क्या ये महिला दिल्ली की ख़तरनाक डॉन है?

पुनः संशोधित बुधवार, 22 अगस्त 2018 (12:16 IST)
- भूमिका राय

रविवार की सुबह। दिल्ली के संगम विहार में जब सुबह लोग उठे और बालकनी के बाहर पड़े अख़बारों को उठाया तो बड़ी सी हेडिंग पढ़ी। "62 साल की क्राइम 'मम्मी' बसीरन गिरफ़्तार", ऐसी और भी कई हेडिंग्स में उस 'गॉडमदर' का ज़िक्र था, जिसके बारे में उस इलाक़े के लोग शायद सालों से जानते थे।

"गॉडफ़ादर तो बहुत होते हैं लेकिन कभी-कभी पैदा होती है। वो भी ऐसी जिसने अपने बच्चों के साथ मिलकर ही गिरोह खड़ा कर दिया। इतने बच्चे भी इसीलिए पैदा किए होंगे। ऐसे धंधे में बाहरी पर यक़ीन करना मुश्किल होता है तो सोचा होगा कि अपनी औलाद से ही फ़ौज तैयार कर लें।"

मैं इस 'गॉडमदर' की असल कहानी जानने के लिए संगम विहार की उन तंग गलियों का रुख़ करती हूं। जहां नालियों में बहते मल के आस-पास ठेला लेकर खड़े रेहड़ी वाले इस कथित गॉडमदर के बारे में बात करने से कतरा रहे थे। बसीरन को जानते तो सब हैं लेकिन किसी से उनके घर तक छोड़ आने को कहो तो कोई तैयार नहीं होता।

गलियां इस क़दर तंग हैं कि नहीं चाहते हुए भी आपको पैदल ही चलना पड़ता है। किसी भी मोड़ से कोई गाड़ी आकर बीच रास्ते में खड़ी हो जाती है और सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। लंबा जाम लग जाता है और धारा-प्रवाह गालियों का दौर शुरू हो जाता है।

सड़कें नालियों में तब्दील हो चुकी हैं और हर आने-जाने वाली गाड़ी नाली के उस पानी को मथकर आगे निकल जाती हैं। फिर देर तक बुलबुले तैरते रहते हैं। नाली बनी सड़क के बीच-बीच में कुछ ईटें झांक रही थीं, उन्हीं पर अपने पांव टेकते-टेकते 'आई 2 ब्लॉक' आ गया।

वहां पहुंचने की तसल्ली तो थी पर वापस वहीं से होकर गुज़रने का ख़ौफ़ न दिल से गया था, न नाक से। अपने ही पैरों को देखने से उकाई आ रही थी। वहां से चार-पांच सड़क रूपी नालियों को पार करते ही 'आई ब्लॉक' शुरू हो जाता है। वही आई ब्लॉक जहां की गली नंबर 20 में, दिल्ली की 'गॉडमदर' बसीरन रहा करती थीं।

वही बसीरन, जिसे ने 17 अगस्त को गिरफ़्तार किया है। पुलिस के मुताबिक वो अपने आठ बेटों (वकील, शकील, शमीम, सन्नी, सलमान, फ़ैज़ल, राहुल और शोएब) के गिरोह की सरगना थी। एक बेटे के जेल जाने पर दूसरे को वसूली पर लगा देती थी ताकि ज़मानत की रक़म का इंतज़ाम हो जाए। उम्र 62 साल है। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक फ़िरौती लेती थी, पानी ब्लैक करती थी और पुलिस को चकमा देकर फ़रार हो जाती थी।
गॉडमदर की गली
गॉडमदर उर्फ़ 'मम्मी' का घर खोजना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था। वैसे भी 'मम्मी' का घर कौन नहीं जानेगा। बसीरन के अपने तो 11 ही बच्चे थे लेकिन हर छोटा-बड़ा उसे मम्मी ही कहता था।


तंग गली शुरू होते ही, बांई ओर, एक बिना प्लास्टर वाला एक-मंज़िला मकान है। इस मकान के मेन गेट पर सील लगा मोटा ताला लटका हुआ है और गेट पर चस्पा एफ़आईआर की एक कॉपी। यह एफ़आईआर दो महीने पहले की है। बाहर बोरिंग पाइप लाइन हैं और एक तख़्त। उस तख़्त पर उस समय एक बकरी आराम फ़रमा रही थी।

मैं गेट के बाहर खड़ी ही थी कि इतने में एक 24 साल की लड़की दौड़ते हुए आई... "ऐ..क्या चाहिए तुम्हें? मेरे घर को ऐसे क्यों घूर रही हो? फोटो क्यों खींच रही हो बिना बताए?"

