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जैव विविधता के खतरे, मूल्य और संरक्षण

Last Updated: सोमवार, 12 जून 2017 (15:46 IST)

डॉ. साधना सुनील विवरेकर
इस पृथ्वी पर करोड़ों अरबों वर्ष पूर्व जीवों की उत्पति हुई। पृथ्वी पर ही वह वातावरण उपस्थित है जिसके कारण जीवों का अस्तित्व संभव है। ऑक्सीजन, जल, तापमान, आद्रता, मिट्टी, प्रकाश सब कुछ संतुलित मात्रा में पृथ्वी पर उपलब्ध है। जिसके कारण जीवन संभव हो सका, विभिन्न जीवों का, फिर चाहे वह पौधे हों या वृक्ष, पशु हो या पक्षी, बैक्टीरिया वायरस हों या मनुष्य, सभी का विकास हुआ और एक दूसरे के सहअस्ति‍व से पारिस्थितिक चक्र से, ऊर्जा प्रवाह से बरसों से सबका जीवन चलता रहा। पृथ्वी पर पाए जाने वाले समस्त जीवों में (पेड़, पौधे, पशु-पक्षी मानव) पारस्परिक विभिन्नता पाई जाती है। यह जैवविविधता स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय व वैश्विक स्तर पर होती है, जो उस स्थान की जलवायु, तापक्रम, आद्रता मिट्टी व प्रकाश की उपलब्धता इत्यादि द्वारा निर्धारित होती है।
 
पृथ्वी पर होने वाले भौतिक व रासायनिक परिवर्तनों, विभिन्न खगोलीय घटनाओं व उत्परिवर्तन इत्यादि द्वारा जीवों का विकास हुआ व उनमें विविधता विकसित होती गई। सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले जीव एक कोषीय थे, जिनके विकास के विभिन्न चरणों को पार करने पर बहुकोषीय व अत्यंत जटिल संरचना वाले जीवों का विकास हुआ। हरे पौधों के जन्म से विकास की नई इबारत प्रारंभ हुई और आज भी वही सोलर ऊर्जा को परिवर्तित कर हम सबके लिए भोजन निर्माण करने का कार्य करते हुए इस पारिस्थिति‍की तंत्र का आधार स्तंभ हैं। उनके बगैर हम सबका जीवन एक क्षण भी संभव नहीं क्योंकि वे ही हमारे लिए भोजन, जल व प्राणवायु को सतत प्रदान करते है। इन पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं की जितनी विभिन्न प्रजातियां होंगी, उनकी उपयोगिता मानव जीवन के लिए उतनी अधिक होगी। क्योंकि यह सब मात्र भोजन ही नहीं बल्कि फल, फूल, औषधी, लकड़ी, मसाले, जन्म से मृत्यु तक की हर उपयोगी व आवश्यक वस्तुएं प्रदान करते हैं। 
 
मानव को टेक्नोलॉजी व मशीनों के विकास के साथ इन जीवित प्राणियों का उनकी विविधता का मोल समझना होगा व इनके के उपाय स्वहित में ढूंढने होंगे। प्रकृति ने जैवविविधता के रूप में जो अपार प्राकृतिक संपदा दी है, पेड़-पौधों व हर प्राणी मात्र में विभिन्न प्रजातियां व उनमें विविधता निर्मित की है, उसे बचाने हेतु बनाए रखने के प्रयास करने होंगे। तभी गेहूं-चावल से लेकर आम, अनार तक व गुलाब, गेंदे से लेकर गुलमोहर, अमलतास, तक और चींटी से लेकर हाथी व सांप से लेकर शेर तक की विभिन्न प्रजातियां सुरक्षित होंगी। हमारे विकास की कीमत ये निरीह मासूम व बेगुनाह उठाते रहे हैं।
 
हमने अपने विकास के लिए इनके आवासों को छीना, प्रकृति, निर्मित भाजन श्रृखंला में व्यवधान डाल इनसे भोजन छीनकर इनके जीने का आधार छीनने का पाप किया है, जिससे हमारे जीवन को भी क्षति पहुंच रही है।
 
जैव विविधता का खतरा -
मानव ने अपने विकास के लिए, औद्योगिकीकरण के लिए असंख्य प्राणियों व पेड़-पौधों को नष्ट कर दिया जिसके मुख्य कारण निम्न है -
 
