क्या कांग्रेस ने RSS और बीजेपी को दिया हिंदुओं का झंडाबरदार बनने का मौक़ा

पुनः संशोधित मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018 (11:53 IST)
- रेहान फ़ज़ल

सत्तर के दशक तक भारतीय की सबसे बड़ी शिकायत थी कि उसे भारतीय राजनीति में अछूत क्यों समझा जाता है?

साल 1967 के जनसंघ के कालीकट सम्मेलन में पार्टी के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय ने बहुत दुखी हो कर कहा था, "भारत का प्रबुद्ध वर्ग छुआछूत को बहुत बड़ा पाप मानता है, लेकिन राजनीतिक जीवन में भारतीय जनसंघ के साथ बरते जाने वाले छुआछूत को वो गर्व की बात समझता है।"


सवाल उठता है कि दशकों तक भारत के राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी के साथ राजनीतिक सहयोग करने में क्यों हिचकिचाते रहे?

भारतीय जनता पार्टी पर बहुचर्चित किताब 'द सैफ़रन टाइड- द राइज़ ऑफ़ द बीजेपी' लिखने वाले किंग्शुक नाग बताते हैं, "शायद इसकी सबसे बड़ी वजह है भारतीय जनता पार्टी का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की अवधारणा है। साल 1998 के बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र में कहा गया था कि वो एक राष्ट्र, एक लोग और एक संस्कृति के प्रति कटिबद्ध है। बहुत से लोग बीजेपी की इस विचारधारा से अपने को नहीं जोड़ पाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि बीजेपी कहीं न कहीं इस बात को रेखांकित करना चाहती है कि भारत एक संस्कृति वाला देश है।"

अस्सी के दशक में इस सोच को तब और बल मिला जब संघ परिवार की ओर से एक नारा उछाला गया, "गर्व से कहो हम हिंदू हैं।"....इस वाक्य का सबसे पहले इस्तेमाल के पहले सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने किया था। आलोचकों ने सहज ही इसकी तुलना जवाहरलाल नेहरू से की जो भारत को धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर ले जाना चाहते थे, जहाँ हर धर्म और जाति के लोगों को बराबर का अधिकार हो।

में भी हिंदू हितों की बात करने वाले कम नहीं
आज़ादी के बाद भारत का पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा मध्यप्रदेश के शहर जबलपुर में हुआ था जहाँ उस समय कांग्रेस की सरकार थी। नेहरू इससे बहुत आहत हुए थे और जब वो दंगो के बाद भोपाल गए थे तो उन्होंने अपनी ही पार्टी वालों पर तंज़ कसा था कि वो दंगों के दौरान अपने घरों में छिपे क्यों बैठे रहे?

नेहरू भले ही धर्मनिपेक्षता के बहुत बड़े पैरोकार रहे हों, लेकिन उनकी पार्टी के कई बड़े नेताओं की सहानुभूति दक्षिणपंथी तत्वों के साथ रही। जिन्ना की मुस्लिम लीग की स्वीकार्यता इसलिए बढ़ी, क्योंकि उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि कांग्रेस तो सिर्फ़ हिंदू हितों की ही बात करती है, हालांकि ये बहुत हद तक सच नहीं था।


कांग्रेस ने हिंदू प्रतीक के 'वंदे मातरम' को स्वतंत्रता सेनानियों का गीत बनाया, जिसे बंकिम चंद्र चटोपाद्याय के उपन्यास 'आनंदमठ' में हिंदू विद्रोहियों को मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ गाते हुए दिखाया गया है। महात्मा गांधी ने भी रामराज्य की बात की और उनका सर्वप्रिय गुजराती भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' था।

सरदार पटेल और संघ
नेहरू मंत्रिमंडल के कई सदस्य जैसे मेहरचंद खन्ना और कन्हैयालाल मुंशी हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास करते थे। और तो और भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी नेहरू के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य थे।


साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद किए गए एक अध्ययन में ये पाया गया कि केएम मुंशी के उपन्यासों की लोकप्रियता ने जिसका सार सोमनाथ के मंदिर पर महमूद गज़नी का हमला था, राज्य में हिंदुत्व की भावना को बढ़ावा दिया।

दक्षिणपंथ की तरफ़ झुकाव रखने वालों में 1950 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने पुरुषोत्तम दास टंडन और भारत के पहले गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल का भी नाम लिया जाता है। महात्मा गांधी की हत्या से पहले सरदार के बारे में सकारात्मक राय रखते थे।


