भारत में बच्चों को रेप के बारे में कैसे बताएं?

पुनः संशोधित शनिवार, 21 अप्रैल 2018 (10:59 IST)
हाल ही में बच्चों के साथ हुए शोषण, और हत्या के दो मामलों ने देश में गुस्से की लहर पैदा कर दी है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग विरोध प्रदर्शन कर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। कुछ विरोध प्रदर्शनों में बच्चों को भी शामिल किया जा रहा है। जब चारों ओर रेप और हत्या की इतनी ज्यादा ख़बरें आर रही हों तो परिजनों के सामने यह समस्या पैदा हो जाती है कि आखिर वे अपने बच्चों को कैसे इन खबरों से रूबरू करवाएं।
दिल्ली स्थित एक बाल मनोवैज्ञानिक डॉक्टर समीर पारिख कहते हैं, ''जब आप बच्चों को कोई बात समझा रहे होते हैं तो वह एक बार में नहीं हो सकती, बच्चों को उनकी समझ के अनुसार घटनाओं के बारे में बताना चाहिए।''

बीबीसी की निकिता मंधानी ने देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से बात की और उनसे जानना चाहा कि वे अपने बच्चों को रेप और के बारे में किस तरह समझाते हैं।
'वो जानना चाहती है कि क्या पूरा संसार ऐसा ही है'
मेरी बेटी नई-नई खबरें जानने के लिए उत्सुक रहती है, शुरुआत में चाहती थी कि वह रेप या यौन हिंसा से जुड़ी ज़्यादा खबरें ना देखे, लेकिन यह मुमकिन नहीं था। जब वह पांच साल की हुई तो हमने उसे समझाना शुरू किया कि आखिर उसके चारों तरफ हो क्या रहा है। फिर करीब दो साल पहले उसने किसी किताब में रेप शब्द के बारे में पढ़ा और उसने मुझसे उसका मतलब पूछा।
मैं उसे बहुत ज्यादा गहराई में तो नहीं समझा सकी लेकिन मैंने उसे इतना ज़रूर बता दिया कि यह किसी की मर्जी के बिना उसके शारीरिक अंगों से छेड़छाड़ करना होता है और यह काम ग़लत है। मेरी बेटी और उसकी दोस्त कश्मीर में आठ साल की बच्ची के साथ हुई घटना के बाद से ही हैरान परेशान हैं, कभी-कभी वो मुझसे पूछती है कि क्या बाहर की दुनिया सच में इतनी बुरी है।

वह इन घटनाओं से डर जाती है लेकिन वह उस उम्र की तरफ बढ़ रही है जहां उसे बाहर निकलना होगा और दुनिया का सामना करना होगा। इसलिए हमेशा उसके साथ किसी को पहरेदार की तरह साथ रखना या उसे संभलकर कपड़े पहनने की नसीहतें देना मेरे लिए मुश्किल हो जाएगा। - मोना देसाई- मुंबई, 11 साल की बच्ची की मां
''उसे बिना परेशान किए कैसे रेप के बारे में बताऊं?''
अपनी बच्चियों के साथ रेप और यौन शोषण की घटनाओं पर बात करना अपने आप में एक चुनौती भरा काम होता है। मैं चाहती हूं कि वह लोगों पर भरोसा कर सके। मैं चाहती हूं कि वह बाहर निकलकर लोगों से दोस्ती करे, किसी के प्यार में पड़े। लेकिन इसी मौके पर मुझे उसकी सुरक्षा की चिंता भी सताने लगती है। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह घर किस वक्त पर लौटती है या क्या कपड़े पहनती है लेकिन फिर भी मैं उसे एक सही वक्त पर घर लौटने और कपड़ों पर भी कुछ नसीहतें दे देती हूं।
यही मेरी परेशानी है। मैं उसे दुनिया की हकीकत बताना चहती हूं लेकिन बिना परेशान किए। रेप और हिंसा की घटनाओं से वह दुखी हो जाती है और पूछने लगती है कि क्या सभी पुरुष एक जैसे होते हैं। मैं उसे समझाती हूं कि समजा में सभी तरह के लोग रहते हैं। उसे यह विश्वास दिला पाना मुश्किल होता है कि यह दुनिया खूबसूरत है।- पारुल खन्ना, चंडीगढ़, 14 साल की एक बच्ची की मां

'उन्हें ना कहना सिखाना चाहिए'
जब मेरे बच्चे चार या पांच साल के हुए तो हम उन्हें गुड टच और बैड टच के बारे में बताने लगे। इसके अलावा हमने उन्हें सिखाया कि कैसे दूसरे के शरीर का सम्मान करना चाहिए। हमने उन्हें बताया कि शरीर के कुछ अंग प्राइवेट पार्ट होते हैं और उन्हें किसी दूसरे को छूने नहीं देना चाहिए, उन अंगों को सिर्फ माता-पिता ही नहलाते वक्त या डॉक्टर उपचार करते वक्त छू सकते हैं, डॉक्टर भी उनके माता-पिता की मौजूदगी में प्राइवेट पार्ट छू सकते हैं।
हमने उन्हें यह भी सिखाया कि अगर किसी के छूने से उन्हें गलत महसूस होता है तो वे उन्हें ना कहने से डरे नहीं। इसके अलावा वे यह बात तुरंत हमें बताएं। यहां तक कि जब वे अपने दोस्तों के साथ खेल रहे हों तब भी हमने उन्हें समझाया कि अगर किसी को कोई खेल नहीं पसंद तो उनसे जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। मोटेतौर पर हमने उन्हें ना कहना सिखाया है। हमने इस बात का भी खास ख्याल रखा है कि हमारे बच्चे किस तरह के मीडिया से खबरें पढ़ या सुन रहे हैं और उनकी उम्र के हिसाब से वे खबरें कितनी जरूरी हैं।- अखिला प्रभाकर, मुंबई, 8 और 10 साल के बेटों की मां
"वो ग़लत तरीके से छुए जाने की कहानियां बनाती हैं"
मैंने अपनी सात साल की बेटी से के बारे में बात कभी नहीं की लेकिन आज से दो साल पहले मैंने उससे "गुड टच" और "बैड टच" के बारे में बताना शुरु किया।
उसके बाद से जब भी हम इस बारे में बात करते हैं वो मुझे उसे ग़लत तरीके से छुए जाने के एक नई कहानी बताती है। पहले तो मुझे काफी चिंता हुई लेकिन बाद में मैं निश्चिंत हो गई कि ऐसा कुछ भी उसके सथ नहीं हुआ। फिर मुझे पता चला कि ये बच्चे कहानियां अच्छी कह लेते हैं।

