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योग शिक्षा का महत्व

पुनः संशोधित गुरुवार, 8 जून 2017 (13:56 IST)
योग एक मानस शास्त्र है जिसमें मन को संयत करना और पाशविक वृत्तियों से खींचना सिखाया जाता है। जीवन की सफलता, किसी भी क्षेत्र में संयत मन पर भी निर्भर करती है। मन:संयम का अभिप्राय है किसी एक समय में किसी एक ही वस्तु पर चित्त का एकाग्र होना। दीर्घकाल तक अभ्यास करने से मन का ऐसा स्वभाव बन जाता है। किसी विषय को सोचते या किसी काम को करते हुए मन उस पर एकाग्र रहे, ऐसा अभ्यास करना आरंभ में तो बड़ा कठिन होता है, पर जब अभ्यास करते-करते वैसा स्वभाव बन जाता है, तब उससे बड़ा सुख होता है। 
 
ठीक-ठीक और सुसंगत रीति से न सोच सकना या अच्‍छे ढंग से कोई काम न कर सकना, विचार और काम में मन की चंचलता से ही होता है। विद्यार्थी जानते हैं कि मन स्थिर न हो तो कोई बात सीखी नहीं जा सकती और मजदूर जानते हैं कि अस्थिर मन से कोई काम नहीं हो सकता। बहुत से विद्यार्थी जो प्रतिवर्ष विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में फेल हुआ करते हैं, इसका कारण यही है कि अध्ययन में मन को एकाग्र करने की शक्ति ही उनमें नहीं होती। यही बात सांसारिक विषयों में होने वाली विफलताओं की है। जब तक मनुष्य अपने विचारणीय विषय या करणीय कार्य में तन्मय नहीं होता, तब तक उसे उसमें सफलता मिल ही नहीं सकती। 
 
मन के इस विशिष्ट धर्म से योगशास्त्र के प्रणेता ने धार्मिक क्षेत्र में भी काम लिया है। योग स्वयं कोई धर्म संप्रदाय या धर्मविषयक तत्वज्ञान नहीं है, प्रत्युत यह संसार के सभी धर्मों और तत्वज्ञानों का सहायक है। इसे किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रचार नहीं करना है। संसार के सभी धर्म वालों को इसके द्वारा यह शिक्षा मिलती है कि किस प्रकार अपनी-अपनी धर्मविषयक बातों में मन को एकाग्र करने से शांति और आनंद प्राप्त होता है। 
 
पातंजल योग सूत्रों में जिस विषय का मुख्यतया प्रतिपादन किया गया है, वह है 'चित्तवृत्तिनिरोध' अर्थात अन्य विषयों से चित्त को खींचकर एक ही विषय में एकाग्र करना। मन को एकाग्र करने की शक्ति निरंतर अभ्यास और सांसारिक भोगों से मुंह मोड़ने से प्राप्त होती है। सूत्र 23 और 39 में पतंजलि मुनि कहते हैं कि ईश्वर-प्रणिधान से अथवा जिस विषय में अपनी रुचि हो, उसी पर ध्यान जमाने से (यथाभिमतध्यानाद्वा) चित्त को स्थिर करने की शक्ति प्राप्त होती है। ईश्वर का इस रूप में ध्यान किया जा सकता है कि वह सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी सगुण परमेश्वर हैं अथवा इस रूप में भी ध्यान किया जा सकता है कि वह निर्गुण-निरंजन परब्रह्म हैं जिनमें प्रेम, द्वेष, दया, सृष्टि, स्थिति, संहार आदि कोई गुण नहीं हैं। 
 
योगदर्शन ईश्वर के विषय में इतना ही कहता है कि वह कोई ऐसे 'पुरुष हैं, क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से नित्यमुक्त हैं' (यो.सू. 1.24)। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कोई यज्ञ-याग या तप-अनुष्ठान योगसूत्रों में नहीं बताया गया है। यदि कोई धर्म-संप्रदाय अपने अनुयायियों को ऐसी कोई बात बतलाता है तो योगसूत्रों में उसका कोई विरोध भी नहीं है, पर योगसूत्र यह अवश्य कहते हैं कि तुम जो कुछ करो, उसे सच्चे हृदय और तन्मय होकर करो मेरे विचार में योगसूत्र तथा अद्वैतप्रतिपादक उपनिषद् ही ऐसे ग्रंथ हैं जिनमें कोई सांप्रदायिकपन नहीं है। इसलिए कोई ईसाई हो, मुसलमान हो, जैन हो, बौद्ध हो या किसी भी मत का मानने वाला हो, इसकी कोई परवाह नहीं, यदि वह अपने धर्म का पालन करने में यदि योगसूत्रों की शिक्षा से काम लेता है तो इसमें उसका बड़ा लाभ है। यही नहीं, बल्कि योग शिक्षा से अर्थकरी विद्या के अध्ययन में, कृषि और उद्योग-धंधों में, सामरिक शिक्षा में, युद्ध, व्यापार और राज्य शासन में भी काम लिया जाए तो इन क्षेत्रों में भी सफलता निश्चित है। यही तो बात है जिससे रोग मन को हर लेता है। 
 
इसमें संदेह नहीं कि योगसूत्रों में जो लक्ष्य सामने रखा गया है, वह दृष्टा का अर्थात आत्मा का अपने स्वरूप में अवस्थान है। इसका यह मतलब है कि योगसूत्रों के सिद्धांतों का निरंतर आचरण करने से चित्त सांसारिक भोगों से विरत होकर निज स्वरूप में स्थिर हो जाता है। चितवृत्तियों का यह निरोध किसी भी धर्म-संप्रदाय की शिक्षा के प्रतिकूल नहीं है। ऐसा स्वरूपावस्थान सांख्य और अद्वैत सिद्धांत का तो प्रतिपाद्य ही है। सगुण ईश्वर को मानने वाले संप्रदायों में भी कोई न कोई महान लक्ष्य सामने रहता ही है। 
 
