इसराइली प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दूरगामी सुपरिणाम


भारत में इसराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का दौरा वहीं से आरम्भ हुआ, जहां पर मोदीजी ने छह महीने पहले इसराइल में छोड़ा था। निसंदेह, मित्रता की प्रथम शर्त है निरंतरता अन्यथा वह मात्र औपचारिकता रह जाती है। मित्रता की दूसरी शर्त है समानता। उदाहरण के लिए दाता और याचक में मित्रता नहीं होती, उदारवाद और अतिवाद के बीच दोस्ती नहीं होती, इत्यादि। तीसरी शर्त है मित्रता का नैसर्गिक होना। जहाँ समानता हो किन्तु आपसी व्यवहार की कोई संभावना न हो वहाँ भी मित्रता नहीं टिकती।


राष्ट्रों की आपसी मित्रता मनोरंजन के लिए नहीं होती और न ही दिखावे के लिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तो एक दूसरे के साथ बराबरी से खड़ा होना पड़ता है। 'रायसीना संवाद' नई दिल्ली में प्रतिवर्ष आयोजित एक बहुपक्षीय सम्मेलन है। इस सम्मेलन में हुए प्रधानमंत्री नेतन्याहु के भाषण को यदि आपने सुना हो तो निश्चित ही आपको लगा होगा कि उनकी कुछ बातें हमारी परंपरागत सांस्कृतिक मान्यताओं के विरुद्ध है। किन्तु वे आज के युग की कड़वी सच्चाई बन चुकी हैं।

इसराइली प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने अपने यहूदी इतिहास से कुछ सीखें ली हैं। उनमे से प्रमुख है कि इस दुनिया में कमजोर देश जीवित नहीं रह सकता क्योंकि देश कोई भी हो वे केवल शक्तिशाली के साथ सुलह चाहते हैं, उसके साथ रिश्ते जोड़ना चाहते हैं, दुर्बल से नहीं। यही कारण रहा कि इसराइल ने सर्वप्रथम अपने
सुरक्षा के घेरे को मजबूत किया। इसराइल एक बित्ता सा राष्ट्र है और वह एक ऐसे अशांत और अस्थिर क्षेत्र में स्थित है, जहाँ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए उसका सैन्य दृष्टि से मज़बूत होना एक अनिवार्यता है।

उधर भारतीय संस्कृति में सिखाया गया है कि शक्तिशाली बनो किन्तु विनम्र भी बने रहो। नेतन्याहू के अनुसार विनम्रहोना अच्छी बात है किन्तु कभी सख्त होना भी बेहतर होता है। भारत में हमारे पूर्वज शांति पसंद थे इसलिए विदेशी आक्रांताओं ने इसका लाभ उठाया और इस देश को जब चाहा तब लूटा और गुलाम बनाया।

नेतन्याहू ने अपने भाषण में चार प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया। पहला देश, को सामरिक रूप से शक्तिशाली बनाओ। परन्तु इसके लिए पर्याप्त धन चाहिए, अतः दूसरी प्राथमिकता है आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनने की। देश को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने के लिए शिक्षा, तकनीक और इनका उपयोग करने वाले व्यापारिक संस्थान चाहिए।

सरकार ऐसे नियम और कानून बनाए जो व्यापार को बढ़ावा देते हों। उसे आसान करते हों और लालफीताशाही को समाप्त करते हों। तीसरी प्राथमिकता है विश्व में अपने देश को राजनैतिक रूप से शक्तिशाली बनाने की और इसके लिए आवश्यक है सामान विचारों वाले, विशेषकर प्रजातान्त्रिक राष्ट्रों में आपसी तालमेल और गठबंधन।


यह लेखक भी उनके इस तर्क से सहमत है क्योंकि देखा जाता है कि आज की इस रंग बदलती दुनिया में जहाँ सभी राष्ट्र अपने हितों को सर्वोपरि रखते हैं, और अवसर पड़ने पर तुरंत पाला बदलने में नहीं हिचकते। ऐसे में भारत को कुछ ऐसे राष्ट्रों का साथ चाहिए जिन पर वह आँखे मूँद कर भरोसा कर सके।

दूसरी ओर आतंकवाद कुछ राष्ट्रों का राष्ट्रीय धर्म बन चुका है। ऐसे में धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक राष्ट्रों में आपसी सामन्जस्य अतिआवश्यक है, जहां बिना झिझक सूचनाओं का आदान प्रदान हो सके एवं आतंक को पोषित करने वाले राष्ट्रों की गतिविधियों का पर्दाफाश कर उन पर नकेल डाले जा सकें।

प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपनी अंतिम किन्तु महत्वपूर्ण बात रखते हुए कहा कि कोई भी राष्ट्र अपने उद्देश्यों में तभी सफल हो सकता है जब उसकी एक सांस्कृतिक विरासत हो जो उसने उसे सावधानीपूर्वक सहेज कर
रखी हो और, अपने सांस्कृतिक मूल्यों में विश्वास हो जो नागरिकों के मनों में गहराई से जमे हों।

इसके अतिरिक्त भारत ने इसराइल के साथ नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए जो विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देंगे। दोनों देश एक दूसरे के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में अर्जित तकनीकी निपुणता का उपयोग कर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।

इजराइल उन उन्नत राष्ट्रों की गिनती में है जिसका तकनीक के विकास में निवेश अत्यधिक होता है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि इसराइल में ऑटोमोबाइल उद्योग अधिक पुराना नहीं है किन्तु जिस तरह का सॉफ्टवेयर वे अपने नए वाहनों में डाल रहे हैं उससे वाहन, वाहन नहीं, एक चलता फिरता कंप्यूटर बन जाएगा। जब इस तरह की तकनीक का विकास हो तो विदेशी निवेश बहुत सरलता से उपलब्ध हो जाता है।

तकनीक में नवीनता, गुणवत्ता और श्रेष्ठता लाने वाले देश ही व्यावसायिक स्पर्धा में चीन के आगे टिक सकता है। दूसरे, इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद से भी भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ को बहुत कुछ सीखना है। मोसाद के बारे में माना जाता है कि यदि उनके राष्ट्र के विरुद्ध किसी ने अपराध किया तो अपराधी फिर दुनिया के किसी भी कोने में जाकर क्यों न छुप जाए मोसाद के जासूस उसका पीछा नहीं छोड़ते और उसे ठिकाने लगा ही देते हैं। इसीलिए इसराइल के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का कोई सोचता भी नहीं।

घुसपैठियों को रोकने के लिए भी उनके उपकरण अत्याधुनिक होते हैं और घुसपैठियों के लिए जानलेवा। इसराइल के पास तकनीक है और भारत के पास संकल्प (इरादा) भी है और संसाधन भी। नेतन्याहू की यह यात्रा निश्चित ही एक प्रतिष्ठित विदेशी राजनयिक की सफलतम यात्राओं में से एक सिद्ध होगी और विश्वास है कि दोनों देशों को इसका प्रत्यक्ष लाभ शीघ्र देखने को मिलेगा।

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