कार्बोहाइड्रेट वाला खाना खाने से लंबी हो सकती है उम्र?

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पुनः संशोधित गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019 (11:22 IST)
हर दम जवां रहने का राज़ इंसान सदियों से तलाश रहा है। हर देश और हर सभ्यता के लोग चिर युवा रहने वाली ख़ुराक को खोजते रहे हैं। हाल के दिनों में ये तलाश, के ओकिनावा सूबे पर केंद्रित हो गई है।

पूर्वी चीन सागर में फैला जापान का ओकिनावा परफेक्चर या सूबा कई द्वीपों से मिलकर बना है। यहां पर सबसे ज़्यादा बुज़ुर्ग रहते हैं। हमारे कहने का मतलब है कि यहां की आबादी में बुज़ुर्गं का अनुपात बाक़ी दुनिया से ज़्यादा है। साथ ही ओकिनावा के लोगों के बीच सौ साल से ज़्यादा की उम्र पाने वालों की तादाद भी दुनिया के बाक़ी हिस्सों से ज़्यादा है।


मज़े की बात ये है कि उम्र के आख़िरी पड़ाव पर भी ओकिनावा के बुज़ुर्ग काफ़ी सक्रिय रहते हैं। उनकी सेहत ठीक रहती है। वो दूसरों पर आश्रित नहीं होते। ओकिनावा में हर एक लाख आबादी पर 68 लोग शतजीवी होते हैं। यानी सौ साल से ज़्यादा जीते हैं। अमेरिका के मुक़ाबले ये अनुपात तीन गुना है। जापान में यूं तो औसत आयु ज़्यादा है, फिर भी 100 साल से ज़्यादा जीने में ओकिनावा के लोगों का औसत बाक़ी जापानियों से 40 प्रतिशत अधिक है।

क्या है राज़?
दुनिया भर के वैज्ञानिक कई दशकों से ओकिनावा के लोगों की का राज़ तलाश रहे हैं। कभी उनके जीन की पड़ताल होती है, तो कभी खान-पान की। पिछले कुछ साल में हुए रिसर्च में वैज्ञानिकों ने ओकिनावा के लोगों के खान-पान पर ध्यान केंद्रित किया है। पाया ये गया है कि ओकिनावा के लोगों के खाने में प्रोटीन के मुक़ाबले की मात्रा काफ़ी ज़्यादा होती है। इसमें भी वो लोग शकरकंद को कुछ ज़्यादा ही खाते हैं। ओकिनावा के लोगों को ज़्यादातर कैलोरी शकरकंद से मिलती है।

सिडनी यूनिवर्सिटी की सामंथा सोलोन-बिएट पोषण और उम्र बढ़ने के असर पर रिसर्च करती हैं। वो कहती हैं, "ओकिनावा के लोगों का खाना हाल के दौर के ज़्यादा प्रोटीन और कम कार्बोहाइड्रेट वाले खान-पान के ठीक उलट है।"


यूँ तो एटकिंस और पैलियो डाइट दुनिया भर में चर्चित हो रही है। फिर भी इस बात के पक्के सबूत नहीं जुटाए जा सके हैं कि ज़्यादा प्रोटीन वाला खाना लंबे समय तक खाते रहने से कोई ख़ास फ़ायदा होता है। तो क्या, ओकिनावा के लोगों का कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का 10:1 का अनुपात ही लंबी उम्र का राज़ है?

हालांकि ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि आप लंबी उम्र जीना चाहते हैं तो प्रोटीन छोड़कर ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट खाना शुरू कर दीजिए। लेकिन, अब तक हुई रिसर्च ये ज़रूर कहती हैं कि हमें इस ख़याल पर संजीदगी से सोचना चाहिए।


कार्ब से क्या फ़ायदा होता है
रिसर्च से पता चला है कि ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खाना खाने से हमारे शरीर में ऐसी कई प्रतिक्रियाएं होती हैं, जो उम्र बढ़ने की रफ़्तार धीमी करती हैं। साथ ही, ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट वाली ख़ुराक हमें बढ़ती उम्र के साथ होने वाली बीमारियां जैसे कैंसर, अल्ज़ाइमर या दिल की बीमारियों से भी बचाती है।

इस रिसर्च का बड़ा हिस्सा ओकिनावा सेंटेनैरियन स्टडी से आया है। इसके तहत 1975 से ओकिनावा के लोगों की उम्र और उनके खान-पान समेत तमाम पहलुओं पर तजुर्बे हो रहे हैं। ओकिनावा के 150 द्वीपों में रहने वाले 100 साल से ज़्यादा उम्र के लोग इस रिसर्च में शामिल किए गए हैं। अब तक इसके तहत 1000 लोगों की जीवनशैली की पड़ताल की जा चुकी है।


