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ध्यान-योग से बढ़ाएं अपनी स्मरण शक्ति, बनें शक्ति संपन्न

Author सुशील कुमार शर्मा|

 


उधो, न भए दस-बीस 

'यज्‍जाग्रतो दूरमुदेति देवं तदु सुप्‍तस्‍य तथैवैति दूरंगमं
ज्‍योतिषां ज्‍योतिरेकं तन्‍मे मन: शिव संकल्‍पमस्‍तु।।'
 

अर्थात जो जागृत दशा में दूर से दूर चला जाता है अर्थात जो मनुष्‍य के में रहता हुआ भी दैवी शक्ति संपन्‍न है, जो सोती दशा में लय को प्राप्‍त होता है अर्थात न जाने कहां-कहां चला जाता है, जो जागते ही फिर लौटकर आ जाता है अर्थात पहले के समान अपना सब काम करने लगता है, जो दूरगामी है अर्थात जहां नेत्र आदि इन्द्रियां नहीं जा सकतीं वहां भी पहुंच जाता है, जो भूत, भविष्‍य और तीनों को जान सकता है, जो प्रकाशात्‍मक है अर्थात जिसके प्रकाश से अतिवाहित हो इन्द्रियां अपने-अपने विषयों में जा लगती हैं, वह मेरा मन कल्‍याण की बातों को सोचने वाला हो।
 
मनोवैज्ञानिकों ने बनावट के अनुसार मन को 3 भागों में वर्गीकृत किया है-
 
1. सचेतन : यह मन का लगभग 10वां हिस्सा होता है जिसमें स्वयं तथा वातावरण के बारे में जानकारी (चेतना) रहती है। दैनिक कार्यों में व्यक्ति मन के इसी भाग को व्यवहार में लाता है।
 
2. अचेतन : यह मन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है जिसके कार्य के बारे में व्यक्ति को जानकारी नहीं रहती।
 
3. अर्द्धचेतन या पूर्वचेतन : यह मन के सचेतन तथा अचेतन के बीच का हिस्सा है जिसे मनुष्य चाहने पर इस्तेमाल कर सकता है, जैसे स्मरण शक्ति का वह हिस्सा जिसे व्यक्ति प्रयास करके किसी घटना को याद करने में प्रयोग कर सकता है।
 
फ्रॉयड ने कार्य के अनुसार भी मन को 3 मुख्य भागों में वर्गीकृत किया है।
 
1. इड (मूल प्रवृत्ति) : यह मन का वह भाग है जिसमें मूल प्रवृत्ति की इच्छाएं (जैसे कि उत्तरजीवित यौनता, आक्रामकता, भोजन आदि संबंधी इच्छाएं) रहती हैं, जो जल्दी ही संतुष्टि चाहती हैं तथा खुशी-गम के सिद्धांत पर आधारित होती हैं। ये इच्छाएं अतार्किक तथा अमौखिक होती हैं और चेतना में प्रवेश नहीं करतीं।
 
2. ईगो (अहम्) : यह मन का सचेतन भाग है, जो मूल प्रवृत्ति की इच्छाओं को वास्तविकता के अनुसार नियंत्रित करता है। इस पर सुपर ईगो (परम अहम् या विवेक) का प्रभाव पड़ता है। इसका आधा भाग सचेतन तथा अचेतन रहता है। इसका प्रमुख कार्य मनुष्य को तनाव या चिंता से बचाना है।
 
फ्रॉयड की मनोवैज्ञानिक पुत्री एना फ्रॉयड के अनुसार यह भाग डेढ़ वर्ष की आयु में उत्पन्न हो जाता है जिसका प्रमाण यह है कि इस आयु के बाद बच्चा अपने अंगों को पहचानने लगता है तथा उसमें अहम् भाव (स्वार्थीपन) उत्पन्न हो जाता है।
 
3. सुपर-ईगो (विवेक; परम अहम्) : सामाजिक, नैतिक जरूरतों के अनुसार उत्पन्न होता है तथा अनुभव का हिस्सा बन जाता है। इसके अचेतन भाग को अहम्-आदर्श (ईगो-आइडियल) तथा सचेतन भाग को विवेक कहते हैं। 
 
 
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