विज्ञान ने भी माना, योग बनाए निरोग

Author राम यादव|
योग और ध्यान को, भारत की ही तरह, यूरोप में भी मूल रूप से एक धार्मिक-आध्यात्मिक विषय ही माना जाता था। उनकी उपयोगिता को लेकर गंभीर क़िस्म के वैज्ञानिक शोध नहीं होते थे। किंतु अब वैज्ञानिक जितना ही अधिक शोध कर रहे हैं, उतना ही अधिक मुग्ध हो रहे हैं।  
लंबे समय तक यूरोप वालों के लिए भी योग का अर्थ शरीर को खींचने-तानने और ऐंठने-मरोड़ने की एक कठिन भारतीय 'हिंदू' कला से अधिक नहीं था। 'हिंदू' शब्द उसकी व्यापक स्वीकृति और वैज्ञानिक अनुमति में मनोवैज्ञानिक बाधा डालने के लिए कभी-कभार अब भी उसके साथ जोड़ा जाता है।
 
विज्ञान के लिए वह सब प्राय: अवैज्ञानिक और अछूत रहा है, जिसका आत्मा-परमात्मा जैसी अलौकिक, अभौतिक अवधारणाओं से कुछ भी संबंध हो। जो कुछ अभौतिक है, नापा-तौला नहीं जा सकता, विज्ञान की दृष्टि से उसका अस्तित्व भी नहीं हो सकता। हालांकि महान भौतिकशास्त्री अलबर्ट आइनश्टाइन भी मानते थे कि भौतिकता से परे भी कोई वास्तविकता है। 
 
जर्मनी की डॉ. डागमार वूयास्तिक को भौतिकता से परे ऐसी ही एक वास्तविकता का पता लगाने का काम सौंपा गया हैं। वूयास्तिक ने भारतविद्या (इंडोलॉजी) में डॉक्टरेट की है। भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन उनका प्रिय विषय रहा है। 
 
यूरोपीय संघ की वैज्ञानिक शोध परिषद से मिले 14 लाख यूरो (इस समय 1यूरो =74 रुपए) के एक आरंभिक अनुदान के आधार पर तीन सदस्यों की उनकी टीम, 2015 के वसंतकाल से, ऑस्ट्रिया के वियेना विश्वविद्यालय में ''औषधि, अमरत्व और मोक्ष'' नाम की एक परियोजना पर काम कर रही है। सोचने की बात है कि भारत में अमरत्व और मोक्ष जैसी बातों की खिल्ली उड़ाई जाती है, जबकि यूरोपीय संघ उनकी वैज्ञानिक विवेचना जानना चाहता है।  
क्या है अमरत्व और दीर्घायु का राज... पढ़ें अगले पेज पर....

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