ओकिनावा में लोग लंबी उम्र तक जीते हैं। लेकिन, वो बुढ़ापे में अशक्त और दूसरे पर आश्रित नहीं होते। यहां के बुज़ुर्ग अपने जीवन के आख़िरी दौर तक सक्रिय रहते हैं। ओकिनावा के बुज़ुर्ग औसतन 97 साल की उम्र तक अपना सारा काम ख़ुद करते हैं। उम्र के साथ आने वाली कई बीमारियां यहां के बुज़ुर्गों पर असर नहीं करती हैं। कैंसर, डायबिटीज़, डिमेंशिया और दिल की बीमारियां यहां के लोगों को कम होती हैं।

जेनेटिक जैकपॉट
इस रिसर्च से स्पष्ट है कि ओकिनावा की आबादी ख़ास है। पर, सवाल वही है कि यहां के लोगों की लंबी उम्र का राज़ क्या है?


कुछ वैज्ञानिक इसके लिए ओकिनावा के लोगों के जीन्स को ज़िम्मेदार मानते हैं। ओकिनावा के लोग लंबे समय तक बाक़ी दुनिया से अलग-थलग रहे हैं। इससे उनका जेनेटिक प्रोफाइल अलग है। ओकिनावा के लोगों में एपीओई4 नाम के एक जीन को बेहद कम पाया गया है। ये जीन दिल की बीमारियों के लिए ज़िम्मेदार होता है। इससे अल्ज़ाइमर भी होता है।

ओकिनावा के लोगों में एफओएक्सओ3 नाम का एक जीन अक्सर पाया जाता है, जो हमारी पाचन क्षमता को बेहतर तरीक़े से नियमित करता है। ये शरीर में कोशिकाओं के विकास पर भी कंट्रोल रखता है। माना जाता है कि इसी जीन की वजह से बढ़ती उम्र का असर कम होता है और कैंसर जैसी बीमारियां नहीं होती हैं।


हालांकि, ओकिनावा के लोगों की लंबी उम्र का राज़ सिर्फ़ जीन में छुपा हो ऐसा नहीं माना जाता। यहां के लोग धूम्रपान कम करते हैं। ज़्यादातर लोग खेती या मछली मारने का काम करते हैं। इससे उनकी अच्छी ख़ासी कसरत हो जाती है।

ओकिनावा का समाज ऐसा है कि लोग एक-दूसरे से क़रीब से जुड़े हुए हैं। इसीलिए उम्र के आख़िरी दौर तक बुज़ुर्ग, बाक़ी दुनिया से अलग-थलग नहीं पड़ते। उन्हें तनाव कम होता है। अकेलेपन का शिकार नहीं होना पड़ता। अकेलेपन से एक दिन में 15 सिगरेट पीने के बराबर नुक़सान होता है। पर, माना ये जाता है कि ओकिनावा के लोगों के खान-पान में ही उनकी लंबी उम्र का राज़ छुपा है।


एशिया के बाक़ी बाशिंदों के बरक्स ओकिनावा के लोगों का मुख्य चावल नहीं है। वो शकरकंद ज़्यादा खाते हैं। शकरकंद यहां 17वीं सदी में नीदरलैंड से समुद्री कारोबार के ज़रिए पहुचा था। इसके अलावा ओकिनावा के लोग हरी-पीली सब्ज़ियां और सोया उत्पाद भी ख़ूब खाते हैं। ओकिनावा के लोग सुअर का मांस, मछली और दूसरे तरह के मांस भी खाते हैं। लेकिन, इनकी मात्रा पूरे खाने में बहुत ही कम होती है।

कुल मिलाकर, ओकिनावा का परंपरागत भोजन हरी सब्ज़ियों से भरपूर होता है। इसमें सभी ज़रूरी विटामिन और खनिज होते हैं। लेकिन, इसमें कैलोरी कम होती है। फास्ट फूड के ओकिनावा आने से पहले ओकिनावा के लोग औसतन 11 फ़ीसद कम कैलोरी खाते थे।


क्या कहता है शोध
वैज्ञानिक मानते हैं कि इसी कम कैलोरी वाली डाइट में ओकिनावा के लोगों की लंबी उम्र का राज़ छुपा है। 1930 के दशक से ही बहुत से डॉक्टर और वैज्ञानिक ये सलाह देते आ रहे हैं कि आप जितनी कम कैलोरी खाएंगे, उतना ही वज़न कम करने की आप की कोशिश रंग लाएगी। इससे आप पर उम्र का असर भी कम होगा।

इस तर्क को सही साबित करने का सबसे गंभीर तजुर्बा मकाक बंदरों पर हुआ। जिन्हें औसत बंदरों से 30 प्रतिशत कम कैलोरी वाला खाना दिया गया। इससे उन बंदरों के मरने की तादाद में 63 प्रतिशत तक कमी देखी गई। बंदरों पर ये रिसर्च 20 साल तक की गई थी। कम कैलोरी खाने वाले बंदर लंबे वक़्त तक युवा भी दिखते रहे थे। झुर्रियां भी कम थीं और उनके बाल भी युवावस्था जैसे ज़्यादा चमकीले रहे।


इंसानों पर तो ऐसा रिसर्च, व्यवहारिक दिक़्क़तों के चलते नहीं हो सका है। लेकिन, अमरीका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एजिंग ने हाल ही में दो साल तक एक रिसर्च की थी। कम कैलोरी वाला खाना खाने वालों की सेहत की पड़ताल से पता चला कि उन्हें दिल की बीमारियां होने का ख़तरा कम हुआ था। उनका ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल कम ही रहा था।

कम कैलोरी वाली डाइट इतनी फ़ायदेमंद क्यों है, इसकी ठोस वजह अभी नहीं पता। एक संभावना ये है कि इससे हमारे शरीर की कोशिकाओं को अलग तरह का संकेत मिलता है। हमारा शरीर नई कोशिकाओं के विकास के बजाय मौजूदा कोशिकाओं के संरक्षण और उनकी मरम्मत पर ज़्यादा ध्यान देता है। इसके अलावा कम कैलोरी लेने से कोशिकाओं में ज़हरीले तत्व कम जमा होते हैं।


सामंथा सोलोन-बिएट ने जानवरों पर हुई रिसर्च में पाया है कि कम प्रोटीन और ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खान-पान लेने वाले तमाम जीवों का दिमाग़ ज़्यादा दिनों में उम्रदराज हुआ। इन जानवरों को 10:1 के कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन के अनुपात में ही खाना दिया गया था। यही अनुपात ओकिनावा के लोगों के खाने का होता है।

कम प्रोटीन से होता है फ़ायदा
सामंथा कहती हैं कि ओकिनावा के लोगों की ही तरह लंबी उम्र जीने वाले इंसानों के दूसरे समूहों का खान-पान भी ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला होता है। वो पापुआ न्यू गिनी के कितावा समुदाय और दक्षिण अमरिका के त्सीमाने क़बीले के लोगों की मिसाल देती हैं। ये सभी कम प्रोटीन और ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खाना खाते हैं।


कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की पोषण वैज्ञानिक कैरेन रेयान कहती हैं कि जब लोग कम प्रोटीन वाला खाना खाते हैं, तो कोशिकाओं को कम अमीनो एसिड मिलता है। इससे वो पुराने प्रोटीन को ही प्रॉसेस करने लगती हैं।

कैरेन कहती हैं, "इन बदलावों का असर उम्र बढ़ने पर पड़ता है। उम्र बढ़ने के पीछे वजह कोशिकाओं में प्रोटीन का जमा होना है। ख़राब प्रोटीन का ये जमावड़ा कई बीमारियों को दावत देता है। लेकिन, जब हम कम प्रोटीन लेते हैं, तो इस जमा प्रोटीन की सफ़ाई हो जाती है। इससे उम्र बढ़ने का असर कम होता है।"


तो, क्या हम सब को ओकिनावा डाइट लेनी शुरू कर देनी चाहिए?

अभी वैज्ञानिक इसकी सलाह नहीं देते। कैरेन कहती हैं कि प्रोटीन कम खाने से शरीर को नुक़सान कम होता है। लेकिन, 65 साल की उम्र के बाद हमें ज़्यादा प्रोटीन लेना शुरू करना चाहिए। साथ ही अगर हम पौधों से मिलने वाला प्रोटीन लेते हैं, तो वो हमारे खाने को और भी पोषक बनाता है। डेयरी उत्पादों और मांस से मिलने वाले प्रोटीन के बनिस्बत वेजीटेरियन प्रोटीन ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है।

ओकिनावा के लोग शायद इसीलिए लंबी उम्र जीते हैं, क्योंकि वो फल और सब्ज़ियां ज़्यादा खाते हैं। कैरेन मानती हैं कि ओकिनावा के लोगों की लंबी उम्र के राज़ की कई वजहें हो सकती हैं। इनमें उनकी जैविक बनावट के साथ खान-पान का भी योगदान है। अभी इस पर और रिसर्च किए जाने की ज़रूरत है, ताकि हम चिरयुवा रहने का असली नुस्खा हासिल कर सकें।


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