(1) आवासीय क्षति - जनसंख्या में अत्याधिक वृद्धि, बढ़ता शहरीकरण औद्योगिकीकरण वनों के विनाश के कारण बने, जिनके उजड़ने से हजारों पशु पक्षियों व प्राणियों का बसेरा ही खत्म हो गया व इस प्रकार उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। कई प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर है या लुप्त हो चुकी है।
 
(2) वन्यजीवन का अवैधानिक शि‍कार - हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए (जैसे - भोजन व अन्य) तो प्राकृतिक संपाद अपार है, पर हमारे स्वार्थ व लालच के आगे सींग, नाखून, चमड़ा हाथी दांत, जैसी वस्तुओं के बहुमुल्य होने से इन्हें प्राप्त करने के लालच व उनसे पैसा कमाने की चाहत की बली ये मजबूर असहाय मासूम जानवर अपनी जान देकर चुका रहे है। प्रतिबंधित होने पर भी इनका शि‍कार बरसों से हो रहा है व हिरण बाध बारहसिंगा सबकुछ खत्म होने की कगार पर हैं। कालाहिरण, मगर, कछुए, विषहीन सर्प, सूअर, शेर, बाघ, चीता हो या पक्षियों की प्रजातियां लुप्त हो रही है जिनका संरक्षण आवश्यक है।
 
(3) मानव वन्य जीवन संघर्ष - वर्तमान समय में वनों की अवैध कटाई घास स्थलों का, चारागाह स्थलों का रूपांतरण कई समस्यों का कारण है -
कृषि व अन्य कारणों से रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग ने प्रदूषण के साथ सूक्ष्म जीवों को भी लुप्त कर दिया है। अतः विकास की हदें तय करने व लाभ के लिए वन्य जीवन को खतरे में न डालने के संकल्प तथा विकास व वन्य जीवन के बीच संतुलन बनाए रखन से ही मनुष्य वन्यजीव संघर्ष विवाद का हल संभव है।
 
(4) सड़क व रेलमार्गों के लिए वनस्पति व प्राणियों को उजाड़ा जाना।
(5) कृषि भूमि का आवासीय क्षेत्रों में परिवर्तन।
(6) उद्योगों के लिए वनों व चारागाहों का उन्मूलन।
(7) वन्य प्राणियों को भोजन, सजावट की वस्तुओं व बाजार मूल्य की अधिकता के कारण मारना।
विभिन्न जातियों का विलुप्त या संकटापन्न होना रोकना होगा।
 
शहरीकरण औद्योगिकीकरण, जनसंख्या वृद्धि, वनों का विनाश व वन्य जीव जात के आवास स्थलों के खत्म होने के परिणामस्वरूप संसार में जीव जात की अनेक प्रजातियां प्राणी एवं पेड़-पौधों या तो विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्त होने की कगार पर हैं। विलुप्त प्रजाति का पुर्ननिर्माण असंभव है, अतः उसका उसके प्राकृतिक आवास में संरक्षण आवश्यक है इस हेतु अंर्तराष्ट्रीय संघ ने 1984 में रेड डाटा बुक का प्रकाशन किया व संकटापन्न प्रजातियों की विभिन्न श्रेणियों में विभाजन किया।
 
1 संकटापन्न प्रजातियां - प्राकृतिक आवास नष्ट होने से प्रजनन की स्थिति समाप्त सी हो गई है जिससे विलुप्त होने की संभावना बढ़ गई है।
उदा. भारतीय सोन चिड़िया, शेर, गेंडा।
 
2  दुर्लभ जातियां - ऐसी वन्य प्रजातियां जो अब केवल विशिष्ट भू-भाग या सीमित क्षेत्र में ही रह गई हैं ।
उदा. सफेद शेर, भारत में केवल बांधवगढ़ में ही रह गया है।
 
3  संकटमयी प्रजातियां - प्राकृतिक आवास नष्ट होने से विलुप्त होने की स्थिति में पहुंच चुकी हैं ।
 
4  विलुप्त प्रजातियां - किसी समय पाई जाती थीं, लेकिन पर्यावरण व प्राकृतिक संपदा के कारण से लुप्त हो चुकी हैं। उनके होने के प्रमाण जीवाश्म के रूप में ही उपलब्ध हैं। उदा. आर्कियोप्टेरिक्स, ट्राइलोबाईट।
 
5 प्रहार सुलभ प्रजातियां - वे प्रजातियां जो कुछ ही वर्षो में विलुप्त होने में है क्योंकि दिन-प्रतिदिन इनकी संख्या तेजी से घट रही है। उदा. चीता, काला हिरण, सारस, तितली (कुछ प्रजातियां)।

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