ऐसे बिगाड़ा हमने पर्यावरण को...


3. शहरों में वाहनों के बढ़ते ट्रैफिक और घरों में इले‍क्ट्रॉनिक सामान और समारोह में बजने वाले बाजे और लाउडस्पीकर्स की कृत्रिम ध्वनियों से हमने न केवल प्रकृति के मधुर कलरव को खो दिया है बल्कि अपनी कर्णशक्ति की अक्षमता और मानसिक विकारों के साथ ही नष्ट होती प्रकृति के शोर को भी अनदेखा कर दिया है।
 
आज ध्वनि प्रदूषण कई प्रकार की मानसिक और शारीरिक विकृतियों का कारण है जिसमें नींद न आना, चिड़चिड़ाहट, सिरदर्द एवं अन्य विकृतियां प्रमुख हैं। इस प्रदूषण से मनुष्य या प्रकृति ही नहीं, बल्कि धरती के अन्य जीव-जंतु भी प्रभावित हैं।
 
4. : वनों का विनाश, खदानें, भू-क्षरण और कीटनाशक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से हमने भूमि की उर्वर क्षमता बढ़ाई नहीं बल्कि उसे प्रदूषित किया है। इनके कारण भूमि को लाभ पहुंचाने वाले मेंढक और केंचुए जैसे जीवों को नष्ट कर हमने फसलों को नष्ट करने वाले छोटे जीवों को पनपने की राह आसान की है।
 
कृषि तथा अन्य कार्यों में कीटनाशकों के प्रयोग की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अधिकांश कीटनाशकों को विषैला घोषित किया है, बावजूद इसके हम इनका प्रयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं।

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