गोपाचल के गुहा मंदिर

Gopachal
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मध्य भारत में गुहा मंदिर केवल दो ही स्थानों में हैं और दोनों ही स्थान पूर्व ग्वालियर रियासत में हैं। एक तो विदिशा के पास उदयगिरि पहाड़ी पर और दूसरा ग्वालियर का दुर्ग।

विदिशा के करीब 4-5 मील दूर उदयगिरि पहाड़ी में बीस गुहा मंदिर हैं और वे सबके सब गुप्तकाल के हैं। पाषाण की दृष्टि से यह पहाड़ी गुफाएँ खोदने के लिए उपयुक्त न थीं फिर भी यहाँ ऐसी अनेक मूर्तियों का निर्माण किया गया, जो अद्वितीय है।

इन गुफाओं में से पहली और बीसवीं गुफा में जैन मूर्तियाँ हैं। बीसवीं गुफा पहाड़ी के ऊपर भाग में है। इसमें खुदे हुए लेख से ज्ञात होता है कि यहाँ पार्श्वनाथ मूर्ति का निर्माण किया गया था, जो कुमार गुप्तप्रथम के राज्यकाल में गुप्त संवत्‌ 106 में खोदा गया था।

गोपाचल दुर्ग गुहा मंदि
ग्वालियर किले में गुफा मंदिर संख्या, विस्तार तथा मूर्तियों की ऊँचाई के कारण विशेष आकर्षक हैं। उक्त किला एक स्वतंत्र पहाड़ी पर है। वास्तव में किला और पहाड़ी अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं। यह उत्तर-दक्षिण करीब 2 मील लंबा, पूर्व-पश्चिम करीब आधा मील चौड़ा एवं 300 फुट ऊँचा है।

15वीं शताब्दी में तोमर राजाओं के राज्यकाल में जैन धर्मावलंबियों के प्रभाव के कारण समूची पहाड़ी पर ऊपर-नीचे चारों ओर गुफा मंदिर खोद दिए गए और उनमें विशाल मूर्तियों का निर्माण किया गया। ये गुफा मंदिर और मूर्तियाँ संख्या और विस्तार में सर्वाधिक हैं। अर्वाचीन होने के कारण एलोरा की गुफाओं के समान उनका स्थान नहीं है। इन गुफाओं में अनेक लेख मिले हैं, जिनसे विदित होता है कि ये 33 वर्षों (1441 से 1474 के बीच) में खोदी जा सकी थीं।

गुफा मंदिरों का इतिहास जैनों से ही प्रारंभ होता है और उन्हीं पर आकर समाप्त हो जाता है। ग्वालियर किले के गुफा मंदिरों के उत्तर-काल में शायद अन्यत्र कहीं कोई गुफा-मंदिर खोदा नहीं गया। जहाँ तक शिल्प का क्षेत्र है, जैन गुफाओं का अपना विशेष स्थान है।

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अजंता की गुफाओं का महत्व उनके चित्रों के कारण है, उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं को शिल्प कला के इतिहास में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और इन्हीं से दो मंजिली गुफाओं का इतिहास प्रारंभ होता है।

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