उस लड़की की आवाज़ इतनी तेज़ और गुस्से से भरी थी कि मैंने एक सेकंड भी बर्बाद किए बगैर मोबाइल बैग में डाल दिया। वो मुझसे बात करने के लिए तैयार हो जाए इसलिए उसे अदब से हैलो किया और मुस्कुराहट फेंक दी।
बाद में पता चला कि बसीरन असल में इस 24 साल की लड़की की मम्मी हैं, 'मां' वाली मम्मी। सोना, बसीरन की सबसे बड़ी बेटी है। दो छोटी बहनें और भी हैं जो उसी समय स्कूल से लौटी थीं और अपनी बहन के बेटे को गोद में लेकर पापड़ी खिला रही थीं।

थोड़ी देर पहले सोना ने पांच रुपये में वो पापड़ी ख़रीदी थी। जिसे एक बार उसका बेटा खा रहा था तो एक बार सबसे छोटी बहन सना। मैं तीनों बच्चों को देख ही रही थी कि तभी..सोना की आवाज़ एक बार फिर गूंजी, "सुनो..हमें किसी से न तो कुछ कहना है और न ही किसी को कुछ बताना। हमें तो बस इतना पता है कि हमारी मम्मी को फंसाया गया है। तुम यहां से जाओ।"
मुश्किल से पांच मिनट बीते होंगे कि इतने में मुहल्ले की 10-15 औरतें, कुछ बच्चे, बकरियां और ठेले वाले वहां जमा हो गए। लोगों की भीड़ से गली बंद हो चुकी थी। इतनी देर में सोना को शायद लगा कि उसे मुझसे कोई ख़तरा नहीं तो उसने बगल वाले घर से कुर्सी मंगवाई और मुझे बैठने के लिए दी।
हां, लेकिन उसने अपने घर ले जाने से साफ़ मना कर दिया। घर सील हो जाने के बाद से वो फिलहाल किराए पर रह रही हैं। एक बूढ़ा आदमी सुलगती बीड़ी मुंह में दबाए दूर खड़ा था। वो आस-पास होती चीज़ों को घूर तो रहा था लेकिन ख़ामोश खड़ा था। सोना ने बताया कि ये उसके पापा (गॉडफादर नहीं) मलखान सिंह हैं। थोड़ी देर बाद मलखान सिंह धीरे-धीरे कदमों से आकर टूटी प्लास्टिक की कुर्सी पर खुद ही बैठ गए।
'मुझे मेरी इज़्ज़त प्यारी है'
मलखान सिंह राजस्थान के धौलपुर के मूल निवासी हैं। क़रीब 45 साल पहले उत्तर प्रदेश में आगरा के बसाई अरेला गांव की बसीरन के साथ उनकी शादी हुई थी। शादी कैसे हुई, किसने कराई इस पर वो जवाब नहीं देते हैं।

मलखान बताते हैं "मैं बिजली का काम करता था। पहले हम गोविंदपुरी झुग्गी में रहते थे फिर साल 1991 में हम संगम विहार आ गए। कमाई अच्छी थी मेरी, कोई बोल तो दे कि मैंने किसी के लिए कोई कमी छोड़ी हो।"
साल 1997 में मलखान की एक दुर्घटना में पसलियां टूट गईं, जिसके बाद उन्होंने काम छोड़ दिया। इसके बाद घर संभालने की ज़िम्मेदारी बड़े हो रहे बेटों और मां पर आ गई। मलखान कहते हैं कि ये सब जो हो रहा है उसकी शुरुआत मेरे बड़े बेटे वक़ील ने की।

