कांग्रेस को हमेशा कोई 'नाथ' ही क्यों लगता है?

- रमण रावल
यह कांग्रेस का चरित्र है, मजबूरी, परंपरा या कमजोरी कि उसे संकट से उबरने के लिए सदैव कोई व्यक्ति की जरूरत होती है। कोई नीति, कोई विचार, कोई एजेंडा कभी उसकी प्राथमिकता नहीं रहता। यही वजह है कि 125 से ज्यादा पुरानी पार्टी का तमगा हासिल करने के बावजूद वह अपने जीवनकाल के सबसे बुरे दौर में पहुंच चुकी है।

केंद्र से लेकर तो प्रदेश तक नेतृत्व, नीति, मुद्दों के सूखेपन से बेजार कांग्रेस की बंद होती धड़कनें तभी शुरू हो पाती हैं, जब उसे किसी हाथ का सहारा मिलता है। शायद इसीलिए नई कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा है। नेतृत्व के इसी सूखे को दूर करने के लिए मध्यप्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष की कमान को दी गई है, साथ में सुरक्षा घेरे की तरह 5 कमांडो उनके आसपास रखे गए हैं। ये हैं बतौर चुनाव प्रचार प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया और 4 कार्यकारी अध्यक्ष। किसी चमत्कार की उम्मीद में की गई ताजा व्यूह रचना प्रदेश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरने से ज्यादा कुछ कर पाएगी, इसकी संभावना न्यूनतम ही है। ऐसा कतई नहीं है कि मप्र भाजपा की सल्तनत है जिसे दूसरा कोई राजनीतिक दल संचालित नहीं कर सकता।

कांग्रेस के पास इस बात के भरपूर अवसर थे कि वह 2003 का चुनाव हारने के बाद गंभीरता बरतती, कारणों की सही मीमांसा करती, जनहित के मुद्दे तलाशती, कार्यकर्ताओं में उम्मीद जगाती और वापसी की व्यूह रचना बनाती। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि उसके कार्यकर्ता जब तक हाथी पर अपने राजा को बैठा देख नहीं लेते, उन्हें युद्ध लड़ने की प्रेरणा ही नहीं मिलती। कांग्रेस की दूसरी मुश्किल यह है कि यह एक ऐसी सेना है जिसके अलग-अलग रेजीमेंट हैं और उनके अलग-अलग दल प्रमुख हैं। उन रेजीमेंट की निष्ठा समूची कांग्रेस के प्रति न होकर अपने क्षत्रप के प्रति ही अधिक रहती है। इसीलिए ताजा बदलाव में महाकोशल का अध्यक्ष तो मालवा, निमाड़, विंध्य और चंबल के कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए।

गुटीय संतुलन के मद्देनजर जिस पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को तैयार किया जाए, उससे समग्र सफलता की उम्मीद करना स्वप्नदृष्टा के लिए तो ठीक है, लेकिन मैदानी महारथी इस बात को हजम नहीं कर सकता। कांग्रेस के साथ एक और सबसे बड़ा संकट यह है कि वह तमाम अहम फैसले भारी ऊहापोह के बाद ऐनवक्त पर लेती है। एक मशहूर कहावत है- 'शेर यदि शिकार के वक्त बाथरूम के लिए चला जाए तो कभी शिकार ही नहीं कर पाए।' कांग्रेस यदि केंद्र से लेकर तो देश के 21 राज्यों से हाथ धो बैठी तो मानकर चलिए कि उसकी प्रवृत्ति में शिकार के वक्त गलत फैसले लेने की आदत जवाबदार है।

मप्र की बात करें तो कमोबेश 2017 की शुरुआत से प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की कवायद चल रही है। इसी के साथ चलती रहीं तरह-तरह की अफवाहें। इसने जहां एक ओर कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर बनाए रखा, वहीं जनमानस के बीच भी एक दुविधाग्रस्त पार्टी की छवि मजबूत बनती रही। मतदाता ऐसा क्यों नहीं सोचे कि जो पार्टी चुनावी राज्य में अपना अध्यक्ष मतदान के ऐन 6 महीने पहले बदलती है, वह जनहित के फैसले समय पर कैसे ले पाएगी? यह समझ से बाहर है कि जिन कमलनाथ का नाम प्रदेशाध्यक्ष के लिए 2 साल से चल रहा है, जिन ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार प्रमुख बनाने की अटकलें साथ में ही तैरती रही हों, उन्हें तभी घोषित कर देने से कांग्रेस का क्या बिगड़ जाता?

