क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगी?



रिमझिम बारिश की ठंडक और हाथ में अदरक वाली चाय की गरमाहट, मौसम और मन को रुमानी बना ही देता है। उस पर रेडियो पर गुनगुनाती हर धुन के साथ ताल से ताल मिलाती बूंदों की जुगलबंदी...क्या कहने। ऐसा लगता है मन को पंख लग गए हैं।
बालकनी में इसी एहसास को महसूस करते हुए अचानक नजर पास की बालकनी पर खड़ी दो लड़कियों पर पड़ी। लड़कपन का अल्हड़पन, उनके रोम-रोम से झलक रहा था। गौर से सुना को पता चला कि फ्रेंडशिप डे सेलिब्रेशन की बातें चल रही हैं। कहां जाएंगे, कौन-सा हैंडबैंड किसके लिए लेंगे, कौन-सा ड्रेस कोड होगा...।

धीरे-धीरे उनकी बातें मेरे लिए गुम होती गईं और उनके हाव-भाव पर ही नजर अटक गई। दोस्ती का दिन, दोस्तों के नाम, दोस्तों के साथ। उनकी चहल-पहल ने मन में सवाल उठा दिया, मेरा कौन है? आपका सबसे अच्छा दोस्त कौन है?

जवानी की दहलीज पार कर चुके हैं, बुढ़ापा अभी दूर है। ऐसे वक्त में कौन है हमारा सबसे अच्छा और सच्चा दोस्त, जो केवल हमारी फिक्र करे, जिसके साथ वक्त गुजार कर सारे शिकवे दूर हो जाएं?

बहुत वक्त बाद मैंने अपने इस दोस्त पर ध्यान दिया, जिससे सच्चा कोई और हो ही नहीं सकता। मेरी, मुझसे दोस्ती। मन ने फिल्मी संवाद खुद से किया, क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगी?

सवाल थोड़ा अजीब जरुर है, पर बेवजह बिल्कुल नहीं। कितनी दफा हमने सोचा कि जिन सांसों की बदौलत यह जिंदगी चल रही है, उसे हमने कितनी बार महसूस किया है? सुबह बिस्तर से उठते वक्त बच्चे के स्कूल जाने की चिंता और खुद या पति के दफ्तर की भागदौड़ सोचने के बजाए क्या कभी पांच मिनट खुद की आती-जाती सांसों को महसूस किया है?
तन की खूबसूरती पर फिर भी ध्यान दे दिया हो, क्या मन की सुंदरता निखारने के लिए वक्त निकाला है? कितनी बार अपनी पीठ ठोंकी, यह कहकर कि यह काम मैंने बहुत अच्छा किया ?
गुस्सा निकालने के बहुत जरिए ढूंढे लेकिन खुश होने के जरिए तलाशना क्यों कम कर दिए? लेकिन इन सब में मैं कहां हूं? बहुत वक्त हो गया, खुद के लिए अपनी पसंद का कोई पकवान बनाए, जिसे खाकर तो क्या सोचकर मुंह में पानी आने लगे? क्यों अपनी हर बात खुद से न शुरु होकर दूसरों से शुरु होने लगी?
बागवानी का शौक है, पेड़-पौधे भी लगाए हैं, पानी-खाद को भी रोज ध्यान रखती हूं। लेकिन आखिरी बार कब देखा था, किसी कोपल को खिलते, किसी कली को फूल बनते, याद नहीं। बारिश होने पर उसका आंगन या बालकनी में उसे देखकर मजा ले लेते हैं, क्यों नहीं कदम उठते इसमें सरोबार हो जाने को?

मेरे बच्चे, मेरा परिवार, मेरी जिम्मेदारियां सब मेरी ही हैं। तनाव तो है, इससे भागना भी नहीं है, लेकिन इन सब के बीच मैं कहां हूं? मन खराब हुआ तो शॉपिंग कर ली, दोस्तों से गप्पे कर लिए लेकिन उस उलझते मन से बैठकर बातें कितनी की? क्यों नहीं पहले उससे बात की, उसे खुद करने की कोशिश की, फिर शॉपिंग पर गई? क्यों भागने लगती हूं मैं खुद से? हालातों का सामना करना तो सीख लिया लेकिन खुद का सामना आईने के सामने कितनी बार कर पाती हूं?

जब कभी चार पल खुशियों की बीच रहती हूं तो उन पलों का मजा लेने के बजाए ज्यादा वक्त सेल्फी लेने में चला जाता है। शायद मन में कहीं न कहीं इस बात का डर रहता है कि अगले खुशियों वाले दिन पता नहीं अब कब आएंगे, तब तक इन तस्वीरों को देखकर ही मन को खुश करते रहेंगे। क्यों नहीं उस वक्त को मन के कैमरे में कैद करती मैं, जितना वक्त सेल्फी लेने में गया उतने पल उन्हें जी लेती, तो शायद मन की उमंग बढ़ जाती।
लेकिन कोई बात नहीं, कहते हैं ना - जब जागो तभी सवेरा। तो बस इस बार का फ्रैंडशिप-डे मेरे नाम, खुद से दोस्ती की नई शुरुआत। दोस्ती अपने मन से, अपने काम से, अपने आत्मविश्वास से। एक बार मन से दोस्ती पक्की हो जाए, फिर वेलेंटाइन-डे आने में अभी कुछ महीने बाकी हैं, खुद से प्यार तो होकर रहेगा।


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