"वो ही सबसे पहले जेल गया। हमसे कहता था कि फ़रीदाबाद में दारू की दुकान पर काम करता है लेकिन भगवान जाने क्या करता था। कुछ तो ग़लत किया होगा तभी पकड़ा गया और उसके बाद ये सिलसिला शुरू हो गया।"
हालांकि पुलिस के मुताबिक़, बसीरन खुद ही अवैध शराब का धंधा करती थी। मलखान कहते हैं कि उन्हें पत्नी और बेटों पर लगे किसी आरोप के बारे में न तो जानकारी है और न ही वो जानना चाहते हैं।

"मैं अब यहां नहीं रहूंगा। एक-दो दिन में राजस्थान चला जाऊंगा। परिवार पालना था वो मैंने किया, लेकिन अब ये लोग मेरी इज़्ज़त नोंच रहे हैं, वो मैं नहीं बर्दाश्त करूंगा।" एक ओर जहां बसीरन और उनके सभी बेटों पर कुल मिलाकर 113 आपराधिक मामले दर्ज़ हैं वहीं मलखान पर कोई केस नहीं है।
मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी जितेंद्र मलिक ने भी इस बात की पुष्टि की है। बसीरन के बारे में मलखान ज़्यादा कुछ नहीं बताते हैं। बस इतना ही कि "ठीक बीवी थी वो। मेरा सब काम तो वही करती थी। बच्चों को भी खाना-पानी देती ही थी। हमारे बीच में कभी-कभार लड़ाई होती थी लेकिन वो तो सारे पति-पत्नी के बीच होती है।"

मलखान ये मानते हैं कि उनका बेटा शमीम थोड़े गुस्से वाला था लेकिन कुछ भी पूछने पर उनका एक ही जवाब मिलता है, "न तो मैंने आज तक कोई ग़लत काम किया, न ही मैंने किसी को ग़लत काम करने के लिए कहा और न ही मैं अब किसी के लिए सोचूंगा। जिसको जैसे मरना हो मरे, मेरे हाथ-पैर हैं मैं गांव जाकर काम करूंगा, खाऊंगा।"
पर अब तक क्यों नहीं सुनाई दिया था इस 'गॉडमदर' का नाम?

अख़बारों में ख़बर छपने के बाद मोहल्ले की मम्मी को लोग अब गॉडमदर के रूप में जानने लगे हैं। बसीरन के मोहल्ले से निकलकर जब मैं संगम विहार पुलिस थाने पहुंची तो पता चला 15 मिनट पहले ही पुलिस ने इस मामले पर ब्रीफ़िंग की है। इस मामले की जांच में शामिल रहे एक विवेचना अधिकारी (आईओ) जितेंद्र मलिक ने बताया कि ये लोग लाखों-करोड़ों की मांग नहीं करते थे।
जितेंद्र बताते हैं, "संगम विहार ऐसा इलाक़ा नहीं है जहां कोई लाख-करोड़ रुपये दे तो बात सामने नहीं आए। ये लोग पांच-दस हज़ार रुपये की उगाही करते थे। किसी की बाइक छीन ली तो किसी का पर्स। कोई ना-नुकुर करे तो जान से मारने की धमकी देते थे। ऐसे में आदमी सोचता था कि हज़ार-दो हज़ार जान से ऊपर तो नहीं और इसलिए मामला कभी बहुत बड़ा नहीं हुआ।"..मलिक बताते हैं कि उनका बहुत सीधा सा फंडा था कि भई तुम्हारी हैसियत पांच हज़ार देने की है, तो तुम्हें देना पड़ेगा।
लेकिन फिर बसीरन, गॉडमदर कैसे बन गई?

