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योग और योग के आसनों का जन्मदाता कौन?


अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
और योग के आसनों को लेकर बहुत विवाद हैं। विवाद का कारण कुछ विदेशी और कुछ विदेशी मानसिकता के भारतीय हैं। उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके पास योग की जानकारी अधूरी है। कुछ ऐसे भी हैं, जो जानते हैं लेकिन वे योग के विरोधी हैं। क्यों? यह सवाल तो उनसे ही पूछा जाना चाहिए। 
 
योग का जन्मदाता कौन? अधिकतर यह मानते हैं कि महर्षि पतंजलि थे। उनका यह मानना उनकी अधूरी जानकारी का परिणाम है। हालांकि जब भी योग की बात होती है तो पतंजलि का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि पतंजलि ही पहले और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने योग को आस्था, अंधविश्वास और धर्म से बाहर निकालकर एक सुव्यवस्थित रूप दिया था, जबकि योग तो प्राचीनकाल से ही साधु-संतों के मठों में किया जाता रहा है। आदिदेव शिव और गुरु दत्तात्रेय को योग का जनक माना गया है। शिव के 7 शिष्यों ने ही योग को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया। योग का प्रत्येक धर्म पर गहरा प्रभाव देखने को मिलेगा। > कहते हैं कि शिव ने योगी की पहली शिक्षा अपनी पत्नी पार्वती को दी थी। दूसरी शिक्षा जो योग की थी, उन्होंने केदारनाथ में कांति सरोवर के तट पर अपने पहले सात शिष्यों को दी थी। उन्हें ही सप्तऋषि कहा ‍गया जिन्होंने योग के अलग-अलग आयाम बताए और ये सभी आयाम योग के सात मूल स्वरूप हो गए। आज भी योग के ये सात विशिष्ट स्वरूप मौजूद हैं। इन सप्त ऋषियों को विश्व की अलग-अलग दिशाओं में भेजा गया, जिससे वे योग के अपने ज्ञान लोगों तक पहुंचा सकें।
 
कहते हैं कि एक को मध्य एशिया, एक को मध्य पूर्व एशिया व उत्तरी अफ्रीका, एक को दक्षिण अमेरिका, एक को हिमालय के निचले क्षेत्र में, एक ऋषि को पूर्वी एशिया, एक को दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप में भेजा गया और एक आदियोगी के साथ वहीं रह गया। अगर उन इलाकों की संस्कृतियों पर गौर किया जाए तो आज भी इन ऋषियों के योगदान के चिन्ह वहां दिखाई दे जाएंगे।
 
ओशो कहते हैं कि योग धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है। योग एक सीधा विज्ञान है। प्रायोगिक विज्ञान है। योग है जीवन जीने की कला। योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है। एक पूर्ण मार्ग है- राजपथ। दरअसल, धर्म लोगों को खूंटे से बांधता है और योग सभी तरह के खूंटों से मुक्ति का मार्ग बताता है।
 
 

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