बचपन के इक बाबूजी थे

27 नवंबर हरिवंशराय बच्चनजी की जन्म शताब्दी पर विशेष

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अमिताभ बच्चन बजरिया पुष्पा भारती

अमिताभ बच्चन के जीवन का पैंसठवाँ वर्ष उनके पिता डॉ. हरिवंशराय बच्चन का जन्मशती वर्ष है। अमिताभ स्वयं युवा पुत्र-पुत्री के पिता हैं। दो प्यारे बच्चों के नाना भी बन चुके हैं। अत्यंत व्यस्त जीवनचर्या है। ऐसे में आधी सदी से भी ज्यादा पीछे की बातें करना पता नहीं पसंद भी करेंगे या नहीं, यही संकोच मन में बना हुआ था- पर उनके साथ ऐसे नेह छोह के संबंध बन चुके हैं कि एक दिन कह ही दिया- अमित, समय निकालो तो कुछ देर बैठकर सिर्फ बाबूजी की बातें करें। आशा के अनुरूप उन्होंने हाँ कर दी। जब समय मिला तो सच मानिए ऐसा लगा, वक्त थम गया है। अतीत की गलियों में जो बहना शुरू किया, तो जल-थल एक हो गए और वे सिर्फ डूबते-उतराते रहे।

अमिताभ कहते हैं 'मैं इसे अपना बहुत बड़ा सौभाग्य मानता हूँ कि मेरा जन्म माँ और बाबूजी जैसे माता-पिता के घर हुआ। अच्छे संस्कार देने का श्रेय सिर्फ उन्हें ही जाता है। वे दोनों खुद अलग-अलग माहौल और संस्कारों के बीच पले-बढ़े थे। माँ एक बहुत अमीर सिख परिवार की बेटी थीं और बाबूजी एक लोअर मिडिल क्लास गरीब कायस्थ घर में जन्मे थे।

माँ एक अति आधुनिक शहर लाहौर के माहौल में बड़ी हुईं और बाबूजी एक ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक व साहित्यिक नगर इलाहाबाद में जिए। दोनों ही के पारिवारिक मूल्य बड़े ऊँचे,पवित्र और विशिष्ट थे। लेकिन थे दोनों दो ध्रुवों पर। एक एकदम पश्चिमी और दूसरा ठेठ पुरबिया। एक की शिक्षा-दीक्षा अँगरेजी के माध्यम से, दूसरे की हिन्दी और फारसी में। दोनों के बीच एक चीज जरूर बिलकुल एक जैसी थी- वह थी धार्मिक आस्था। सो इन दोनों के मिश्रण से मैं जो बना उसके से ही एक कान में रामचरित मानस गूँजी तो दूसरे में गुरुवाणी।'
'हम दोनों भाई इन्हीं दोनों विचारधाराओं के खूबसूरत मेल में पले-बढ़े थे। केवल विचारधारा ही नहीं, माँ-बाबूजी हमारे लिए एक-दूसरे के पूरक भी बने रहते थे मसलन एक बात याद आ रही है- तब हम 17 क्लाइव रोड इलाहाबाद में रहते थे। उस घर के पास रानी बेतिया की एक बड़ी-सी कोठी थी। चारों तरफ ऊँॅची-ऊँची दीवारें थीं। भीतर कोई जा नहीं सकता था। बड़ी मिस्टीरियस-सी लगती थी वह कोठी। मैं भीतर जाने को बहुत उत्सुक हो उठा था। एक दिन वहाँ का चौकीदार बोला कि चार आने दो तो अंदर जाने देंगे। माँ की ड्रेसिंग टेबल परएक डिब्बा रखा रहता था। उसमें वे कुछ चूड़ियाँ, क्लिप वगैरह रखती थीं। कभी-कभी उस डिब्बे में मैंने उन्हें रेजगारी डालते भी देखा था। सो एक दिन मैंने चुपचाप उसमें से चार आने चुरा लिए थे और उस दरबान को दे दिए थे।
उस दुष्ट ने पैसे हजम कर लिए और भीतर जाने भी नहीं दिया था। उसका फ्रस्ट्रेशन जो हुआ सो हुआ। घर पर चोरी पकड़ी गई और माँ से मार पड़ी। माँ तो मार-मूरकर अपने काम में लग गईं, पर बाबूजी को शायद यह लगा होगा कि बच्चे को इस तरह मारना नहीं चाहिए तो उन्होंने माँ से तो कुछ नहीं कहा, मुझे अलग ले गएऔर खूब समझाया कि चोरी नहीं करनी चाहिए। तुम्हें जब जिस चीज की जरूरत हो, हमसे कहकर लेनी चाहिए। हमसे माँगनी चाहिए। हमारे लिए देना संभव होगा तो तुम्हें जरूर देंगे, पर यदि संभव नहीं होगा तो समझ लेना हमारे वश के बाहर की बात है और तुम्हें भी सब्र कर लेना चाहिए। इस तरह की बातें वे इस तरह समझाते थे कि बाल मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ जाती थीं और मन दुःखी भी नहीं होता था।'
फिर तो अमिताभ इस तरह की तमाम बातें याद करते रहे। मैंने जब उन्हें याद दिलाया कि बच्चनजी बचपन में हर छोटी-बड़ी बात का खयाल रखते ही थे, पर जब वे कुछ बीमार और अशक्त हो गए थे तब भी तुम्हारी ताकत का स्रोत वे ही बने रहे थे। हर परेशानी के समय तुमसे भले हीवे बात न कर पाते हों, पर उनके पास चुपचाप बैठने मात्र से तुम हल्का महसूस करने लगते थे, ऐसा तुमने मुझे बताया था तो अमिताभ बोले- 'स्वाभाविक सी बात है। दुःख-दर्द में यदि कोई अपना बिना कुछ कहे चुपचाप आपका हाथ पकड़ ले तो एक आत्मबल, एक साहस मिलता है। ढाढस बढ़ता है।
हम भगवान के मंदिर में जाकर, उनके सामने ऐसे ही तो बैठ जाते हैं। वो हमसे कुछ कहते हैं क्या? बस एक दिव्यता की परछाई में लिप्त, हमें अच्छा लगता है। हम उन्हें अपना कष्ट अर्पण करते हैं- एक शक्ति मिलती है, आत्मविश्वास बनता है- माता-पिता हम सबों के जीवन में, हमारी वो दिव्य शक्ति है, जहाँ से हमें सांत्वना मिलती है, शक्ति मिलती है। बाबूजी के साथ बैठने में मैं ऐसा ही अनुभव करता था। अपनी सबसे बड़ी परेशानियों के दिनों में भी मैंने पाया था कि उनकी लिखी कृतियों को जब मैं पढ़ता, तो कहीं न कहीं, मेरे मन में जो प्रश्नों का तूफान चल रहा होता था, उसका उत्तर मिल जाता था। बाबूजी नहीं हैं, तो मेरे मन में बसी उनकी प्रतिभा है, उनकी कृतियाँ हैं अब! उनकी पुस्तकों में मैं उन्हें पा लेता हूँ।'

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