Widgets Magazine

यूँ ही नहीं कहते किरण बेदी को 'क्रेन बेदी'

NDND
वर्ष 2002 में प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन द्वारा आयोजित अंतरमहाविद्यालयीन कहानी प्रतियोगिता में मेरी बेटी की कहानी को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था। पुरस्कार के रूप में उसे 15 पुस्तकें प्राप्त हुई थीं। सभी पुस्तकें प्रतिष्ठित लेखकों की थीं। इन सभी पुस्तकों को मेरे परिवार में सभी ने पढ़ा। परंतु इनमें सर्वाधिक प्रभावित किया किरण बेदी से भेंटवार्ताओं पर आधारित पुस्तक 'मोर्चा दर मोर्चा' ने।

वस्तुतः किरण बेदी से मैं शुरू से ही प्रभावित रही हूँ और केवल मैं ही क्यों विश्व का प्रत्येक व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

16 जुलाई 1972 को जब किरण बेदी भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होने वाली प्रथम महिला बनीं, तब मेरी उम्र 17-18 वर्ष थी। हम सारी सहेलियाँ इससे बहुत खुश थीं। वस्तुतः यह नारी की उपलब्धियों का एक स्वर्णिम अध्याय था।

जब मैंने 'मोर्चा दर मोर्चा' को पढ़ा तब मुझे किरण बेदी के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं से परिचित होने का अवसर मिला। मैंने इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाया कि किसी भी व्यवस्था को सुधारना कठिन नहीं होता बशर्ते प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का समुचित तरीके सेनिर्वाह करे। इसमें मीडिया, परिवार, युवा, पुलिस सभी का योगदान अपेक्षित होता है। इस पुस्तक के जरिए मैंने पाया कि किरण के सबसे अधिक प्रिय शब्द हैं- कर्तव्य, मानवता, आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, परिश्रम, विद्या, सादगी, चरित्र, अनुशासन, सकारात्मकता, प्रार्थना, सर्वधर्म, खुशी, निःस्वार्थ आदान-प्रदान, सुस्पष्टता, संयम, संतुलन, सहजता और इन सबसे ऊपर समस्या निवारण।

किरण बेदी की सोच के पैमाने अपने आप में जादू सा असर रखते हैं जैसे -

- किरण बेदी मानती हैं कि स्थितियाँ स्वयं कभी नहीं बदलतीं, हम उन्हें बदलते हैं।

- सोच-विचार करना, योजनाएँ बनाना बहुत से लोगों का काम होता है पर निष्पादन एक ही व्यक्ति करता है।

WD|
- चंद्रकांता जै
- उलटी लहर में तैरना जरा मुश्किल होता है पर आप उस जगह पहुँच जाते हैं जहाँ कोई और नहीं पहुँच सकता।

वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :