अकेलापन बहुत ख़तरनाक है या बेहद फ़ायदेमंद

पुनः संशोधित सोमवार, 16 अप्रैल 2018 (11:27 IST)
क्रिस्टीन रो (बीबीसी फ़्यूचर)

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सोशल एनिमल है। यानी वो अकेले ज़िंदगी बसर नहीं कर सकता। लोगों से घुलना-मिलना, उनके साथ वक़्त बिताना, पार्टी करना और मिल-जुलकर जश्न मनाना हमारी फ़ितरत भी है और ज़रूरत भी।
इसके विपरीत, अगर कोई अकेला रहता है, लोगों से मिलता-जुलता नहीं, उसके साथ वक़्त बिताने वाले लोग नहीं हैं, तो इसे एक बड़ी परेशानी समझा जाता है।

यही वजह है कि अकेलेपन को सज़ा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। लोगों को जेलों में अकेले क़ैद करके रखा जाता है। दिमाग़ी तौर पर बीमार लोगों को ज़ंजीरों से बांधकर अकेले रखा जाता है।

इस क़दर ख़तरनाक है कि आज तमाम देशों में अकेलेपन को बीमारी का दर्जा दिया जा रहा है। अकेलेपन से निपटने के लिए लोगों को मनोवैज्ञानिक मदद मुहैया कराई जा रही है।
तो, क्या वाक़ई अकेलापन बहुत ख़तरनाक है और इससे हर क़ीमत पर बचना चाहिए?

बहुत से लोग इसका जवाब ना में देना पसंद करते हैं। उन्हें पार्टियों में, किसी महफ़िल में या जश्न में शरीक़ होना हो, तो वो कतराने लगते हैं। महफ़िलों में जाना नहीं चाहते। लोगों से मिलने-जुलने से बचते हैं।

अकेले रहने से क्या हासिल?
ऐसे बहुत से लोग हैं जो आज अकेले रहने की वक़ालत करते हैं।
अमेरिकी लेखिका एनेली रुफ़स ने तो बाक़ायदा 'पार्टी ऑफ़ वन: द लोनर्स मैनीफेस्टो' के नाम से क़िताब लिख डाली है। वो कहती हैं कि अकेले रहने के बहुत से मज़े हैं। आप ख़ुद पर फ़ोकस कर पाते हैं। अपनी क्रिएटिविटी को बढ़ा पाते हैं। लोगों से मिलकर फ़िज़ूल बातें करने या झूठे हंसी-मज़ाक़ में शामिल होने से बेहतर अकेले वक़्त बिताना।

वहीं ब्रिटिश रॉयल कॉलेज ऑफ़ जनरल प्रैक्टिशनर्स कहता है कि अकेलापन डायबिटीज़ जैसी भयानक बीमारी है। इससे भी उतने ही लोगों की मौत होती है, जितनी डायबिटीज़ की वजह से। अकेलापन हमारे सोचने-समझने की ताक़त को कमज़ोर करता है। अकेला रहना हमारी अक़्लमंदी पर बुरा असर डालता है। बीमारियों से लड़ने की हमारी क्षमता कम होती है।
अकेले रहने से बढ़ती है क्रिएटिविटी
तन्हा रहना, पार्टियों से दूरी बनाना और मित्रों से मिलने में आना-कानी करना अगर ख़ुद का फ़ैसला है, तो ये काफ़ी फ़ायदेमंद हो सकता है।

अमेरिका की सैन जोस यूनिवर्सिटी के ग्रेगरी फीस्ट ने इस बारे में रिसर्च की है। फीस्ट इस नतीजे पर पहुंचे कि ख़ुद के साथ वक़्त बिताने से आपकी क्रिएटिविटी को काफ़ी बूस्ट मिलता है। इससे आपकी ख़ुद-ऐतमादी यानी आत्मविश्वास बढ़ता है। आज़ाद सोच पैदा होती है। नए ख़यालात का आप खुलकर स्वागत करते हैं।
जब आप कुछ वक़्त अकेले बिताते हैं तो आपका ज़हन सुकून के पलों का बख़ूबी इस्तेमाल करता है। शोर-शराबे से दूर तन्हा बैठे हुए आपका ज़हन आपकी सोचने-समझने की ताक़त को मज़बूत करता है। आप पुरानी बातों के बारे में सोचकर अपनी याददाश्त मज़बूत करते हैं।

अकेले क्यों रहना चाहते हैं लोग?
अमेरिका की ही बफ़ैलो यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक जूली बोकर के रिसर्च से फ़ीस्ट के दावे को मज़बूती मिली है। जूली कहती हैं कि इंसान तीन वजहों से लोगों से घुलने-मिलने से बचते हैं। कुछ लोग शर्मीले होते हैं। इसलिए दूसरों से मिलने-जुलने से बचते हैं। वहीं कुछ लोगों को महफ़िलों में जाना पसंद नहीं होता। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो मिलनसार होने के बावजूद अकेले वक़्त बिताना पसंद करते हैं।
जूली और उनकी टीम ने रिसर्च में पाया कि जो लोग ख़ुद से अकेले रहना पसंद करते हैं, उनकी क्रिएटिविटी बेहतर होती जाती है। अकेले रहने पर वो अपने काम पर ज़्यादा ध्यान दे पाते हैं। अपनी बेहतरी पर फ़ोकस कर पाते हैं। नतीजा उनकी क्रिएटिविटी बढ़ जाती है।

धर्मों में अकेले तप, चिंतन-मनन की सलाह
वैसे, अकेलेपन के फ़ायदे बताने वाले ये मनोवैज्ञानिक कोई नई चीज़ नहीं बता रहे हैं। हिंदू धर्म से लेकर बौद्ध धर्म तक, बहुत से मज़हब हैं जो अकेले तप करने और चिंतन-मनन करने की सलाह देते हैं।
असल में अकेले रहने पर हमारा दिमाग़ आराम की मुद्रा में आ जाता है। वो आरामतलबी के इस दौर में याददाश्त को मज़बूत करने और जज़्बात को बेहतर समझने में जुट जाता है। वहीं आप किसी के साथ होते हैं, तो आपका ध्यान बंटता है। आपके ज़हन को सुकून नहीं मिल पाता।

ग्रेगरी फ़ीस्ट कहते हैं कि लोग अगर ख़ुद से अकेले रहना, में वक़्त बिताना पसंद करते हैं। तो ये उनके लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है। लेकिन महफ़िलों के आदी लोग अकेलेपन के शिकार हों, ये परेशानी की बात है।
अच्छा हो कि हम गिने-चुने दोस्त ही बनाएं। उनके साथ ही क्वालिटी टाइम बिताएं। बनिस्बत इसके कि हम रोज़ाना पार्टियां करें, महफ़िलें सजाएं। बीच-बीच में थोड़ा वक़्त तन्हाई में बिताएं। ख़ुद पर फ़ोकस करें। चिंतन-मनन करें। ये तालमेल बनाना हमारे लिए सबसे ज़्यादा अच्छा साबित होगा।

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