गोविषाण टीला

काशीपुर में स्वर्णिम इतिहास समेटे

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उधमसिंह नगर की में स्थित में नगर से आधे मील की दूरी पर गोविषाण टीला अपने भीतर कई इतिहास समेटे हुए है। कहा जाता है कि यहाँ और आए थे। फाहियान गुप्तकाल के दौरान (399 ई. से 414 ई.) यहाँ पहुँचे। यायावर फाहियान ने यहाँ बौद्ध स्तूप होने की बात अपने यात्रा वृतांत्त में लिखी थी। इसके बाद चीनी यात्री ह्वेनसांग (621 ई. से 645 ई.) जब इस स्थान पर पहुँचा तो उसने भी इस स्थान का पूरा विवरण अपने वृतांत्त में दिया।

ह्वेनसांग के अनुसार वह मादीपुर से चलकर 66 मील की यात्रा पूरी कर गोविषाण नामक स्थान पर पहुँचा। यहाँ ऊँची भूमि पर ढाई मील की गोलाई लिए एक स्थान था। इसमें बगीचे, तालाब एवं मछली कुंडों के अलावा दो मठ थे, जिनमें सौ बौद्ध धर्मानुयायी रहते थे। यहाँ 30 ब्राह्मण के मंदिर थे। शहर के बाहर एक बड़े मठ में 200 फुट ऊँचा अशोक का स्तूप था। इसके अलावा दो छोटे-छोटे स्तूप थे, जिनमें भगवान बुद्ध के नख एवं बाल रखे गए थे। इन मठों में भगवान बुद्ध ने लोगों को धर्म उपदेश दिए थे।

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1868 में भारत के तत्कालीन पुरातत्व सर्वेक्षक सर ने इस स्थान का दौरा किया लेकिन इनमें उन्हें ये वस्तुएँ खासकर भगवान बुद्ध के नख एवं बाल नहीं मिले। कनिंघम को इस टीले की सबसे ऊंचाई पर स्थित भीमगोड़ा स्थल पर एक पुरातात्विक निर्माण का पता चला। यहाँ पर भारत के तत्कालीन मुख्य पुरातत्व सर्वेक्षक डॉ. वाई.डी. शर्मा के नेतृत्व में सीमित खुदाई का कार्य आरंभ किया गया, जिसका उद्देश्य यह जानना था कि इस टीले के अंदर के भवनों की आकृति क्या है। 1966 में सीमित खुदाई करके यह कहा गया कि पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण इसका संरक्षण जरूरी है।

इसमें 596 वीं शताब्दी की किलेनुमा दीवारें मिली थीं। आकर्षक रूप से उकेरी गई ईंटों से बनी दीवारों की शिल्पकला भी अनूठी थी। इसके अलावा ताँबे के सिक्के बर्तन समेत ताँबे पर नक्काशी करने वाली कखानी भी यहाँ मिली। चॉकलेटी रंग का दो छिद्रों वाला सुरक्षा ताबीज यहाँ मिला। इसके अलावा भूरे-लाल रंग लिए मिट्टी के बने हुए दीये और अलग-अलग आकृति के अगरबत्ती रखने के खाँचे और तीरों की नोंक, लोहे की छड़ें और चाकू भी इसकी खुदाई से प्राप्त हुआ।

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1969 में एक बार फिर यहाँ खुदाई कर 140 फुट लंबे, 82 फुट चौड़े और साढ़े उन्नीस फुट ऊँचे विशाल चैत्य के अवशेष मिले। एक प्रदक्षिणा पथ भी मिला, जिसका काफी हिस्सा मंदिर की मुख्य दीवार के निर्माण से मेल खाता था। मिट्टी से बने पतले पहिए के आकार के बर्तन को एक क्रम से पाया गया। इस अभियान की विशेषता यह थी कि जो चीजें यहाँ मिलीं, वह अन्य स्थानों की खुदाई में कहीं नहीं मिली।

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- महेश पाण्डे
गोविषाण की खुदाई में शुंग और कुषाण काल (ईसा पूर्व 200 से लेकर 130 ईसा पूर्व) तक (राजपुर काल) के मनके, मृदभांड, सिक्के मिले हैं। इसके अलावा अनाज रखने के बर्तन एवं गेहूँ के दाने भी प्राप्त हुए हैं। जो इसी काल के समझे जाते हैं। इस साल की पूरी खुदाई में कत्यूर काल से पहले 2900 ईसा पूर्व तक जानकारी मिलने की संभावना है।


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