यदि कहीं कुछ नाराजी पनपती भी तो समय रहते वह दूर भी तो की जा सकती थी? जबकि इसका निश्चित फायदा यह तो होता ही कि ये दोनों निचले स्तर तक के कार्यकर्ता तक आसानी से पहुंच पाते, सभी 230 विधानसभा घूम चुके होते और चुनाव के मद्देनजर रणनीति बना चुके होते, सेना की अग्रिम पंक्ति से लेकर तो अंतिम पंक्ति तक की व्यूह रचना बना चुके होते। कांग्रेस का हाल के वर्षों में यह इतिहास रहा है कि वह प्रदेश अध्यक्ष बदलने, केंद्रीय स्तर पर संगठन में फेरबदल करने, विधानसभा-लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन करने में हमेशा देर लगाती है जबकि बार-बार हार रही पार्टी के पास तो पर्याप्त समय होता है कि वह कम से कम कुछ निश्चित सीटों पर अपने प्रत्याशी न्यूनतम 1 साल पहले ही घोषित कर सकती है।

उन सीटों पर तो घोषणा की ही जा सकती है, जहां उसके प्रत्याशी निर्वाचित हैं जबकि उनमें वह कोई बड़ा बदलाव आमतौर पर कभी नहीं कर पाई। तब असमंजस के बीच उसके अपने निर्वाचित विधायक, सांसद भी रहते हैं तो टिकट की चाहत में पंक्तिबद्ध खड़े कांग्रेसजन के मन कितने विचलित होते होंगे, समझा जा सकता है। अभी कांग्रेस का आलाकमान और प्रदेश के नेता-कार्यकर्ता इस अतिरेकभरे उत्साह में होंगे कि अब तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आई ही आई। वे यह तक सोचने को तैयार नहीं कि क्या 6 माह के मुट्ठीभर समय में कमलनाथ व ज्योतिरादित्य सिंधिया का 230 विधानसभा सीटों पर जाना हो भी पाएगा? वे बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं से संवाद कर पाएंगे? वे भाजपा सरकार के खिलाफ ठोस मुद्दे लेकर जनता के बीच जा पाएंगे? हां, वे हवाबाजी कर सकते हैं जिसके भरपूर अवसर उनके पास हैं।

कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा 15 साल से राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी है। इस नाते उसके पास कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है। जनता को सरकारी खजाने से सुविधाएं दे-देकर अपने प्रति सहानुभूति रखने में सक्षम है। संसाधनों की भरपूर उपलब्धता है। केंद्र में भी उसकी पार्टी की सरकार होने से योजनाओं के लिए पर्याप्त धन जुटाने में वह सक्षम है। जनता को सब्जबाग दिखाना आसान है। इसका यह मतलब भी नहीं कि कांग्रेस के लिए मप्र में शून्य अवसर हैं। दरअसल, राजनीति का कोई स्थायी चरित्र नहीं होता। वैसे भी परिवर्तन हमेशा संभावित रहता है। जरूरत होती है कुछ मुद्दों की, कुछ कुशल नेतृत्व की, कुछ गरम लोहे पर भरपूर शक्तिशाली चोट करने की और कुछ हिकमत की।

कमलनाथ के लिए इसमें से कुछ भी करना आसान नहीं। वे लाख देश की राजनीति में प्रमुख हैसियत रखते हों, लाख वे 15 साल केंद्रीय मंत्री रहे हों, भले ही वे कार्यकर्ताओं को समेटना, उपकृत करना जानते हों, मुख्य सवाल यह है कि वे 6 महीने में ऐसा क्या-क्या कर पाएंगे, जो चुनाव की राजनीति में बाजी पलटने में कारगर हो? जिस तरह से चुनावी बेला में प्रदेश अध्यक्ष को हटाकर 6 लोगों की नियुक्तियां की गईं, उससे ही यह संदेश तो साफ चला गया कि गुटीय संतुलन की राजनीति ही कांग्रेस की धुरी बन चुकी है। जबकि भाजपा नेतृत्व बार-बार कहता रहा है कि अगले विधानसभा चुनाव शिवराजसिंह चौहान के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। किसी एक व्यक्ति के लिए प्रदेश की जिम्मेदारी लेना न तो आसान रहा, न कांग्रेस इस जोखिम को उठाने को तैयार है। इस समय सभी कांग्रेस नेताओं के एक समान बयान आ रहे हैं कि हमें अपने मतभेद भुलाकर चुनाव लड़ना है। मतलब, चुनाव बाद फिर से दो-दो हाथ कर लेंगे, लेकिन अभी तो एकता दिखाई जाए।

एकता का यह दिखावा न तो भाजपा की जड़ें हिला सकता है, न आम मतदाता के मन को तसल्ली दे सकता है। 15 बरस तक राज करने के बाद किसी भी पार्टी से जनता की स्वाभाविक नाराजी हो जाती है। उसे भुनाया जा सकता है, बशर्ते जनता को यह भरोसा हो कि वह सही विकल्प है। अभी तो बारह भाई की खेती बनी कांग्रेस ही आश्वस्त नहीं है कि उसका एक कोई सिपहसालार भरोसेमंद है या युद्ध जीतने के लायक है? जब मुकाबले में उतरा एक प्रतिद्वंद्वी ही अपने बल के प्रति संदेहास्पद है, उसका कोच खुद अकेले के बूते किसी पदक की आशा नहीं कर रहा तो हमें यह मान लेने का कारण नहीं कि चौथी बार भाजपा को आने से रोकने में कमलनाथ एंड कंपनी कामयाब हो पाएगी।

किसी भी जंग में फैसले तो गलत-सही होते ही हैं, लेकिन महत्वपूर्ण यह होता है कि तत्काल कौनसा फैसला लिया जाए और दीर्घ तौर पर फलीभूत होने वाली रणनीति कब बनाई जाए? जो राजा दुश्मन की सेना अपने राज्य की सीमा पर आने के बाद अपने सैनिकों को लामबंद करता है, वह आधी लड़ाई तो वैसी ही हार जाता है!

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