उनकी नज़र में इस संगठन ने पाकिस्तान से आए शर्णार्थियों को नए सिरे से बसाने और उन्हें राहत सामग्री पहुंचाने में बहुत योगदान दिया था। सरदार पटेल के कहने पर ही गुरु गोलवलकर ने कश्मीर जाकर महाराजा हरि सिंह पर भारत में विलय करने के लिए ज़ोर डाला था।

उत्तर प्रदेश के पूर्व गृह सचिव रहे राजेश्वर दयाल अपनी आत्मकथा 'अ लाइफ़ ऑफ़ आवर टाइम्स' में लिखते हैं, "जब मैंने पश्चिम उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में गुरु गोलवलकर की भूमिका का सबूत पंतजी के सामने रखा तो उन्होंने न सिर्फ़ गोलवलकर को गिरफ़्तार करवाने से इनकार किया, बल्कि उन्हें इस बारे में बता भी दिया और गोलवलकर तुरंत प्रदेश से बाहर चले गए।"

साल 1962 के चीन युद्ध में संघ के कार्यकर्ताओं ने सिविल डिफ़ेंस के काम को अपने हाथों में ले लिया था, जिससे ख़ुश होकर 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में उन्हें भाग लेने का अवसर दिया गया था।


कांग्रेस का एक ज़माने में था हिंदू वोट बैंक पर एकक्षत्र राज
यहाँ पर इस सबका ज़िक्र करने का मक़सद यह है कि धर्मनिरपेक्षता का दम भरने वाली कांग्रेस पार्टी भी हिंदुत्व के बुख़ार से अछूती नहीं रही है। कुछ विश्लेषक तो यहाँ तक मानते हैं कि वो तब तक लगातार सत्ता में रही जब तक हिंदू वोट उसके साथ रहा।

जब हिंदुओं को लगा कि कांग्रेस ने हिंदू हितों पर ध्यान देना कम कर दिया है तो उन्होंने उसका साथ छोड़ दिया और उसका विकल्प तलाशने लगे। पचास के दशक से लेकर 1967 तक हिंदू वोटों पर कांग्रेस का एकक्षत्र राज रहा जिसकी वजह से उसे सत्ता हासिल करने में कोई गंभीर चुनौती नहीं मिली।

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इमर्जेंसी वरदान थी संघ के कार्यकर्ताओं के लिए
साल 1975 में जब इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी लगाई तो संघ परिवार को फूलने फलने का मौका मिल गया। इमर्जेंसी के दौरान संघ के हज़ारों कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया।

इसके बावजूद उन्होंने इंदिरा गांधी सरकार के ख़िलाफ़ अंडरग्राउंड आंदोलन चलाया। जेल में उन्हें अन्य विपक्षी नेताओं के साथ रहने का मौक़ा मिला, जिससे उनकी सोच को ख़ासा विस्तार मिला। इमर्जेंसी समाप्त होने के बाद जयप्रकाश नारायण ने ज़ोर दिया कि वो कांग्रेस के ख़िलाफ़ बनाए जा रहे चुनावी गठबंधन का हिस्सा बनें।


धर्मांतरण के कारण हुआ था विश्व हिंदू परिषद का उदय
जनता पार्टी के विघटन के बाद साल 1980 में भारतीय जनसंघ भारतीय जनता पार्टी के रूप में फिर से सामने आया। तभी उसने गांधीवादी समाजवाद को अपना मुख्य सिद्धांत बनाया।

इस पर कुछ समय के लिए संघ के प्रमुख बालासाहेब देवरस विचलित भी हुए। उन्हें लगा कि पार्टी शायद अपना हिंदुत्व का आधार छोड़ रही है। उन्होंने हिंदू विचारधारा को जीवित रखने के लिए विश्व हिंदू परिषद का सहारा लेने की रणनीति बनाई। इसका मुख्य कारण था साल 1981 में तमिलनाडु के गाँव मीनाक्षीपुरम में सैकड़ों दलितों का इस्लाम में धर्मांतरण था।


शाहबानो मामला और रामजन्मभूमि आंदोलन
इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए आम चुनाव में संघ ने भारतीय जनता पार्टी का साथ न देकर कांग्रेस का साथ दिया जिसकी वजह से कांग्रेस 400 से भी अधिक सीटें जीतने में कामयाब रही। और भारतीय जनता पार्टी को मात्र दो सीटों से संतोष करना पड़ा।

शायद यही वजह थी कि पार्टी ने हिंदू समाज को जागृत करने के लिए राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू करने का फ़ैसला लिया। शाहबानो मामले में राजीव गाँधी सरकार द्वारा लिए गए कदम ने उन्हें मतदाताओं के बीच अलोकप्रिय किया और भारतीय जनता पार्टी को अपनी जड़ें जमाने में मदद मिल गई।


