पितृ श्राद्ध क्यों?

'श्रद्धाया इदं श्राद्धम्‌'

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हम यहाँ पितृ का उल्लेख कर रहे हैं। इस लेख में हम मूल संस्कृत में न जाकर विभिन्न महर्षियों द्वारा और पुराणों में उल्लेखित श्राद्ध की महिमा के भावार्थ द्वारा यह जानने का प्रयास करेंगे कि श्राद्ध क्यों आवश्यक हैं? इसके लाभ क्या हैं? और इसकी महत्ता क्या है?

विभिन्न वेदों में कर्मकांड के अंतर्गत पितृ यज्ञ का वर्णन मिलता है। यह पितृ यज्ञ ही पितृ श्राद्ध है। इसका तात्पर्य है कि पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।

'श्रद्धाया इदं श्राद्धम्‌'
विभिन्न प्राचीन ऋषियों, मुनियों एवं वेदों-पुराणों में श्राद्ध के लक्षण बताए गए हैं।

महर्षि पाराशर के अनुसार- 'देश, काल तथा पात्र में हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म तिल, यव और कुशा आदि से तथा मंत्रों से श्रद्धापूर्वक किया जाए उसे श्राद्ध कहते हैं।

महर्षि मरीचि ने मृत पितरों के निमित्त अपने को प्रिय भोजन, जिसे श्रद्धायुक्त होकर दिया जाए, उसे श्राद्ध कहा है।
महर्षि बृहस्पति- 'जिस कर्म विशेष में अच्छी प्रकार से पकाए हुए उत्तम व्यंजन को दुग्ध, घृत (घी) और शहद के साथ श्रद्धापूर्वक पितृगण के उद्देश्य से ब्राह्मण आदि को प्रदान किया जाए उसे श्राद्ध कहते हैं।

ब्रह्मपुराण में उल्लेखित है कि देश, काल और पात्र में श्रद्धा द्वारा जो भोजन पितरों के उद्देश्य से ब्राह्मणों को दिया जाए, उसे श्राद्ध कहते हैं।
हिंदू धर्म में प्राचीन काल से मनुष्यों में श्राद्ध के प्रति अटूट श्रद्धा भक्ति रही है। यह हिंदू धर्म ही है, जिसमें मृत्यु पश्चात्‌ भी जनक-जननी के प्रति कर्त्तव्य का निर्वहन बताया है। अतः अगर शास्त्रोक्त श्राद्ध संपन्न करना संभव न हो तो कम से कम वर्ष में एक बार पितृ पक्ष में अपने मृत पितृगण की मरण तिथि के दिन श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। पितृ पक्ष के साथ पितरों का विशेष संबंध रहता है। अतः शास्त्रों में पितृ पक्ष में श्राद्ध करने की विशेष महिमा लिखी है।


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