मेरी बेटी मेरी बताई बातों को समझने की कोशिश करती है और खुद को उन स्थितियों में रखने की कोशिश करती है जिसके बारे में हम बात कर रहे हैं। एक मं के तौर पर कभी-कभी ये मेरे लिए मुश्किल स्थिति हो जाती है और मुझे पता नहीं चलता कि वो इन बातों को सही तरीके से समझ पा रही है या नहीं।
मेरी बेटी की उम्र की बच्चियों के साथ इस तरह की भयानक घटनाएं हो रही हैं, ये जान कर मैं डर जाती हूं। मुझे नहीं पता कि "बलात्कार" जैसे मुद्दों पर मैं अपनी बेटी से कैसे बात करूं। मुझे डर लगता है कि अगर मैं उसे बलात्कार के बरे में बतऊंगी तो वो खुद को उसके साथ भी जोड़ कर देखेगी।- सुनन्दा पराशर, 7 और 2 साल की दो बेटियों की मां, दिल्ली।

"मैं अपने किशोर बेटे को बलात्कार विरोधी प्रदर्शन में ले कर गई"
बीते कई सालों से हम लोग अपने बेटे के साथ रज़ामंदी, महिलाओं के साथ ठीक तरह से व्यवहार और हिंसा के साथ-साथ इन सबमें जेंडर की भूमिका के बारे में बातें करते हैं।
ये बेहद ज़रूरी है कि हमारे बच्चों में अच्छी समझ बन सके। सभी लोग हर तरफ दिखने वाली सभी चीज़ों से सीख सकते हैं। लेकिन अब लगता है कि दायरे स्पष्ट नहीं हैं। ये संभव है कि किशोरावस्था में उनका दिमाग़ रज़ामंदी की जरूरत ना समझ सके और ये ना जान सकें कि किस तरह हॉर्मोन शरीर पर अपना कब्ज़ा कर लेते हैं।

इसीलिए हमारे लिए ये चर्चाएं बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं। सिर्फ़ ये ज़रूरी नहीं कि हम उन्हें बताएं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। लेकिन इससे उन्हें ये समझने की भी हिम्मत मिलती है कि उनके आस पास ऐसी घटनाएँ ना हों। बीते रविवार हम अपने बेटे को बलात्कार विरोधी प्रदर्शन में ले कर गए थे। हमें लगता है कि उसके लिए ये ज़रूरी है कि वो ये जाने कि वो अकेला नहीं है, और भी कई लोग हैं जो उसके बारे में सोचते हैं और उसके जैसी मान्यताओं पर यकीन करते हैं।- अरुनाभा सिन्हा, 15 साल के एक बेटे के पिता, दिल्ली
"उसे पता होना चाहिए कि बदलाव लाने की प्रक्रिया में उसकी अहम भूमिका है।"

मैंने कई बार अपने बड़े बेटे से बलात्कार और यौन हिंसा के संबंधित कुछ घटनाओं के बारे में बात की है। वो कभी-कभी ख़बरें पढ़ता है और इसीलिए मैंने मीडिया में आ रही इन ख़बरों से जोड़ कर रज़ामंदी और हिंसा के बारे में बात की। मैंने महिलाओं के मुद्दों पर भी उससे बात की है। मुझे लगता है कि ऊंची जाति का हिंदू होने के नाते उसे इन बातों के बारे में जानना चाहिए और उसे पता होना चहिए कि बदलाव लाने की प्रक्रिया में उसकी अहम भूमिका है।
मुझे लगता है कि मेरे बेटे को बलात्कार की संस्कृति के बारे में पता होना चाहिए। आज के वक्त में हमारे आस पास रहने वाली महिलाओं के लिए यौन हिंसा बड़ा डर बन गया है और हर किसी के जीवन और व्यवहार को प्रभावित करता है। सेक्सिट चुटकुले और बातें हर घर में होती हैं और हमें इस बारे में सोचना चाहिए कि ये कैसे क्षति पहुंचा सकते हैं।

मैंन अपने बेटों को ख़बरें देखने-पढ़ने से नहीं रोकती। लेकिन मैं उनसे ये ज़रूर कोशिश करती हूं कि वो खुद से मुद्दों पर चर्चा करें ना कि उन पर बात करने के लिए मुद्दे थोपे जाएं। शायद मेरे बच्चे हमेशा हमसे जो चर्चा करते हैं उसका पूरा अर्थ नहीं समझ पाते लेकिन ये मेरे लिए काफी है कि वो ये बात जानते हैं कि उनकी मां के साथ ऐसे व्यवहार बर्दश्त नहीं किया जाना चाहिए।- सुनयना रॉय, 11 और 3 साल के दो बेटों की मां, बंगलुरु
(इस रिपोर्ट के लिए बीबीसी की निकिता मंधानी का साथ दिया बीबीसी पंजाबी के संवादादाता दलजीत अमी ने)
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