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एक जरूरी कोना-किताबी कोना

इस बार ब्लॉग चर्चा में हिन्दी किताबों का ब्लॉग

रवींद्र व्यास|
किसी किताब को देखने-पढ़ने और सुनने का यह बिलकुल अलग ढंग है। उदाहरण के लिए धीरेंद्र अस्थाना के उपन्यास देशनिकाल पर चंद्रभूषण की टिप्पणी पर गौर किया जा सकता है। वे लिखते हैं कि फिल्मी दुनिया इस किताब में महज एक पृष्ठभूमि की तरह मौजूद है, ठीक वैसे ही जैसमुंबई शहर की जीवंतता। लेकिन पैसे और महत्वाकांक्षा का एक महाभँवर जब आपको खींच रहहोता है, तब भी दुनिया की और किसी भी जगह की तरह आप अपना स्वतंत्र अस्तित्व कैसबनाए रख सकते हैं, इस नोडल प्वाइंट की खोजबीन इसे फिल्मी दुनिया के शरीर के बजाय इसकी आत्मा के ज्यादा करीब ला देती है

इस पर आए प्रमोद सिंह के एक कमेंट पर चंद्रभूषण कहते हैं कि यह ब्लॉग बिलकुल ठहर-सा गया लगता है। इसका कुछ गतिरोध भंग होना चाहिए। आप यहाँ एक और व्याख्यात्मक पोस्ट डालिए और फिर कम से कम एक किताब पर लिखकर लोगों को कुछ लिखने के लिए उकसाइए। कहने की जरूरत नहीं कि किताबों पर बात करने के साथ ही यहाँ उलाहना-उकसाना भी है।

मैथिली गुप्त ने मेरे साक्षात्कार (भीष्म साहनी) किताब पर एक परिचयात्मक टिप्पणी है तो चंद्रभूषण ने कवि गिरधर राठी की एक पुरानी किताब को चीन में हो रहे ओलिंपिक का संदर्भ देते हुए बात की है कि इस किताब का सबसे गहरा पहलू है चीन में कविता, कला-संस्कृति की स्थिति के बारे में की गई पड़ताल, जिसके जरिए बाकायदा एक तरह का चीन-मंथन सामने आता है लेकिन इस ब्लॉग की इरफान की एक पोस्ट एक दुर्लभ किताब है। यह किताब है फिल्मी सितारे।

इसका जिक्र किया है कि यह 1957 में छपी थी और इसकी कीमत थी दो रुपए पचास पैसे। इसके कवर से लेकर इसमें दिए गए फोटो और सितारों के रेखाचित्रों पर जानकारी है। इसमें तेईस सितारों के रेखाचित्र हैं

ये तेईस सितारे हैं- अशोक कुमार, उषा किरण, कामिनी कौशल, गीता बाली, जयराज, डेविड, दिलीप कुमार, दुर्गा खोटे, देव आनंद, नरगिस, नलिनी जयवंत, निम्मी, निरुपा राय, नूतन, बलराज साहनी, मधुबाला, बीना राय, मनहर देसाई, मीना कुमारी, मोतीलाल, राजकपूर, वैजयंती माला और सुरैया। इसी पोस्ट में इस किताब से दिलीप कुमार का क्रिकेट खेलते हुए एक दिलचस्प फोटो है। इसमें दिलीप कुमार सेट पर ब्रेक के बीच गोल दामन की कमीज़ और पैजामा पहने हुए बल्लेबाज़ी कर रहे हैं और मुकरी विकेटकीपरी कर रहे हैं।

प्रत्यक्षा ने बचपन में पढ़ी रूसी किताबों को याद करते हुए बॉबी मोरिस के साथ जहान की सैर अच्छी पोस्ट लिखी है। वे लिखती हैं किताब इतनी रोचक थी कि हम उसे कई बार पढ़ गए थे। शैली मज़ेदार थी और कहानी में बच्चों और कुत्तों की मानसिकता का इतना प्यारा वर्णन था कि कई बार बड़ी तीव्र इच्छा होती कि काश उन बच्चों सी हमारी जिंदगी होती।
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