क्या कलंक से मल्टीस्टारर फिल्मों के दौर की वापसी होगी?

की गिनती इस समय सबसे बड़े बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं में होती है। लगातार उनकी बड़ी फिल्में रिलीज हो रही हैं। मार्च में 'केसरी' का प्रदर्शन हुआ। अप्रैल में 'कलंक' रिलीज हो रही है और मई में 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' का प्रदर्शन होगा।

फिल्म बनाने का आइडिया करण जौहर के पिता यश जौहर को आया था। यश जौहर की गिनती बॉलीवुड के भले लोगों में होती थी। यश ने अपने लंबे करियर में कई फिल्में बनाईं, लेकिन उन्हें करण जैसी सफलता नहीं मिली।

करण जौहर वर्षों पूर्व यह फिल्म शाहरुख खान, अजय देवगन, काजोल और रानी मुखर्जी के साथ बनाने वाले थे। अपने पिता की मृत्यु ने करण को हिला दिया और कलंक बनाने की योजना खटाई में पड़ गई।

करण अपने पिता को बेहद प्यार करते हैं। उनके द्वारा निर्मित हर फिल्म में यश जौहर के फोटो के साथ 'वी मिस यू' लिखा होता है। करण ने अपने पिता द्वारा निर्मित असफल फिल्म 'अग्निपथ' का रिमेक रितिक रोशन को लेकर बनाया था।

अमिताभ बच्चन के साथ यश जौहर ने 'अग्निपथ' बनाई थी जो उस समय फ्लॉप हो गई थी। बाद में टीवी पर इसे काफी पसंद किया गया। अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार को अलग किस्म की आवाज दी थी और उनके अधिकांश संवाद दर्शकों को समझ में ही नहीं आए थे। बाद में अमिताभ ने अपने चिर-परिचित अंदाज में संवाद डब किए, लेकिन तब तक देर हो गई थी।
करण द्वारा अग्निपथ का रीमेक सफल रहा और करण ने यह साबित किया कि उनके पिता कहीं गलत नहीं थे। अब उन्होंने कलंक भी अपने पिता की खातिर ही बनाई है।

इस फिल्म के लिए संजय दत्त और माधुरी दीक्षित साथ में काम करने के लिए राजी हुए हैं। वर्षों पहले दोनों ने साथ में काफी फिल्में की थीं। दोनों की नजदीकियों के चर्चे ही हुए थे कि संजय दत्त अवैध हथियार रखने के मामले में फंस गए और माधुरी ने उनसे दूरी बना ली।
माधुरी के इस निर्णय के प्रति संजय के मन में कोई कड़वाहट नहीं है। उन्होंने अपने जीवन पर आधारित फिल्म 'संजू' में भी माधुरी वाले प्रसंग को नहीं दिखाने का अनुरोध फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी से किया था।

कलंक में दोनों का साथ काम करना यह दर्शाता है कि अब वे पुरानी बातें भूल चुके हैं। अपनी-अपनी जिंदगी में सैटल हो चुके हैं और अब साथ में फिल्म कर सकते हैं।

वरुण धवन, आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा और आदित्य रॉय कपूर जैसे सितारे भी इस फिल्म में हैं और इनकी मौजूदगी 'कलंक' को बनाती है।

सत्तर और अस्सी के दशक में मल्टीस्टारर फिल्मों का दौर था। तब कई नामी सितारे साथ में काम करते थे। शोले, शान, मुकद्दर का सिकंदर, नसीब, नागिन जैसी कई फिल्मों मल्टीस्टारर थी और बॉक्स ऑफिस पर सफल रही थी।

अमिताभ-धर्मेन्द्र, अमिताभ-विनोद खन्ना, धर्मेन्द्र-जीतेन्द्र जैसे स्टार्स को साथ में काम करने में कोई समस्या नहीं हुई और उनका ईगो भी हर्ट नहीं हुआ। आज शाहरुख-आमिर को लेकर कोई फिल्म नहीं बना सकता।

यही फॉर्मूला राजनीति में भी है। जब एक पार्टी के तूफान को रोकने में दूसरी पार्टी के नेता अपने आपको अक्षम पाते हैं तो वे हाथ मिला लेते हैं। अपनी अलग राजनीतिक विचारधारा को भी वे अलग रख देते हैं और राजनीति की 'बहुसितारा फिल्म' 'गठबंधन' कहलाती है।

मल्टीस्टारर फिल्म में दर्शकों को इस बात की तसल्ली मिलती है कि उसे एक ही टिकट में कई सितारों को एक साथ देखने का मौका मिल गया। शायद 'कलंक' का निर्माण करण ने बहुसितारा फिल्मों के दौर को लौटाने के लिए भी किया हो।


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