सबसे बड़ी चुनौती युवाओं के समर्थन को बरकरार रखना
उस के बाद से संघ परिवार ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। नब्बे के दशक के बाद से आरएसएस की गिनती दुनिया के सबसे बड़े ग़ैरसरकारी संगठनों में होने लगी। एक अनुमान के अनुसार इस समय आरएसएस के सदस्यों की संख्या 15 से 20 लाख के बीच है।

इसकी 57,000 शाखाओं की रोज़ बैठक होती है। इसके अलावा 14000 साप्ताहिक और 7000 मासिक शाखाएं भी आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 6000 पूर्णकालिक सदस्य भी हैं।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बढ़-चढ़ कर प्रभावित लोगों की मदद की है। उत्तराखंड की विनाशकारी बाढ़ हो या केरल में आई हाल ही की भीषण बाढ़, स्वयंसेवकों ने आगे बढ़ कर मुसीबत में फंसे लोगों की मदद की है।

लेकिन आरएसएस पर किताब लिखने वाले शम्सुल इस्लाम का मानना है कि दलितों या महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर आरएसएस की चुप्पी रहस्यमयी है। इस बात के भी बहुत कम उदाहरण मिलते हैं कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में वो सिखों की मदद के लिए आगे आए हों।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बहुचर्चित किताब 'द आरएसएस अ व्यू टू द इनसाइड' लिखने वाले वॉल्टर एंडरसन बताते हैं, "युवाओं में आरएसएस की लोकप्रियता का मुख्य कारण भारतीय समाज का आधुनिकीकरण के साथ-साथ परंपरागत मूल्यों को भी उतना ही महत्व दिया जाना है। लेकिन इसके बावजूद आरएसएस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, इन युवाओं के समर्थन को बरकरार रखना।"

आरएसएस पर चर्चित किताब 'लॉस्ट इयर्स ऑफ़ आरएसएस' लिखने वाले संजीव केलकर कहते हैं, "एक आधुनिक संगठन के सीईओ की पूरी कोशिश होती है कि संगठन के अंदर इस तरह का सकारात्मक माहौल बने कि उसके सदस्यों को काम करने में मज़ा आए। लेकिन संघ की कठोर हाइरार्की और स्थिर कार्य पद्धति के कारण जल्दी ही उनका मोह भंग हो जाता है।"


सामाजिक स्वीकार्यता पर सवाल
आधुनिक युग में वही संगठन फलते फूलते हैं जहाँ ज्ञान सर्वोपरि हो और जहाँ सभी प्रासंगिक सूचनाओं के विष्लेषण के लिए जहाँ तक संभव हो सूचना तकनीक का इस्तेमाल होता हो।

संजीव केलकर कहते हैं, "आरएसएस के सबसे बड़े पैरोकार भी मानेंगे कि ये कभी भी ज्ञान केंद्रित संगठन नहीं रहा। उनको इस बात का अंदाज़ा ही नहीं है कि ज्ञान आवश्यकता केंद्रित गुण नहीं है। ज्ञान को ज्ञान के लिए अर्जित किया जाना चाहिए जिसके बिना साधारण होना एक आदर्श बन जाएगा। आरएसएस को प्रभावशाली रणनीति बनाने के लिए सूचना तकनीक के इन औज़ारों का इस्तेमाल करना चाहिए।"

"आरएसएस के सामने एक और लक्ष्य होना चाहिए और जिसकी तरफ़ उनका ध्यान भी तक बिल्कुल नहीं गया है, वो है समाज के सक्षम और बौद्धिक लोगों को अपने साथ जोड़ना। जब तक देश के चोटी के बुद्धिजीवी, लेखक, वैज्ञानिक, अद्ध्येता और ओपिनियन मेकर उससे नहीं जुड़ेगे, उसकी सामाजिक स्वीकार्यता पर सवाल उठाए जाते रहेंगे।"


ज़रूरत है सोच के बदलाव की
संघ के भीतर उसके बाहरी स्वरूप में बदलाव के बारे में सोचने पर भी एक तरह की पाबंदी रही है। संघ की शाखाओं में देशभक्ति के गीत और पुराने संस्कृत श्लोकों को गाते हुए बोरिंग ड्रिल (लाठी या लाठी के बिना भी) युवकों को बहुत दिनों तक आकर्षित नहीं कर सकेगी।

जब तक संघ के काम करने के तरीके में आधुनिक विचार और दुनिया भर के युवाओं की बदलती सोच का पुट नहीं होगा, युवा उसकी तरफ आकर्षित हो भी जाएं, लेकिन लंबे समय तक उसके साथ जुड़े नहीं रह पाएंगे।


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