससे रोगी में पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है। इससे प्रोटीन कैल्सियम जैसे आवश्यक तत्व शरीर से बाहर हो जाते हैं और रोगी अत्यंत कमजोर हो जाता है और तब रोगी को प्रोटीनयुक्त पदार्थ तथा इंजेक्शन देना पड़ता है।
इस स्थिति में आयुर्वेद कैसे सहायक है: 

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