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विभिन्न धर्मों में योग, जानिए इसका रहस्य

Last Updated: मंगलवार, 18 अप्रैल 2017 (15:47 IST)
‘षड्दर्शन’ से ही दुनिया के सभी धर्मों का आधार है। ये ‘षड्दर्शन’ है:-  1.न्याय 2.वैशेषिक  3.सांख्य  4.योग 
5.मीमांसा  और 6.वेदांत। इसमें से योग की बातें आपको सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में मिल जाएगा। योग का अर्थ सिर्फ जोड़ या मिलन नहीं। योग शब्द 'युज् समाधौ' धातु से 'घञ्' से प्रत्यय होकर बना है। अत: इसका अर्थ जोड़ न होकर समाधि ही माना जाना चाहिए। समाधि नाम चित्तवृत्तिनिरोध की क्रिया शैली का है। योग का प्रचन प्रत्येक धर्म में विद्यमान है, इसको जानने से पहले जानना जरूरी है योग के अंग और प्रकार को।
 
योग के अंग : योग के कई अंग है। प्रत्येक योगी ऋषि ने उसे अपने अपने तरीके से गणना में रखा है। जैसे पातंजलि ने योग को आठ अंगों में समेट दिया जिसे अष्टांग योग कहते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।...लेकिन इसमें अंग संचालन, क्रिया, बंध, मुद्रा को भी जोड़ दिया जाए तो यह कुल 11 होते हैं। इसके अलावा योग के प्रकार, योगाभ्यास की बाधाएं आदि शामिल है। उपयोक्त अंगों के भी उपांग है:- 
 
*पांच यम:- 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय, 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह।
*पांच नियम:-1.शौच, 2.संतोष, 3.तप, 4.स्वाध्याय और 5.ईश्वर प्राणिधान।
*प्रमुख बंध:- 1.महाबंध, 2.मूलबंध, 3.जालन्धरबंध और 4.उड्डियान।  
*अंग संचालन:- 1.शवासन, 2.मकरासन, 3.दंडासन और 4. नमस्कार मुद्रा में अंग संचालन किया जाता है जिसे सूक्ष्म व्यायाम कहते हैं। इसके अंतर्गत आंखें, कोहनी, घुटने, कमर, अंगुलियां, पंजे, मुंह आदि अंगों की एक्सरसाइज की जाती है।
*प्रमुख प्राणायाम:- 1.नाड़ीशोधन, 2.भ्रस्त्रिका, 3.उज्जाई, 4.भ्रामरी, 5.कपालभाती, 6.केवली, 7.कुंभक, 8.दीर्घ, 9.शीतकारी, 10.शीतली, 11.मूर्छा, 12.सूर्यभेदन, 13.चंद्रभेदन, 14.प्रणव, 15.अग्निसार, 16.उद्गीथ, 17.नासाग्र, 18.प्लावनी, 19.शितायु आदि।
*प्रमुख 13 क्रियाएं:- 1.नेती- सूत्र नेति, घॄत नेति, 2.धौति- वमन धौति, वस्त्र धौति, दण्ड धौति, 3.गजकरणी, 4.बस्ती- जल बस्ति, 5.कुंजर, 6.न्यौली, 7.त्राटक, 8.कपालभाति, 9.धौंकनी, 10.गणेश क्रिया, 11.बाधी, 12.लघु शंख प्रक्षालन और 13.शंख प्रक्षालयन।
*आसन मुद्राएं:- 1.व्रक्त मुद्रा, 2.अश्विनी मुद्रा, 3.महामुद्रा, 4.योग मुद्रा, 5.विपरीत करणी मुद्रा, 6.शोभवनी मुद्रा।
*पंच राजयोग मुद्राएं- 1.चाचरी, 2.खेचरी, 3.भोचरी, 4.अगोचरी, 5.उन्न्युनी मुद्रा
*10 हस्त मुद्राएं:- उक्त के अलावा हस्त मुद्राओं में प्रमुख दस मुद्राओं का महत्व है जो निम्न है: -1.ज्ञान मुद्रा, 2.पृथवि मुद्रा, 3.वरुण मुद्रा, 4.वायु मुद्रा, 5.शून्य मुद्रा, 6.सूर्य मुद्रा, 7.प्राण मुद्रा, 8.लिंग मुद्रा, 9.अपान मुद्रा, 10.अपान वायु मुद्रा।
 
