कब सीखेंगे हम आपदा प्रबंधन की तकनीक

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आपदाओं को दो भागों में विभाजित किया गया है। प्राकृतिक और मानव निर्मित। प्राकृतिक विपदाओं में भूकंप, समुद्री तूफ़ान, सूनामी, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी जैसी आपदाएं हैं, वहीं मानव निर्मित आपदाओं में हवाई, रेल या रोड दुर्घटनाएं, महामारी का फैलना, औद्योगिक दुर्घटनाएं, आतंकी हमले, रेडियो या नाभकीय विकीरण जैसी आपदाएं हैं। इन सभी आपदाओं के लिए विकसित राष्ट्रों में राष्ट्रीय नीति बनाई जाती है और उसे बड़ी गंभीरता से क्रियान्वित किया जाता है।

आपदा प्रबंधन को मुख्यत: चार चरणों में बांटा जाता है। प्रथम चरण होता है आपदा की रोकथाम। इस सिलसिले में प्रयास होता है कि प्रत्याशित आपदा की पूर्व सूचना से क्षेत्र को जल्द से जल्द सचेत किया जाय जिससे जन हानि को कम से कम किया जा सके। दूसरा चरण होता है आपदाओं से निपटने की तैयारी।

इस चरण में दुर्घटना घटते ही त्वरित सूचना सभी संबंधित विभागों तक पहुंचाई जाती है, आपातकालिक स्थिति में प्रतिक्रिया का समय कम से कम हो इसलिए आपदा से निपटने के साधनों का पर्याप्त भंडारण किया जाता है। तीसरा चरण होता है प्रभावित क्षेत्र में राहत सामग्री पहुंचाना, जैसे भोजन पानी, दवाइयां, कपड़े, कम्बल इत्यादि। अंतिम चरण होता है प्रभावित क्षेत्र का पुनर्निर्माण और विस्थापितों का पुनर्वास।

यहां हम जापान की चर्चा करना चाहेंगे जो आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में संसार के सभी देशों से बहुत आगे है। जापान पृथ्वी के ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहाँ भूकंप, सूनामी, ज्वालामुखी जैसी विपदाएं आए दिन आती रहती हैं।

आपदा प्रबंधन की दिशा में इस देश ने सर्वाधिक कार्य किया है। प्रत्येक वर्ष एक सितम्बर को आपदा रोकथाम दिवस मनाया जाता है तथा तीस अगस्त से पांच सितम्बर तक पूरे देश में आपदा प्रबंधन सप्ताह मनाया जाता है जिसमे आपदा प्रबंधन मेला, संगोष्ठी, पोस्टर प्रतियोगिता आदि आयोजित किए जाते हैं ताकि आम जनता में आपदाओं से निपटने के लिए चेतना और ज्ञान का प्रसार किया जा सके। कई जापानी स्कूलों में पहले दिन ही भूकंप की स्थिति में बच्चों से भवन खाली करने की ड्रिल कराई जाती है।

जापान के प्रधानमंत्री स्वयं आपदा रोकथाम ड्रिल में शामिल होते हैं। जापान की भूकंप और सूनामी की चेतावनी देने वाली प्रणाली अत्याधुनिक है। सूनामी की गति, स्थिति, ऊंचाई आदि जानकारी कुछ ही क्षणों में रहवासियों को उपलब्ध करा दी जाती है ताकि सूनामी तट पर पहुंचने से पहले ही सारे रहवासी सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकें।

जापान के कई तटों पर सूनामी रोधी भवन बनाए गए हैं ताकि लोग आपात स्थिति में उन भवनों में शरण ले सकें। भूकंप रोधी भवन बनाने का विज्ञान भी जापान में सबसे ज्यादा विकसित है। जापान की आपदा प्रबंधन प्रणाली बहुत ही सुपरिभाषित है। इस प्रणाली में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सरकारों की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां पूरी बारीकियों के साथ वर्णित हैं।

आपदा के वक्त सरकारी हों या निजी सारे संगठन साथ जुट जाते हैं और इसे नेतृत्व मिलता है स्वयं प्रधानमंत्री कार्यालय से क्योंकि आपदा प्रबंधन का मुखिया प्रधानमंत्री होता है। बड़े समन्वय और तालमेल के साथ आपदा से निपटा जाता है। हर आपदा के बाद नीतियों की फिर से समीक्षा कर संशोधित किया जाता है और उनकी खामियों को दूर किया जाता है।

इस सब विवरण से आप हम सभी निश्चय ही सहमत होंगें कि भारत को आवश्कता है कि जापान के अनुभवों और नीतियों से अपनी नीतियों का निर्धारण करे।

हवाई सर्वेक्षण का फैशन मेरे अनुमान से केवल भारत में ही है अन्यथा कई देशों में विपदाओं के समय मंत्री हो या संत्री सारे राहत कार्यों में जुट जाते हैं। हमारा सरकारी तंत्र चैन की नींद में था जब उत्तराखण्ड में देश के नागरिक सैलाब में बह रहे थे। इसी तंत्र की मुस्तैदी भी हमने देखी है जब सरकार गिरने वाली हो तो यह तंत्र चौवीसों घंटे अनथक अपने मालिकों की सेवा में लगा रहता है।

काश कि ऐसी सेवा समय रहते हमारे साथी नागरिकों को मिल जाती। आज हमारे पास संचार साधनों का इतना बड़ा नेटवर्क है और लगभग हर नागरिक के पास मोबाइल की सुविधा उपलब्ध है। आपदा विभाग को केवल समय रहते उस क्षेत्र के मोबाइल उपभोक्ताओं को सन्देश भेजने हैं, आने वाली सूनामी, बाढ़ या तूफ़ान के बारे में और सलाह देनी है सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने के लिए। तब हम बड़ी जनहानि से बच सकते हैं। जापान ने आपदा दर आपदा अपने प्रबंधन को सुदृढ़ किया है।

शरद सिंगी|
'आपदा प्रबंधन' आकस्मिक विपदाओं से निपटने के लिए संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग और इन विपदाओं से होने वाली हानि को न्यूनतम रखने की कुंजी है। विकसित देशों की महत्वपूर्ण प्राथमिकता है और उसे पूरे वैज्ञानिक तरीके से उन्नत किया जा रहा है। किसी राष्ट्र को केवल उसकी आर्थिक समृद्धि या सामरिक शक्ति के आधार पर विकसित या विकासशील नहीं माना जा सकताविकसित या विकासशील राष्ट्र होने के लिए जरुरी है आधारभूत सेवाओं जैसे स्वास्थ्य, परिवहन, संचार, शिक्षा आदि का भी विश्वस्तरीय होना। ये मानक हैं विकास के और इन्हीं मानकों में से एक है 'आपदा प्रबंधन'।
क्या भारत भी उत्तराखंड की आपदा से सबक लेगा या फिर भारत की जनता के भाग्य में कुछ और आपदाएं लिखी हैं और तब जाकर हमारा तंत्र शीत निंद्रा से बाहर आएगा। भारत में न तो धन की कमी है, न साधनों की, न संस्थाओं की और न ही हाथ बढ़ाने वाले नागरिकों की। कमी है केवल इच्छा शक्ति की और संवेदनशील नेतृत्व की। कुछ न कर पाने की निराशा में प्राकृतिक आपदाओं में भी हम स्वयं की करनियों को दोषी ठहरा लेते हैं। इस चक्र को रुकना होगा।


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