फातिमा भुट्टो : दर्द की फौलादी विरासत

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अपनी पैदाइश से उम्र के पच्चीसवें मोड़ तक फातिमा भुट्टो ने बेशुमार हादसे देखे। उन्हें अपनी साँसों की रफ्तार के साथ महसूस किया। 27 मई 1982 को अपने जन्म से पहले उसके दादा जुल्फिकार अली भुट्टो (पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री) को फाँसी पर लटका दिया गया। पिता मीर मुर्तजा भुट्टो को अपना मुल्क छोड़कर दूसरे मुल्क भागना पड़ा। मुर्तजा अपनी नन्हीं बेटी फातिमा को लेकर 16 साल सीरिया में रहे। जब बहन बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनीं तो वे अपने वतन लौट आए, लेकिन वतन (पाकिस्तान) लौटने के बाद भी उनका ज्यादातर वक्त जेलों में गुजरा...।

...फिर वह रात आई, जिसने फातिमा की जिंदगी के मायने ही बदल दिए। फातिमा के पापा जब एक आमसभा से लौट रहे थे, पुलिस ने उन्हें मुठभेड़ में मार दिया। पंद्रह साल की नाजुक उम्र में फातिमा के लिए हादसा किसी आसमानी कहर से कम नहीं था। सबसे ज्यादा दुःख तो इसबात का था कि जब उनके पिता को यातनाएँ देकर मारा गया, उस वक्त उनकी सगी बुआ बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थीं। फातिमा ने अपने दर्द को सहलाके अपने अंदर पनप रहे लेखक को अपनी साँसों से सींचा। फिर अपनी गूँगी खामोशियों से पहली किताब लिखी तो एक नई पहचान मिली। फातिमा की 46 कविताओं की इस किताब को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया और इसके अब तक कई संस्करण, कई जुबानों में प्रकाशित हो चुके हैं।

फातिमा अक्सर अपनी मुलाकातों-तहरीरों (लेख) में दुआ करती हैं कि खुदा इस कमसिन उम्र में किसी ल़ड़की को दर्द की ऐसी विरासत न दें। फातिमा कहती हैं- मैंने अपने पापा से जिंदगी की जो कड़वाहटों, रिश्तों की दरारें सीखी हैं, उसने एक आसान-सी छुई-मुई-सी लड़की को कठिन बना दिया है। शायद यही वजह है कि फातिमा को अब हादसे फूल लगते हैं। लेबनान और इसराइल की जंग को बहुत करीब से देखा, क्योंकि उनकी माँ घिनवा भुट्टो इसराइल की हैं। लेबनान व इसराइल जंग पर कई लेख लिखे, जिनकी खूब चर्चाएँ भी हुईं।

फातिमा के दादा और पिता तो सियासत में थे, लेकिन फातिमा को सियासत में आने से डर लगता है, क्योंकि इस सियासत ने उनसे उनकी सबसे अनमोल चीज 'पापा' को छीना है। बेनजीर भुट्टो उनकी सगी बुआ जरूर हैं, लेकिन सियासत की शतरंज पर जो भ्रष्टाचार या हिंसा की इबारतें वे लिख रही हैं (बकौल फातिमा), वे फातिमा को पसंद नहीं हैं। उन्होंने अपने पापा से ही सीखा है कि जो आप दिल की गहराइयों से सोचते हैं, वही सच है। यही करना भी चाहिए। मैं अंदर से इसीलिए मजबूत हूँ, क्योंकि मुझसे जो सचाइयाँ बोई गई हैं, वे हमेशा लहलहाती रहती हैं। पच्चीस साल की इस उम्र तक तो मैंने अपनी सचाइयों को कभी मुरझाने नहीं दिया।

फातिमा पाकिस्तान को अपना प्यारा मुल्क मानती हैं, लेकिन उन्हें हिन्दुस्तान से भी उतनी ही मोहब्बत है। अपनी मुंबई यात्रा (मुंबई बुक फेस्टिवल) के दौरान फातिमा ने यही कहा- मैं भारत के बारे में हमेशा सकारात्मक सोचती हूँ। मैं जब भी भारत आई हूँ, मुझे परिवार की तरह प्यार मिला है। दोनों मुल्कों को बम नहीं मोहब्बत से जोड़ा जा सकता है। मैंने अपने पापा से मुहब्बत करना सीखा है। मैं जब दस-ग्यारह साल की थी, तब पिता को जब भी लिखकर दिखाती थी, वे बहुत खुश होते थे। उन्होंने मेरे हौसलों को बुलंदी दी। पापा, आजमेरे साथ नहीं हैं, लेकिन मैं जब भी कोई लफ्ज लिखती हूँ तो मुझे लगता है, मेरे पापा खुश हो रहे हैं...।

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फातिमा ने अपने पिता के कत्ल के बाद जब पहली बार उर्दू दैनिक 'जंग' और अँगरेजी के 'द न्यूज' में लेख लिखा तो उन्हें कई अखबारों ने बाद में साभार प्रकाशित किया। तब से लेकर अभी तक फातिमा नियमित लिख रही हैं। फातिमा ने पाकिस्तान में आए भूकम्प पर भी '8.50एएम' (8 अक्टूबर 2005) किताब लिखी तो उसे खूब पसंद किया गया। उर्दू में जब पत्रकार शाहिद मंसूर ने अनुवाद किया तो पाकिस्तान में कई संस्करण प्रकाशित हुए। फातिमा ने कराची के अमेरिकन स्कूल से तालीम लेने के बाद कोलंबिया यूनिवर्सिटी (न्यूयॉर्क) से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। विषय था- मध्य एशियाई भाषाएँ और उनकी संस्कृति। बाद में लंदन से स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एसओएएस) से दक्षिण एशियाई सरकारों और वहाँ की राजनीति के विषय में डिग्री ली।

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