'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है', यह सिद्धांत सर्वमान्य है। लौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रकारों के प्रयासों की सफलता के लिए स्वस्थ शरीर इसीलिए आवश्यक है। योग शिक्षा में आहार-विहार के नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है। श्रीमद् भगवद्गीता में स्पष्ट ही कहा है कि जो 'युक्ताहारविहार' नहीं हैं, उन्हें जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती।
 
योगसूत्रों के दो भाग हैं- हठयोग और राजयोग। हठयोग में आसनों की शिक्षा है- आसनों से आरोग्य और बल प्राप्त होता है। आसनों की रचना ऐसी है कि जिससे शरीर के अंग-प्रत्यंग का व्यायाम हो जाए। उदाहरणार्थ, मयूरासन से सब अंतड़ियों का व्यायाम हो जाता है जिससे अपच तथा वायु की शिकायत नहीं रहती। प्राणायाम से प्राणवायु मिलती है और अशुद्ध वायु निकल जाती है। भगवद्गीता के समान ही हठयोग में भी मिर्च-मसाले आदि की मनाही है। राजस और तामस आहार का सर्वथा त्याग है। मसालेदार पदार्थ खाने वाला राजस मनुष्य उस आहार के कारण क्रोधी, लालची और कामी होता है और तामस आहार करने वाला मनुष्य आलसी, दीर्घसूत्री और प्रमादी होता है। हठयोग में जिसे सात्विक आहार गया है उससे सद्गुणों की वृद्धि होती है और आरोग्य तथा बल बढ़ता है। 
 
यह कोई न समझे कि योग की यह शिक्षा योगियों के लिए ही है, सबके लिए नहीं। 'योगी' शब्द से अत्यंत व्यापक अर्थ लिया जाए तो जो कोई संसार में सदाचार से रहकर जीवन को सफल करना चाहता है, वही योगी है। सभी धर्म यह बतलाते हैं कि सदाचार ही स्वर्ग का सुगम मार्ग है। योग में सदाचार का अर्थ केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि आहार-विहार का नियम भी है। 
 
आधुनिक सभ्यता की सब बुराइयों की जड़ आहार-विहार के विषय में किसी मर्यादा का न होना, विषयभोग और अधार्मिकता है। सच्चे सदाचारी मनुष्य को संसार के किसी न किसी धर्म को मानकर चलने में कोई दिक्कत नहीं होती। सदाचार धर्म की रक्षा करता है और धर्म सदाचार की। सदाचार और धर्म सदा साथ रहते हैं। विज्ञान भी धर्म या सदाचार का विरोधी नहीं है। यौगिक जीवन का अर्थ, संक्षेप में, 'शरीर का युक्त व्यायाम, सादा सात्विक आहार और सद्विद्या का अध्ययन' है। कोई भी वैज्ञानिक क्या इस प्रकार के जीवन को बुरा बता सकता है? 
 
पौष्टिक आहार के नाम पर असंख्य रासायनिक पदार्थ बाजारों में बिका करते हैं। शारीरिक व्यायाम के नाम पर तरह-तरह के खेल स्कूलों में खेलाए जाते हैं और कसरतें कराई जाती हैं। पर ऐसे कोई भी कसरती जवान योगी के-से दीर्घायु नहीं होते। योगी कसरती की तरह न तो हजार डंड-बैठक लगाता है, न बहुत खाता ही है। शरीर या बुद्धि को बेहिसाब बढ़ाना उसका काम नहीं है। उसे न स्नायुओं को फुलाने की परवाह है, न वजन बढ़ाने वाले खाद्यों की है। उसे तो नियमित सात्विक आहार चाहिए। योगी का युक्त आहार-विहार ऐसा होता है कि उसका चित्त प्रसन्न, बुद्धि स्थिर और गठा हुआ सुडौल शरीर होता है। 
 
प्रसन्नचित्त और सदाचारी पुरुष को स्वर्ग का सुगम, प्रशस्त और समीप का मार्ग मिल जाता है। वह सबका मित्र होता है। वह न किसी का द्वेष करता है, न कोई उससे द्वेष करता है। उसका चेहरा सदा हंसता हुआ होता है। क्रोध या लोभ उसके पास फटकने नहीं पाते। धर्मवीरता और नैतिक धीरता में वह किसी के पीछे नहीं रहता। यौगिक जीवन के अनुकूल कोई भी काम करने के लिए उसके सामने संसार का मैदान खाली है। वह कला या विज्ञान सीखकर दूसरों को सिखा सकता है। वह धन एकत्र कर गरीबों की मदद कर सकता है। वह दूसरों के कल्याण के लिए राजनीतिक नेता या शासक बन सकता है। उसकी मृत्यु भी बड़ी शान्ति के साथ होती है, क्योंकि परलोक वह अपने सामने देखता है। उसका अपना जीवन ही उसके परलोक के दिव्य स्थान का पर्याप्त मूल है। 
 
योगसूत्रों में यौगिक जीवन का यह फल है। यह सांप्रदायिक नहीं है। न इसमें अंधविश्वास की कोई बात है। यह सबका उपकारक प्रत्यक्ष योग है। 
 
- लेखक- डॉ. श्री आर. शामशास्त्री, बीए, पीएचडी 
- कल्याण के दसवें वर्ष का विशेषांक योगांक से साभार   
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