योग के मुख्यत: 6 प्रकार हैं:-1. राजयोग, 2. हठयोग, 3. लययोग, 4. ज्ञानयोग, 5. कर्मयोग और 6. भक्तियोग। इसके अलावा बहिरंग योग, मंत्र योग, कुंडलिनी योग और स्वर योग,  सिद्ध योग, रैकी, आदि योग के अनेक आयामों की चर्चा की जाती है, लेकिन मुख्यत: तो उपरोक्त छह योग ही माने गए हैं। अब सवाल यह उठता है कि योग का हिन्दू सहित अन्य धर्मों से क्या संबंध है?
 
नोट : उपयोक्त बातें लिखने का आशय यह कि सभी धर्मों में उपरोक्त बातों का ही उल्लेख किसी न किसी रूप में इसलिए मिलेगा क्योंकि भारत से पश्‍चिम में जाकर योगासन, प्राणायाम और ध्यान का प्रचार-प्रसार करने वाले अनेक साधु-संत वहां बड़े लोकप्रिय हो गए थे। सभी धर्मों में व्रत, उपवास का जो नियम है वह योग के तप का हिस्सा है। और धर्म को छोड़कर सभी धर्म ईश्वर के प्रति समर्पण की बात करते हैं जो कि योग का ईश्वर प्राणिधान, संकल्प और समर्पण का हिस्सा है। इसी तरह आगे देखें। 
 
1.हिन्दू धर्म और योग : 
मूलत: योग का वर्णन सर्वप्रथम वेदों में ही हुआ है लेकिन यह विद्या वेद के लिखे जाने से 15000 ईसा पूर्व के पहले से प्रचलन में थी, क्योंकि वेदों की वाचिक परंपरा हजारों वर्ष से चली आ रही थी। अत: वेद विद्या उतनी ही प्राचीन है जितना प्राचीन ज्योतिष या सिंधु सरस्वती सभ्यता है। वेद, उपनिषद, गीता, स्मृति ग्रंथ और पुराणों में योग का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। योग की महिमा और यज्ञों की सिद्धि के लिए उसकी परमावश्यकता बतलायी गयी है। इसी सिद्धांत को ऋक् संहिता में स्पष्ट उल्लेख पाया जाता है। 
 
यस्मादूते न सिध्यति यज्ञो विपश्‍चितश्चन।
धीनां    योगमिन्वति।। - (ऋक् संहिता मंडल 1, सूक्त 18, मंत्र 7)
अर्थात योग के बिना विद्वान का कोई भी यज्ञकर्म नहीं सिद्ध होता, वह योग क्या है सो चित्तवृत्ति निरोधरूपी योग या एकाग्रता से समस्त कर्तव्य व्याप्त हैं, अर्थात सब कर्मों की निष्पत्ति का एकमात्र उपाय चित्तसमाधि या योग ही है।
 
2.यहूदी धर्म और योग : हजरत मूसा ने कुछ यम-नियमों के पालन पर जोर दिया था। मूसा की दस आज्ञाएं (टेन कमांडमेंट्स) यहूदी संप्रदाय का आधार है। यह वेद और योग से ही प्रेरित हैं। यहूदी, और की मूल आध्यात्मिक उपासना में योग ही है। 
 
3.जैन धर्म और योग : जैन धर्म का योग से गहरा नाता है। उपरोक्त लिखे में योग के अंग यम और नियम ही जैन धर्म के आधार स्तंभ है। जैन धर्म में पंच महाव्रतों का बहुत महत्व है:- 1.अहिंसा (हिंसा न करना), 2.सत्य, 3.अस्तेय (चोरी न करना), 4.ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (धन का संग्रह न करना)।  गृहस्थ अणुव्रती होते हैं, मुनि महाव्रती।
 
4.पारसी धर्म और योग : महात्मा जरथुस्त्र भी एक योगी ही थे। पारसी धर्म का वेद और आर्यों से गहरा नाता है। अत्यंत प्राचीन युग के पारसियों और वैदिक आर्यों की प्रार्थना, उपासना और कर्मकांड में कोई भेद नजर नहीं आता। वे अग्नि, सूर्य, वायु आदि प्रकृति तत्वों की उपासना और अग्निहोत्र कर्म करते थे। 
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