ग़ालिब का ख़त-41

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12 बजे थे, मैं अपने पलंग पर लेटा हुआ हुक्क़ा पी रहा था कि आदमी ने आकर ख़त दिया। मैंने खोला, पढ़ा। भले को अंगरखा या कुरता गले में न था। अगर होता तो मैं गरेबान फाड़ डालता। हज़रत का क्या जाता? मेरा नुक़सान होता। सिरे से सुनिए। आपका क़सीदा बाद-ए-इस्लाह भेजा। उसकी रसीद आई। कई कटे हुए शेर उल्टे आए, उनकी क़बाहरत पूछी गई, क़बाहत बताई गई।

अल्फ़ाज़ क़बीह की जगह बे ऐब अल्फ़ाज लिख दिए गए। लो साहिब, ये अशआ़र भी क़सीदे में लिख लो। इस निगारिश का जवाब आज तक नहीं आया। शाह इसरारुलहक़ के नाम का कागज़ उनको दिया। जवाब में जो कुछ उन्होंने ज़बानी फरमाया, आपको लिखा गया। हज़रत की तरफ़ से इस तरह का भी जवाब न मिला।

पुर हूँ मैं शिकवे से यूँ, राग से जैसे बाजा
इक ज़रा छेड़िए, फिर देखिए क्या होता है।

  चौथा लश्कर हैज़े का, उसमें बहुत-से पेट भरे मरे। पाँचवाँ लश्कर तप का, उसमें ताब व ताक़त अ़मूमन लुट गई। मरे आदमी कम, लेकिन जिसको तप आई, उसने फिर आज़ा में ताक़त न पाई। अब तक इस लश्कर ने शहर से कूच नहीं किया।      
सोचता हूँ कि दोनों ख़त बैरंग गए थे, तलफ़ होना किसी तरह मुतसव्वर नहीं। ख़ैर, अब बहुत दिन के बाद शिकवा क्या लिखा जाए। बासी कढ़ी में उबाल क्यों आए। बंदगी बेचारगी।

पाँच लश्कर का हमला पै दर पै इस शहर पर हुआ। पहला बाग़ियों का लश्कर, उसमें पहले शहर का एतबार लुटा। दूसरा लश्कर ख़ाकियों का, उसमें जान-ओ-माल-नामूस व मकान व मकीन व आसमान व ज़मीन व आसार-ए-हस्ती सरासर लुट गए। तीसरा लश्कर का, उसमें हज़ारहा आदमी भूखे मरे।

चौथा लश्कर हैज़े का, उसमें बहुत-से पेट भरे मरे। पाँचवाँ लश्कर तप का, उसमें ताब व ताक़त अ़मूमन लुट गई। मरे आदमी कम, लेकिन जिसको तप आई, उसने फिर आज़ा में ताक़त न पाई। अब तक इस लश्कर ने शहर से कूच नहीं किया।

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पीर-ओ-मुर्शिद,
मेरे घर में दो आदमी तप में मुब्तिला हैं, एक बड़ा लड़का और एक मेरा दरोग़ा। ख़ुदा इन दोनों को जल्द सेहत दे। बरसात यहाँ भी अच्छी हुई है, लेकिन न ऐसी कि जैसी काल्पी और बनारस में। ज़मींदार खुश, खेतियाँ तैयार हैं। ख़रीफ़ का बेड़ा पार है। रबीअ़ के वास्ते पोह मन में मेंह दरकार है। किताब का पार्सल परसों इरसाल किया जाएगा।

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