विंटरनित्ज की 150वीं जन्मशती पर गोष्ठी का आयोजन

प्राग में प्रकृति

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भारत की कला, संस्कृति और भाषिक परंपरा के प्रति पश्चिम के रुझान को वर्षों से पहचाना गया है। जर्मन और संस्कृत भाषा के यूरोपीय विद्वान को इस रुझान की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।

यूरोप और भारत में समान रूप से समादृत और विख्यात प्राच्यविद् विंटरनित्ज‍ का जन्म दिसंबर 1863 में ऑस्ट्रिया में हुआ था, जहां उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा से लेकर पीएचडी तक की यात्रा की। 1888 में शोध-दृष्टि की प्रखरता लेकर वे ऑक्सफोर्ड पहुंचे और 1892 तक उन्होंने प्रख्यात विद्वान मैक्सम्युलर के सा‍न्निध्य में रहकर ऋग्वेद के दूसरे संस्करण की तैयारी में सहयोग दिया।
1902 में वे प्राग के चार्ल्स विश्वविद्यालय में संस्कृत प्रोफेसर नियुक्त हुए। इन्हीं विद्वान विंटरनित्ज की 150वीं जन्मशती के अवसर पर उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए चेकोस्लावाकिया की राजधान प्राग में स्थित चार्ल्स विश्वविद्यालय के दर्शन शास्‍त्र संकाय के अंतर्गत आने वाले दक्षिण और केंद्रीय एशियाई विभाग ने मई-जून में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन किया।
'पन्डानुस 13' नाम का यह आयोजन विश्वविद्यालय की भारत अध्ययन विषयक उस शोध परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें यूरोप तथा भारत के कुछ अन्य विश्वविद्यालय मिलकर हर वर्ष संयुक्त रूप से एक ऐसी गोष्ठी करते हैं जिसमें भारतीय साहित्य और कलाओं में प्रकृति की विविधतापूर्ण छवियों का रेखांकन करने वाली प्रस्तुतियां होती हैं। इस गोष्ठी में पढ़े गए आलेखों का सुरुचिपूर्ण वार्षिक प्रकाशन भी प्राग विश्वविद्यालय के सौजन्य से होता है।
इस वर्ष 30 मई से 1 जून तक संपन्न होने वाले इस समारोह में जो व्याख्यान हुए, उनमें विषयों की विविधता देखकर हैरान होने के ‍सिवा क्या किया जा सकता था?

महाभारत में पर्यावरण, ऋग्वेद में प्रकृति : पर्वत और पाहन, शूद्रक के मृच्छकटिक में प्रकृत‍ि, हिन्दी में महिला आत्मकथात्मक लेखन में प्रकृति और आत्म, कुमारसंभव में हिमालय और वसंत की व्यंजना, नरक के उपकरण के रूप में प्रकृति, भारत में मुगल पूर्व उपवन, वैदिक और शास्त्रीय स्रोतों में दर्भ, कुश और शर, कमल पुष्प की पवित्रता पर पुन:विचार, कुंवर नारायण के वृक्षों का काव्यशास्त्र, तमिल लोक‍गीतों में नीम के वृक्ष की सार्थकता, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के देश‍भक्तिपूर्ण गीतों में प्रकृति, समसामयिक तमिल लेखन में प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण, हयग्रीव, पर्वत में जन्मे और जंगल में रहने वाले नरसिंह संस्कृत दूतकाव्य में पक्षी, प्रकृति और मानव देह, नेपाली कविता में नेपाल की छवि, भवानीप्रसाद मिश्र की कविता में प्रकृति- ये कुछ ही शीर्षक हैं, जो इस वैविध्य का पता देते हैं।
रूस, इटली, पोलैंड, वियना, भारत, हंगरी, यूके, अमेरिका जैसे देशों के प्रतिनिधि इस गोष्ठी के लिए एकत्रित हुए। वातावरण अनुशासनबद्ध किंतु इतना अनौपचारिक-आत्मीय था कि 9 से 5 बजे तक चलने वाले सत्र निरंतर रोचक बने रहते। इस आयोजन को सरस बनाने में उस मानवीय प्रयत्न की भूमिका सबसे बड़ी थी, जो अपनी सादगी में बेहद प्रभावशाली थी। प्रोफेसर यारोस्लोव हर दिन गोष्ठी के आरंभ से पहले ही तमाम छोटी-छोटी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करते नजर आते और आयोजन समिति के युवा सचिव डॉ. मार्टिन चाय-काल की भारी-भरकम केतली खुद उठाए चले आते।
1943 में जन्मे प्रोफेसर यारोस्लोव वासेक चार्ल्स विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र संकाय के निर्देशक होने के साथ-साथ संस्कृत और तमिल भाषा के मर्मज्ञ भी हैं। डॉ. वासेक ने भगवद् गीता का चेक भाषा में अनुवाद किया है। उनके निश्छल व्यक्तित्व में विनम्रता का आलम यह था कि वे निरंतर यह कहते रहे- 'ऐसे आयोजनों में भारत से अधिकाधिक भागीदारी का स्वागत होना चाहिए, क्योंकि हम तो केवल कुछ जानते हैं, पर भारतवासी तमाम परंपराओं- अवधारणाओं को उनकी जड़ से पहचानते हैं।
विभाग के ऊर्जावान प्राध्यापक डॉ. मार्टिन हृबेक बंगला भाषा के ऐसे जानकार हैं, जो कवीन्द्र-रवीन्द्र के गीतों के नित नए पक्षों को उजागर करते चले आ रहे हैं। इस गोष्ठी में वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर के राष्ट्रीय गीतों में प्रकृति विषय पर बोले। विभाग के एक और युवा शोधकर्ता पावेल ने तमिल समसामयिक लेखन में प्रकृति पर वक्तव्य दिया। पोलैंड से डॉ. दानुता ने कुंवरनारायण के वृक्षों के काव्यशास्त्र को खोजा तो वियना विश्वविद्यालय के थॉमस ने बाकायदा कमल के पत्ते सामने लाकर कमल पुष्प की पवित्रता पर पुन:विचार किया।
प्रकृति के बहुविध आयामों का उद्घाटन करने के क्रम में अपने विविध आलेखों में ये विद्वान भारतीय साहित्य में उपलब्ध सामान्य प्रकृतिपरक उपकरणों पर ऐसी सामग्री खोजकर लाए, जो विस्मय-विमुग्ध करती रही- इतना कि वि‍भिन्न पुराणों से संकलित सामग्री के आधार पर नरक की परिकल्पना में प्रकृ‍ति की भूमिका पर जो खोजपूर्ण आलेख विभागीय प्रतिनिधि स्तिपल ने पढ़ा, वह सभी के मन में कौतूहल जगा गया।
गोष्ठी के अंत में- आने वाले तीन वर्षों में इस आयोजन के स्थानों और आयोजनकर्ताओं की घोषणा की गई और मैंने जाना कि एक गंभीर गोष्ठी के क्या मायने होते हैं और उसके लिए कितनी तैयारी अपेक्षित है।

प्रस्तुति : विजया सती


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