ऑर्थराइटिस का आयुर्वेदिक समाधान

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- मधु सिंह

जाड़ों में ऑर्थराइटिस अधिक विकट हो जाती है। इसलिए जोड़ों में अधिक दर्द होने लगता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ऑर्थराइटिस तीन प्रकार की होती है।
* ओस्टियो ऑर्थराइटिस, इसे बुढ़ापे की या डिजेनरेटिव ऑर्थराइटिस भी कहते हैं।
* रिह्यूमाटोइड ऑर्थराइटिस जिसमें जलन व दर्द दोनों होते हैं।
* गाऊ ऑर्थराइटिस जो कि यूरिक एसिड के असंतुलन की वजह से होती है। इसमें पैरों में ज्यादा दर्द होता है।

आयुर्वेद के अनुसार जोड़ों में दर्द इसलिए होता है, क्योंकि जोड़ों में टॉक्सिन यानी जहरीले पदार्थ जमा हो जाते हैं। ये टॉक्सिन उस समय बनते हैं जब हम वह खाने की चीजें खाते हैं जिनका आपस में तालमेल नहीं बनता। जैसे एक साथ अगर हम डेयरी उत्पाद, फ्राइड व रिफाइंड फूड, नॉन-वेज और शराब नियमित लेंगे, तो ये पाचन प्रक्रिया पर कुप्रभाव डालते हैं। नतीजतन टॉक्सिन कोलन में सड़ने लगते हैं और फिर खून के जरिए पूरे शरीर में फैल जाते हैं। अंत में ये जहरीले तत्व जोड़ों में जमा हो जाते हैं।
आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार भी तीन किस्म की ऑर्थराइटिस हैं।
* वात ऑर्थराइटिस, जिसमें जोड़ सूख जाते हैं और मोबिलिटी सीमित हो जाती है।
* पित्त ऑर्थराइटिस, इसके चलते जोड़ों पर सूजन आ जाती है, दर्द होता है और जलन भी।
* कफ ऑर्थराइटिस जो कि ओवर ईटिंग और बिना तालमेल वाले खानों को खाने से होती है।आयुर्वेद के मुताबिक ऑर्थराइटिस के उपचार में सबसे पहला कदम कोलन को डिटॉक्सिफाई करना होता है। कहने का मतलब यह कि इसे विषविहीन करना होता है। इसके लिए ये उपाय करने होते हैं-
* मोटे अनाज से बचें।
* खाने में फल, सब्जियों का ज्यूस, तुलसी चाय, हर्बल चाय और पतली मूँग की खिचड़ी या दलिया लें।

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