बसीरन की गिरफ़्तारी में मुख्य भूमिका निभाने वाले एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि मोहल्ले के लोग बसीरन के पास अपनी शिकायतें लेकर जाते थे। "जैसे किसी के घर में झगड़ा-लड़ाई हो गया या किसी पड़ोसी से अनबन हो गई तो लोग बसीरन के पास चले जाते थे। और वो धमकाकर एक पक्ष को चुप करा देती थी।"

जिस मामले के सिरे पकड़ते हुए पुलिस को इस पूरे कथित गिरोह का पता चला वो भी पारिवारिक रंजिश का ही था। सितंबर 2017 में पुलिस संगम विहार के के-ब्लॉक जंगल से एक अधजली लाश मिली थी। लाश की शिनाख़्त नहीं हो सकी थी, लेकिन पुलिस मामले की जांच कर रही थी। इसी बीच जनवरी 2018 में पैसे की उगाही और मारपीट का एक मामला सामने आया। जब इस मामले पर पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि जो अधजली लाश बरामद हुई थी, उस घटना में भी इसी गिरोह का हाथ था। उसके बाद पुलिस ने मामले के तार जोड़ने शुरू किए।
पता चला कि मुन्नी बेग़म नाम की एक महिला ने बसीरन को अपने भाई के नाम की सुपारी 60 हज़ार में दी थी। इसके बाद मुन्नी और दूसरे आरोपियों को तो गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन बसीरन फ़रार हो गई।

इसके बाद मई 2018 में बसीरन को प्रोक्लेमड ऑफ़ेन्डर (जो क़ानून की नज़र में आदतन अपराधी है) घोषित कर दिया गया और सीआरपीसी 83 के तहत उनकी संपत्ति को ज़ब्त कर लिया गया। हालांकि बसीरन ने संपत्ति छुड़वाने और ज़मानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटाया लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका को ख़ारिज कर दिया। इस बीच बसीरन संगम विहार लौटकर आई। पुलिस को इसकी ख़बर हो गई और उन्होंने उसे गिरफ़्तार कर लिया।
डीसीपी रोमिल बानिया के मुताबिक, पूछताछ के दौरान बसीरन ने स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने गिरोह के साथ मिलकर 8 सिंतबर 2017 को मिराज़ को मारा। पहले उन लोगों ने मिराज़ का गला बेल्ट से घोंट दिया और उसके बाद उसके शव को पेट्रोल छिड़कर जलाने की कोशिश की। पुलिस का कहना है कि वो अब तक संगम विहार के जंगल से चार लाशें बरामद कर चुकी है।

लेकिन 'गॉडमदर' बसीरन की बेटी सोना इन सारे आरोपों को बेबुनियाद बताती हैं। "मेरी मम्मी ने कुछ नहीं किया। वो तो पानी का काम करती थी बस और कुछ नहीं।" सोना का दावा है कि उसकी मम्मी को पुलिस ने नहीं पकड़ा है बल्कि उन्होंने आत्म-समर्पण किया है।
बसीरन के अलावा उनके तीन बेटे फ़ैज़ल, शमीम और राहुल पहले से ही जेल में हैं। कोई मारपीट के लिए तो कोई हत्या के लिए। बाकी के भाई कहां हैं, न तो बहन को पता है न पिता को। अब सारा काम सोना ही देख रही हैं। वो चाहे पानी बेचना हो या कोर्ट-केस और पुलिस। सोना अपने पक्ष में तर्क देती हैं कि पुलिस कह रही है कि मेरी मम्मी और भाई पैसा वसूलते थे, तो मेरे पास तो पैसा होना चाहिए न, लेकिन मैं तो ज़मीन बेचकर केस लड़ रही हूं। सोना शादीशुदा हैं लेकिन व्यक्तिगत कारणों के चलते अब वो पति से अलग रहती हैं।
पड़ोसियों का क्या कहना है?
सोना चुनौती भरे लहज़े में कहती हैं कि पूछ लो इस मोहल्ले में, कोई कह दे कि मेरी मम्मी और भाई ऐसे थे। "अरे, मेरे भाई इतने अच्छे थे कि उनके रहते कभी किसी ने इस मोहल्ले की लड़की को आंख उठाकर नहीं देखा। मेरी मां हमेशा दूसरों की मदद करती थी। पैसे से भी और वैसे भी।"

