हरिवंशराय बच्चन : क्या भूलूँ, क्या याद करूँ

डॉ. हरिवंशराय बच्चन के जन्मदिन पर विशेष

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'मैं छुपाना जानता तो जग मुझे साधु समझता
शत्रु मेरा बन गया है, छल रहित व्यवहार मेरा'

यह पंक्तियाँ जैसे ही जेहन में उतरती हैं, कविवर डॉ. हरिवंशराय बच्चन का व्यक्तित्व व कृतित्व साकार हो जाता है। बच्चनजी का साहित्य पढ़ने से यह बात स्वतः ही सिद्ध हो जाती है। काव्य रचनाओं के साथ-साथ उनके जिस साहित्यिक रूप ने इस उक्ति को प्रमाणित किया, वह है उनकी आत्मकथा। में शायद ही किसी रचनाकार की आत्मकथा में अभिव्यक्ति का ऐसा मुखर रूप दृष्टिगोचर होता है।

डॉ. धर्मवीर भारती बच्चनजी की आत्मकथा पर प्रतिक्रिया स्वरूप कहते हैं कि हिन्दी के हजार वर्षों के इतिहास में ऐसी पहली घटना है जब कोई अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से अपनी बात कहता हो।

डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार बच्चनजी की आत्मकथा में केवल उनका परिवार और व्यक्तित्व ही उभरा बल्कि उनके साथ समूचा काल और क्षेत्र भी गहरे रंगों में उभरा है।

स्पष्टतः कहा जाए तो बच्चन की आत्मकथा अपने जीवन और युग के प्रति एक ईमानदार प्रयास है। उन्होने स्वयं अपनी आत्मकथा की भूमिका में कहा है- 'अगर मैं दुनिया से किसी पुरस्कार का तलबगार होता तो अपने आपको और अच्छी तरह सजाता-बजाता और अधिक ध्यान से रंग चुनकर उसके सामने पेश करता। मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे मेरे सरल स्वाभाविक और साधारण रूप में देख सकें। सहज निष्प्रयास प्रस्तुत, क्योंकि मुझे अपना ही तो चित्रण करना है।'

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जीवन की आपा-धापी के बीच युगीन परिस्थितियों का ताना-बाना उसी रूप में प्रकट करना, यह किसी सच्चे ईमानदार रचनाकार का ही कर्म हो सकता है।

'जीवन की आपा-धापी में कब वक्त मिला, कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं , जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला ... हर एक लगा है अपनी दे-ले में।' और यही 'दे-ले' आपको क्या भूलूँ क्या याद करूँ से लेकर नीड़ का फिर-फिर निर्माण करती हुए बसेरे से दूर ले जाकर दश-द्वारों वाले सोपान पर ठहरती है। यह आत्मकथा किसी एक व्यक्ति की निजी गाथा नहीं, अपितु युगीन तत्कालीन परिस्थितियों में जकड़े, एक भावुक कर्मठ व्यक्ति और जीवन के कोमल-कठोर, गोचर-अगोचर, लौकिक-अलौकिक पक्षों को जीवन्त करता महाकाव्य है। अपनी इस यात्रा में आपने कीट्स से लेकर कबीर तक के मध्य साहित्य को मापा, वहीं अपने जीवन के मार्मक पक्षों को उजागर किया।

अपनी पत्नी श्यामा के प्रति आप विशेष रूप से कृतज्ञ रहे, जो आपकी प्राथमिक काल की तुकबंदियों को पढ़कर बच्चन को इसी क्षेत्र में रमने की प्रेरणा देती रहीं। अपनी अस्वस्थता के कारण बच्चनजी की पहली पत्नी श्यामा चल बसीं। उनके साथ गुजरे जीवन के उन क्षणों को बच्चन ने बड़ी भावुकता से ऐसे साकार किया कि वे सभी युगलों के लिए एक प्रतीक बन गए।

बच्चन कहते हैं, 'मैंने श्यामा को जब पहले दिन देखा था तभी मुझे वह सरलता साकार लगी थी। टेढ़ी दुनिया से कुछ अलग, जैसे किसी को अपने को पूर्ण समर्पित कर निश्चिंत होने को आतुर... उसके विषय में मेरे पास कहने को बहुत कुछ है। पर मैं जान रहा हूँ कि कितना भी कहकर न मुझे तृप्ति होगी न उसके प्रति न्याय होगा।'

प्रणय पत्रिका के अंतिम पूर्व गीत में वे लिखते हैं कि
'गगन-गगन के ऊपर घन, घन के ऊपर है उडुगन
पांती उडगन के ऊपर बसता है, प्राण पपीहे का प्रिय स्वाती
उसकी आँखों के करुणा कण, का सपना होंठ पर अंकित कर
जिसने सागर को गोदी में बिठला उपहास किया-सा,
तन के सौ सुख सौ सुविधा में मेरा मन वनवास दिया-सा।'

(लेखिका हिन्दी की सहायक प्राध्यापक हैं)
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- श्रीमती (डॉ.) वनिता वाजपेयी

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