मोहल्ले में ही रहने वाली निशा ने कहा कि इन लोगों को देखकर कभी नहीं लगा कि यहां कुछ ऐसा होता है। हां इन लोगों का पानी का काम था, उसको लेकर कभी-कबार कुछ कहा-सुनी हो जाती थी। ज़्यादातर लोगों के जवाब ऐसे ही थे। सभी ने यही कहा कि मोहल्ले में उन्हें कभी ऐसा करते नहीं देखा गया लेकिन बाहर वो क्या करते थे, जानकारी नहीं।
क्या-क्या हैं मामले?
बसीरन पर पानी के अवैध कब्ज़े, हत्या और फ़िरौती समेत कुल 9 मामले हैं। उनके बेटे शमीम उर्फ़ गूंगा पर चोरी, डकैती, छिनैती और अपहरण से जुड़े 42 मामले। इसके अलावा शकील, वकील, राहुल, फ़ैज़ल, सनी, सलमान पर भी हथियार रखने और लूटपाट संबंधी कुल 113 मामले दर्ज़ हैं। शमीम उर्फ़ गूंगा पर मकोका के तहत भी मामला दर्ज़ है।

क्या है ये पानी का काम?
बसीरन के घर के बाहर एक पानी के मोटर की बोरिंग है। जिससे वो गली नंबर 20 के लोगों को पानी देती थी। हालांकि वो जेल में हैं तो अब ये काम सोना देख रही है। हर परिवार से 200 रुपये महीने लिए जाते हैं और मोटर चलाने का जितना बिल आता है वो बांट दिया जाता है। बोरिंग मलखान ने करवाई थी लेकिन तब सबके लिए पानी फ्री था, बाद में बसीरन इसके लिए पैसे लेने लगीं।
मलखान से जब ये पूछा कि क्या इसके कोई कागज़ात हैं तो उन्होंने ऐसा कोई भी कानूनी कागज़ होने से मना कर दिया। गली नंबर 20 में क़रीब 70-75 परिवार हैं। ज़्यादातर मुस्लिम आबादी है और कुछ हिंदू भी हैं। मोहल्ला थोड़ा अजीब इस लिहाज़ से लगता है कि एक ओर जहां मोहल्ले की महिलाएं मुखर होकर बात में हां-ना कह-कर रही थीं वहीं मर्द चुपचाप थे। कुछ पूछने पर चलते बनते।

मोहल्ले से निकलर गली नंबर 14 में जब कुछ लोगों से बसीरन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, बहुत अच्छा हुआ। बदमाश थे वो लोग। साहिल नाम के एक लड़के के पिता ने बताया कि बहुत अच्छा हुआ कि बसीरन जेल चली गई।
"उसने सिर्फ़ अपने लड़कों को नहीं बिगाड़ा, सैकड़ों बच्चों को बर्बाद कर दिया। नशे की लत लगवाई और फिर चोरी करवाती थी। मेरा अपना बेटा आज उसी की वजह से जेल में है। मेरे बच्चे के जैसे बहुत बच्चे हैं।"

बाहर से देखने पर सबकुछ शांत नज़र आता है लेकिन लोगों का ख़ामोश रहना और अनजान बनकर रास्ता बदल लेना बहुत कुछ कहता है। जैसे ही वहां से लौटने के लिए कदम बढ़ाए बसीरन का सबसे छोटा बेटा सामने से आता दिखा। गले में नकली सोने की चेन और कानों में बाली पहने शोएब एक डीजे है। दोनों छोटी बहनों ने बताया कि ये उनका छोटा भइया है।
सना चाहती थी कि मैं उसके छोटे भाई की फोटूं खीचूं और इंटरव्यू लूं लेकिन वो अभी नाबालिग था। मैंने मना किया तो उसे अच्छा नहीं लगा और वो ये बोलकर चली गई कि जो आता है सिर्फ़ घर की फ़ोटो लेता है, हमारी नहीं। पर सना को ये समझा पाना ठीक नहीं लगा कि उसकी तस्वीर क्यों नहीं ली जा रही और ये घर इतना ज़रूरी क्यों है?

और भी पढ़ें :